लखनऊ के जेपीएनआईसी को 30 साल की लीज पर निजी समूह को देने के फैसले पर अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार को घेरा। एलडीए के मुताबिक संपत्ति की बिक्री नहीं हुई है।
Location
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
Date
27 अगस्त 2026
By Line
Mohd Naved
लखनऊ में जय प्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र यानी जेपीएनआईसी को निजी समूह को 30 साल की लीज पर देने का फैसला उत्तर प्रदेश की सियासत में नया विवाद बन गया है। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने लखनऊ विकास प्राधिकरण के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इसके बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है।
अखिलेश यादव ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए पूछा कि भाजपा सरकार है या दुकानदार। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सार्वजनिक संपत्तियों को निजी हाथों में देने की नीति पर आगे बढ़ रही है। दूसरी ओर, प्रशासनिक पक्ष का कहना है कि जेपीएनआईसी की जमीन और पूरी संपत्ति का स्वामित्व लखनऊ विकास प्राधिकरण के पास ही रहेगा। मामला बिक्री का नहीं, बल्कि संचालन और रखरखाव के लिए दी गई दीर्घकालिक लीज का है।
जेपीएनआईसी को लेकर क्या हुआ फैसला
उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने 25 अगस्त 2026 को जेपीएनआईसी को 30 साल की लीज पर निजी समूह को देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, चयनित समूह में रॉकवुड होटल्स एंड रिजॉर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड और वृंदावन बॉटलर्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं।
लीज के बदले निजी समूह की ओर से लखनऊ विकास प्राधिकरण को 831 करोड़ रुपये दिए जाने हैं। रिपोर्टों के मुताबिक संचालन के दौरान केंद्र के रखरखाव और बचे हुए काम को पूरा करने की जिम्मेदारी निजी संचालक की होगी। वार्षिक भुगतान और उसमें प्रस्तावित वृद्धि को लेकर भी लीज व्यवस्था में प्रावधान बताए गए हैं।
यहां एक अहम फर्क समझना जरूरी है। कई राजनीतिक बयानों में इसे जेपीएनआईसी को बेचने के तौर पर पेश किया गया है, लेकिन एलडीए के अधिकारियों के मुताबिक संपत्ति का मालिकाना हक प्राधिकरण के पास ही रहेगा। निजी समूह को संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी दी जाएगी।
अखिलेश यादव ने क्यों साधा निशाना
समाजवादी पार्टी के लिए जेपीएनआईसी महज एक सरकारी इमारत नहीं है। यह परियोजना अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान विकसित हुई थी और उनकी सरकार की प्रमुख शहरी परियोजनाओं में शामिल रही। केंद्र का उद्घाटन 2016 में हुआ था, लेकिन इसके कई हिस्सों का काम पूरा नहीं हो सका और बाद के वर्षों में इसका प्रभावी इस्तेमाल नहीं हो पाया।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में अखिलेश यादव ने लीज के फैसले को लेकर सरकार पर हमला किया। उनका आरोप है कि भाजपा सरकार सार्वजनिक परिसंपत्तियों को निजी हाथों में देने की दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि अब सरकार को ही ठेके पर देने या बेचने की बात बाकी रह गई है।
अखिलेश का बयान राजनीतिक आरोप है। इसे सरकार की ओर से प्रमाणित तथ्य के तौर पर नहीं देखा जा सकता। सरकार और एलडीए की ओर से उपलब्ध स्पष्टीकरण में इसे निजीकरण की बजाय संचालन और रखरखाव के लिए लीज व्यवस्था बताया गया है।
सरकार और एलडीए का पक्ष क्या है
सरकारी पक्ष की बुनियादी दलील यह है कि लंबे समय से कम उपयोग में रहे जेपीएनआईसी को सक्रिय किया जाए और इसके संचालन का वित्तीय बोझ निजी भागीदारी के जरिए कम किया जाए।
एलडीए के मुताबिक, संपत्ति का स्वामित्व प्राधिकरण के पास रहेगा। चयनित संचालक निविदा की शर्तों के अनुसार परिसर का संचालन और रखरखाव करेगा। यानी 30 साल की अवधि पूरी होने के बाद भी संपत्ति का मालिकाना हक निजी कंपनी को हस्तांतरित होने की बात नहीं है।
सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी रही है कि जेपीएनआईसी जैसी बड़ी परियोजना लंबे समय तक अधूरी और कम उपयोग वाली स्थिति में रही। परियोजना पर खर्च बढ़ने को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। पुरानी रिपोर्टों के मुताबिक शुरुआती अनुमान करीब 265 करोड़ रुपये था, जबकि परियोजना की लागत बाद में 800 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गई।
जेपीएनआईसी का इतिहास और विवाद
जेपीएनआईसी लखनऊ के गोमतीनगर में स्थित एक बहुउद्देशीय परिसर है। इसकी परिकल्पना सम्मेलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल और अन्य सार्वजनिक गतिविधियों के लिए की गई थी। परियोजना में सम्मेलन केंद्र, संग्रहालय, पार्किंग और अन्य सुविधाओं का प्रावधान रहा है।
निर्माण कार्य 2013 के आसपास शुरू हुआ था। परियोजना के कई हिस्से पूरे हुए, लेकिन पूरा परिसर लंबे समय तक अपेक्षित तरीके से संचालित नहीं हो सका। 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद परियोजना को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद भी सामने आते रहे।
समय के साथ जेपीएनआईसी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का प्रतीक बन गया। सपा इसे अपने शासनकाल की विकास परियोजना के तौर पर पेश करती रही है, जबकि भाजपा सरकार ने इसकी लागत, अधूरे काम और लंबे समय तक उपयोग न होने को लेकर सवाल उठाए हैं।
किसान बाजार का मुद्दा भी क्यों जुड़ा
जेपीएनआईसी पर मौजूदा विवाद के बीच अखिलेश यादव ने पहले से उठाते रहे किसान बाजार और दूसरी सार्वजनिक परिसंपत्तियों के मुद्दे को भी राजनीतिक बहस से जोड़ा है।
अखिलेश यादव ने अलग-अलग मौकों पर आरोप लगाया है कि सपा शासनकाल में तैयार किसान बाजार और दूसरी परियोजनाओं को भाजपा सरकार ने बेच दिया या उनका स्वरूप बदल दिया। इन दावों को लेकर भी राजनीतिक पक्षों के बीच मतभेद रहे हैं। इसलिए किसान बाजार से जुड़े आरोपों को राजनीतिक बयान के रूप में ही रिपोर्ट करना उचित है, जब तक संबंधित संपत्ति की बिक्री, हस्तांतरण या उपयोग परिवर्तन के आधिकारिक दस्तावेज सामने न हों।
यही वजह है कि जेपीएनआईसी का मुद्दा केवल एक भवन के संचालन का मामला नहीं रह गया है। इसके साथ सार्वजनिक संपत्ति, सरकारी निवेश, निजी भागीदारी और राजनीतिक विरासत जैसे सवाल भी जुड़ गए हैं।
निजी भागीदारी बनाम सरकारी नियंत्रण
जेपीएनआईसी प्रकरण में असली बहस इस बात पर है कि बड़ी सार्वजनिक परियोजनाओं का संचालन सरकार खुद करे या निजी क्षेत्र को दीर्घकालिक लीज के जरिए जिम्मेदारी सौंपी जाए।
निजी भागीदारी के पक्ष में तर्क है कि इससे लंबे समय से निष्क्रिय परिसंपत्ति का इस्तेमाल शुरू हो सकता है। सरकार को संचालन और रखरखाव का पूरा वित्तीय बोझ नहीं उठाना पड़ेगा। साथ ही निजी संचालक से व्यावसायिक प्रबंधन और नई गतिविधियों की उम्मीद की जा सकती है।
दूसरी ओर, आलोचना यह है कि सार्वजनिक जमीन और सरकारी निवेश से तैयार परिसंपत्तियों के संचालन में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ने से पारदर्शिता और सार्वजनिक हित से जुड़े सवाल उठ सकते हैं। ऐसे मामलों में लीज की शर्तें, राजस्व व्यवस्था, उपयोग की सीमा, निगरानी और जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
सियासी असर क्या होगा
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले जेपीएनआईसी का मुद्दा भाजपा और सपा के बीच राजनीतिक बयानबाजी को और तेज कर सकता है। अखिलेश यादव इसे भाजपा सरकार की परिसंपत्ति नीति के खिलाफ मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं।
भाजपा और सरकार के लिए चुनौती यह साबित करने की होगी कि लीज व्यवस्था से जेपीएनआईसी को वास्तविक उपयोग मिलेगा और सार्वजनिक संपत्ति के हितों की पर्याप्त सुरक्षा होगी। दूसरी तरफ सपा के सामने यह सवाल रहेगा कि लंबे समय तक अधूरी रही परियोजना को वह अपने शासनकाल की उपलब्धि के रूप में किस तरह जनता के सामने रखती है।
राजनीतिक आरोपों से अलग असली कसौटी परियोजना के संचालन, वित्तीय पारदर्शिता और जनता के लिए उपलब्ध सुविधाओं से तय होगी।
अब आगे क्या
कैबिनेट की मंजूरी के बाद अगला चरण लीज समझौते और निविदा की शर्तों के मुताबिक संचालन की प्रक्रिया का है। निजी संचालक को परिसर के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी संभालनी होगी। इसके साथ यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि अधूरे काम कितनी तेजी से पूरे होते हैं और जेपीएनआईसी का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है।
जनता की निगाह इस बात पर भी रहेगी कि 831 करोड़ रुपये की लीज व्यवस्था में सरकार और एलडीए को किस तरह का वित्तीय लाभ मिलता है, निजी संचालक पर क्या दायित्व तय किए गए हैं और परिसर की सार्वजनिक उपयोगिता कितनी बनी रहती है।
जेपीएनआईसी का विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक परिसंपत्तियों के प्रबंधन और निजी भागीदारी की बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है। अखिलेश यादव का विरोध राजनीतिक तौर पर स्वाभाविक है, लेकिन अंतिम मूल्यांकन तथ्यों, लीज की शर्तों और आने वाले वर्षों में परियोजना के वास्तविक इस्तेमाल से होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।