रिंग ऑफ फायर में 7 दिन में 187 भूकंप, क्या खतरा बढ़ा?
187 भूकंपों से क्यों चर्चा में आया रिंग ऑफ फायर?
धरती के सबसे सक्रिय इलाके में क्यों बढ़ी भूकंपीय हलचल?
पिछले सात दिनों में दुनिया भर में 4.5 या उससे अधिक तीव्रता के 187 भूकंप दर्ज हुए। कई झटके पैसिफिक रिंग ऑफ फायर में आए। इंडोनेशिया में 7.7 और पेरू में 6.7 तीव्रता के भूकंप रहे। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह आंकड़ा अपने आप किसी बड़े आगामी भूकंप की भविष्यवाणी नहीं करता।
प्रशांत महासागर क्षेत्र |26 अगस्त 2026 |शाह टाइम्स
धरती के सबसे सक्रिय भूकंपीय इलाकों में से एक पैसिफिक रिंग ऑफ फायर एक बार फिर चर्चा में है। पिछले सात दिनों में दुनिया भर में 4.5 या उससे अधिक तीव्रता के 187 भूकंप दर्ज किए गए, जिनमें कई झटके जापान, इंडोनेशिया, अलास्का और अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों में आए। रिपोर्ट के मुताबिक इस अवधि में सबसे बड़ा झटका इंडोनेशिया के पास 7.7 तीव्रता का था। अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण यानी यूएसजीएस के रिकॉर्ड में भी 14 अगस्त को इंडोनेशिया के पास 7.7 और 20 अगस्त को दक्षिणी पेरू में 6.7 तीव्रता का भूकंप दर्ज है। पेरू वाला भूकंप 99 किलोमीटर की गहराई पर आया था, जिससे उसकी सतही तबाही सीमित रही। लेकिन यहां सबसे जरूरी फैक्ट-चेक यह है कि 187 का आंकड़ा सिर्फ रिंग ऑफ फायर का नहीं है। यह सात दिनों में पूरी दुनिया में आए 4.5 या उससे अधिक तीव्रता वाले भूकंपों का आंकड़ा है। इसलिए इसे रिंग ऑफ फायर में किसी असामान्य वैश्विक संकट का सीधा सबूत मानना वैज्ञानिक तौर पर सही नहीं होगा।
रिंग ऑफ फायर प्रशांत महासागर के चारों तरफ फैला एक विशाल भूकंपीय और ज्वालामुखीय क्षेत्र है। यूएसजीएस के मुताबिक यह दुनिया का सबसे ज्यादा भूकंपीय और ज्वालामुखीय रूप से सक्रिय क्षेत्र है, जहां प्रशांत प्लेट कई दूसरी टेक्टोनिक प्लेटों से मिलती है। इस इलाके में जापान, इंडोनेशिया, फिलीपींस, न्यूजीलैंड, अलास्का और अमेरिका के पश्चिमी हिस्से समेत कई क्षेत्र आते हैं। प्लेटों की सीमाओं पर लगातार भूगर्भीय हलचल होती रहती है, इसलिए यहां भूकंप और ज्वालामुखीय गतिविधि सामान्य से ज्यादा रहती है। यूएसजीएस के अनुसार दुनिया के करीब 90 प्रतिशत भूकंप रिंग ऑफ फायर के आसपास के क्षेत्र में आते हैं। यही वजह है कि इस इलाके में एक साथ कई भूकंप दर्ज होना अपने आप में असाधारण घटना नहीं है।
धरती की ऊपरी ठोस परत कई बड़ी और छोटी टेक्टोनिक प्लेटों में बंटी हुई है। ये प्लेटें लगातार गति करती हैं, एक-दूसरे से टकराती हैं, अलग होती हैं या एक-दूसरे के किनारे से खिसकती हैं। रिंग ऑफ फायर में कई जगह सबडक्शन जोन मौजूद हैं। यहां एक टेक्टोनिक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धंसती है। इस प्रक्रिया से चट्टानों में तनाव जमा होता है और जब यह तनाव अचानक रिलीज होता है तो भूकंपीय तरंगें पैदा होती हैं। यही वजह है कि रिंग ऑफ फायर में केवल भूकंप ही नहीं आते। इसी भूगर्भीय प्रक्रिया का संबंध ज्वालामुखी, सुनामी और कुछ इलाकों में भूस्खलन जैसे खतरों से भी है।
पिछले एक सप्ताह की गतिविधि में इंडोनेशिया का 7.7 तीव्रता वाला भूकंप सबसे बड़ा था। यूएसजीएस के मुताबिक यह 14 अगस्त को इंडोनेशिया के एंडे से लगभग 68 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में आया और इसकी गहराई करीब 10 किलोमीटर थी। इसके बाद उत्तरी इंडोनेशिया में 6.9 तीव्रता का भूकंप और दक्षिणी पेरू में 6.7 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। पेरू का भूकंप 99 किलोमीटर गहरा था और यूएसजीएस ने इसका पेजर अलर्ट लेवल ग्रीन रखा। जापान, अलास्का और अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों में भी कई भूकंपीय घटनाएं दर्ज हुईं। इनमें से अधिकांश की तीव्रता बड़े विनाशकारी भूकंपों की तुलना में कम रही।
यही इस पूरी खबर का सबसे अहम सवाल है। फिलहाल ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है जिससे कहा जा सके कि सात दिनों में 187 भूकंप आने के बाद जल्द ही कोई बड़ा भूकंप जरूर आएगा। यूएसजीएस साफ कहता है कि वैज्ञानिक अभी किसी बड़े भूकंप की तारीख, समय, स्थान और तीव्रता पहले से सटीक रूप से नहीं बता सकते। वैज्ञानिक किसी क्षेत्र में लंबे समय की भूकंपीय संभावना का आकलन कर सकते हैं, लेकिन किसी खास भूकंप की निश्चित भविष्यवाणी नहीं। इसलिए 187 भूकंपों की संख्या को “बड़े भूकंप की चेतावनी” बताना गलत नैरेटिव होगा। भूकंपों की संख्या बढ़ना और किसी खास इलाके में विनाशकारी भूकंप का तत्काल खतरा बढ़ना एक ही बात नहीं है।
चिंता की वजह केवल संख्या नहीं है। इस अवधि में 7.7 और 6.7 जैसे बड़े भूकंप भी दर्ज हुए और इनमें से कुछ सक्रिय प्लेट सीमाओं वाले क्षेत्रों में आए।
इंडोनेशिया और पेरू दोनों भूकंपीय रूप से सक्रिय क्षेत्रों में हैं। पेरू पैसिफिक रिंग ऑफ फायर का हिस्सा है, जबकि इंडोनेशिया भी कई टेक्टोनिक प्लेटों की जटिल सीमा पर स्थित है। ऐसे क्षेत्रों में किसी बड़े भूकंप के बाद आफ्टरशॉक की श्रृंखला भी आ सकती है। इसलिए किसी एक घटना के बाद दर्ज होने वाले छोटे और मध्यम झटकों को अलग-अलग स्वतंत्र घटनाओं के बजाय उस भूकंपीय अनुक्रम के संदर्भ में देखना जरूरी होता है।
बड़े भूकंप के बाद उसी फॉल्ट या उसके आसपास छोटे भूकंप आते हैं। इन्हें आफ्टरशॉक कहा जाता है। इनका पैटर्न मुख्य भूकंप के बाद कुछ समय तक जारी रह सकता है। लेकिन सात दिनों में दर्ज सभी 187 भूकंपों को आफ्टरशॉक कहना भी सही नहीं होगा। ये घटनाएं दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दर्ज हुईं और कई स्वतंत्र टेक्टोनिक क्षेत्रों से जुड़ी हैं। यही वजह है कि केवल कुल संख्या से वैश्विक भूकंपीय स्थिति का निष्कर्ष निकालना वैज्ञानिक तौर पर कमजोर तरीका है।
नहीं। रिंग ऑफ फायर की खासियत ही इसकी लगातार भूकंपीय सक्रियता है। यूएसजीएस के मुताबिक यहां प्रशांत प्लेट आसपास की कई टेक्टोनिक प्लेटों के साथ इंटरैक्ट करती है। अलग-अलग जगहों पर प्लेटों का टकराव, खिसकना और सबडक्शन लगातार जारी रहता है। इसलिए इस क्षेत्र में लगातार भूकंप दर्ज होना सामान्य भूगर्भीय प्रक्रिया का हिस्सा है। असली चिंता तब बढ़ती है जब किसी खास इलाके में भूकंपीय गतिविधि के साथ अन्य वैज्ञानिक संकेत भी मिलें या बड़े भूकंप के बाद आफ्टरशॉक पैटर्न विकसित हो।
सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि एक बड़े भूकंप के बाद दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में बड़ा भूकंप आने वाला है। ऐसी सीधी वैश्विक कड़ी को साबित करना आसान नहीं है। टेक्टोनिक प्लेटों का सिस्टम आपस में जुड़ा जरूर है, लेकिन हजारों किलोमीटर दूर अलग-अलग फॉल्ट पर भूकंपों को केवल क्रम देखकर एक-दूसरे का कारण बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। इसलिए इंडोनेशिया, पेरू और जापान में हालिया भूकंपों को एक ही वैश्विक “चेन रिएक्शन” के रूप में पेश करने के लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाण चाहिए।
भारत रिंग ऑफ फायर के बाहर स्थित है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि देश भूकंप से सुरक्षित है। भारत के उत्तर और उत्तर-पूर्व में हिमालयी क्षेत्र एक सक्रिय टेक्टोनिक बेल्ट से जुड़ा है। यूएसजीएस के अनुसार रिंग ऑफ फायर के बाद अल्पाइड बेल्ट दुनिया का दूसरा प्रमुख भूकंपीय क्षेत्र है, जो भूमध्यसागर से तुर्किये, ईरान और उत्तरी भारत तक फैला है। भारत में इसलिए रिंग ऑफ फायर की गतिविधि को सीधे दिल्ली, उत्तराखंड, हिमाचल या पूर्वोत्तर में बड़े भूकंप की भविष्यवाणी के रूप में देखना सही नहीं होगा। देश के लिए स्थानीय फॉल्ट, हिमालयी टेक्टोनिक्स और क्षेत्रीय भूकंपीय इतिहास ज्यादा प्रासंगिक हैं।
भूकंप जमीन के नीचे मौजूद फॉल्ट में अचानक तनाव रिलीज होने से पैदा होते हैं। वैज्ञानिक फॉल्ट की संरचना, ऐतिहासिक गतिविधि और भूकंपीय जोखिम का अध्ययन करते हैं, लेकिन उस तनाव के ठीक किस क्षण टूटने की भविष्यवाणी अभी संभव नहीं है। यूएसजीएस के अनुसार किसी वैज्ञानिक भूकंप भविष्यवाणी में तारीख और समय, स्थान तथा तीव्रता तीनों स्पष्ट होने चाहिए। अभी वैज्ञानिक इस तरह की सटीक भविष्यवाणी करने में सक्षम नहीं हैं। यही कारण है कि किसी सप्ताह में भूकंपों की संख्या देखकर भविष्य की आपदा तय मान लेना वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं है।
भूकंप का सही समय पहले से पता न चल पाने की स्थिति में जोखिम कम करने का सबसे प्रभावी तरीका तैयारी है। सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में भवन निर्माण मानकों, इमरजेंसी रिस्पॉन्स, शुरुआती चेतावनी प्रणालियों और जन-जागरूकता की भूमिका महत्वपूर्ण है। यूएसजीएस का शेकअलर्ट सिस्टम उदाहरण देता है कि भूकंप शुरू होने के बाद मजबूत झटकों के पहुंचने से पहले कुछ इलाकों में चेतावनी दी जा सकती है। यह भविष्यवाणी नहीं, बल्कि भूकंप शुरू होने के बाद मिलने वाली अर्ली वार्निंग है। इस अंतर को समझना जरूरी है। अर्ली वार्निंग का मतलब भूकंप आने से पहले उसकी तारीख बताना नहीं है।
आने वाले दिनों में वैज्ञानिक मुख्य रूप से यह देखेंगे कि सक्रिय क्षेत्रों में भूकंपों की संख्या और तीव्रता किस तरह बदलती है। किसी बड़े भूकंप के बाद आफ्टरशॉक पैटर्न भी महत्वपूर्ण रहेगा। साथ ही, स्थानीय भूकंपीय नेटवर्क और यूएसजीएस जैसे संस्थानों के डेटा से नए घटनाक्रम सामने आते रहेंगे। किसी बड़े बदलाव की स्थिति में जोखिम का वैज्ञानिक आकलन अपडेट हो सकता है। फिलहाल उपलब्ध डेटा से किसी नए बड़े भूकंप की निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। यही सबसे अहम तथ्य है।
सात दिनों में 4.5 या उससे अधिक तीव्रता के 187 भूकंपों का आंकड़ा निश्चित तौर पर ध्यान खींचता है। इंडोनेशिया में 7.7 और पेरू में 6.7 तीव्रता के भूकंपों ने इस चर्चा को और गंभीर बनाया है। लेकिन उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी यह नहीं कहती कि 187 भूकंप किसी आने वाली महाआपदा का संकेत हैं। इनमें से 187 का आंकड़ा पूरी दुनिया का है, केवल रिंग ऑफ फायर का नहीं। रिंग ऑफ फायर पहले से ही दुनिया का सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र है और करीब 90 प्रतिशत वैश्विक भूकंप इसी बेल्ट के आसपास आते हैं। इसलिए मौजूदा गतिविधि को समझने का सही तरीका डर फैलाना नहीं, बल्कि प्लेट टेक्टोनिक्स, स्थानीय जोखिम और वैज्ञानिक निगरानी को समझना है। अभी सबसे जिम्मेदार निष्कर्ष यही है कि भूकंपीय गतिविधि पर नजर रखना जरूरी है, लेकिन 187 भूकंपों को किसी निश्चित बड़े भूकंप की भविष्यवाणी बताने का कोई पुख्ता वैज्ञानिक आधार नहीं है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।