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बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम आंखों के लिए कितना खतरनाक?

Shah Times • 2026-08-25 15:35:45
बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम आंखों के लिए कितना खतरनाक?

बच्चों की आंखों पर भारी पड़ रहा स्क्रीन टाइम?

मोबाइल और स्क्रीन से बच्चों की आंखों को कितना खतरा?

बच्चों में बढ़ रही मायोपिया की चिंता, स्क्रीन टाइम पर दें ध्यान


बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम आंखों की सेहत को प्रभावित कर रहा है। शोध में स्क्रीन एक्सपोजर और मायोपिया के बीच संबंध मिला है। लंबे समय तक नजदीक देखने, कम आउटडोर गतिविधि और बिना ब्रेक स्क्रीन इस्तेमाल करने से आंखों पर दबाव बढ़ता है। नियमित ब्रेक और आउटडोर समय बचाव के अहम उपाय हैं।


नई दिल्ली | 25 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स

By Mohd Haris


बच्चों की आंखों पर बढ़ता स्क्रीन टाइम क्यों बना चिंता का विषय

मोबाइल फोन, टैबलेट, कंप्यूटर और दूसरे डिजिटल डिवाइस अब बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई, ऑनलाइन क्लास, गेमिंग और मनोरंजन के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल बढ़ने के साथ बच्चों की आंखों की सेहत को लेकर विशेषज्ञों की चिंता भी बढ़ी है।

हालिया मेडिकल रिसर्च और विशेषज्ञों की सलाह से यह संकेत मिलता है कि लंबे समय तक डिजिटल स्क्रीन देखने का संबंध आंखों में तनाव और मायोपिया जैसे विजन प्रॉब्लम्स से जुड़ सकता है। हालांकि, स्क्रीन को अकेले बच्चों की नजर कमजोर होने की एकमात्र वजह मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। स्क्रीन टाइम के साथ नजदीक से काम करना और आउटडोर गतिविधियों की कमी भी अहम भूमिका निभाते हैं।

स्क्रीन टाइम और मायोपिया के बीच क्या संबंध है

मायोपिया यानी निकट दृष्टिदोष में बच्चे पास की चीजें साफ देख लेते हैं, लेकिन दूर की वस्तुएं धुंधली दिखाई दे सकती हैं। यह स्थिति आंख की संरचना में बदलाव से जुड़ी होती है और बचपन में शुरू होने पर समय के साथ बढ़ सकती है। 2025 में जामा नेटवर्क ओपन में प्रकाशित एक सिस्टमेटिक रिव्यू और डोज-रिस्पॉन्स मेटा-एनालिसिस में 45 अध्ययनों और 3,35,524 लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें डिजिटल स्क्रीन टाइम और मायोपिया के जोखिम के बीच महत्वपूर्ण संबंध पाया गया। विश्लेषण में स्क्रीन टाइम बढ़ने के साथ मायोपिया का जोखिम भी बढ़ता दिखाई दिया, खासकर करीब एक से चार घंटे के बीच। इसका मतलब यह नहीं है कि हर बच्चा ज्यादा स्क्रीन देखने से मायोपिक हो जाएगा। जेनेटिक फैक्टर, पढ़ाई का तरीका, नजदीक से काम करने की आदत और आउटडोर एक्सपोजर भी मायोपिया के जोखिम को प्रभावित करते हैं।

आंखों में थकान से लेकर ड्राई आई तक

लंबे समय तक स्क्रीन देखने पर बच्चों में डिजिटल आई स्ट्रेन के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इनमें आंखों में थकान, जलन, सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना और आंखों में सूखापन शामिल हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड की फरवरी २०२६ की रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने बच्चों में मायोपिया, डिजिटल आई स्ट्रेन, ड्राई आई और कुछ मामलों में इंटरमिटेंट स्क्विंट जैसे लक्षणों को लंबे समय तक डिजिटल डिवाइस इस्तेमाल और नजदीक से काम करने से जोड़ा। स्क्रीन देखने के दौरान पलक झपकने की दर भी कम हो जाती है। इससे आंखों की सतह पर नमी जल्दी कम हो सकती है और ड्राई आई जैसे लक्षण उभर सकते हैं। यह समस्या लंबे समय तक लगातार स्क्रीन देखने पर ज्यादा महसूस हो सकती है।

क्या सिर्फ मोबाइल ही आंखों की कमजोरी की वजह है

यह धारणा अधूरी है कि बच्चों की नजर कमजोर होने के पीछे केवल मोबाइल या स्क्रीन जिम्मेदार है। वैज्ञानिक साहित्य में स्क्रीन टाइम, नजदीक से देखने और आउटडोर गतिविधियों के बीच संबंध को साथ में देखा जाता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी भी बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को संतुलित करने और आउटडोर समय बढ़ाने की सलाह देती है। संस्था के अनुसार स्क्रीन इस्तेमाल को पूरी तरह खत्म करने के बजाय बच्चे की दिनचर्या में संतुलन बनाना जरूरी है। यानी समस्या केवल डिवाइस नहीं है। समस्या तब बढ़ सकती है जब बच्चा लंबे समय तक लगातार एक ही दूरी पर स्क्रीन देखता रहे और बाहर प्राकृतिक रोशनी में पर्याप्त समय न बिताए।

आउटडोर गतिविधि क्यों अहम है

मायोपिया की रोकथाम में आउटडोर एक्टिविटी को महत्वपूर्ण माना गया है। शोध में पाया गया है कि बाहर समय बिताने से बच्चों में मायोपिया शुरू होने और मायोपिक बदलाव का जोखिम कम हो सकता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार आउटडोर समय बढ़ाने से मायोपिया की शुरुआत और मायोपिक शिफ्ट का जोखिम कम हुआ, खासकर उन बच्चों में जिन्हें पहले मायोपिया नहीं था।

इसका एक कारण प्राकृतिक रोशनी से जुड़ा जैविक प्रभाव माना जाता है। इसलिए बच्चे की दिनचर्या में खेल, पैदल चलना और बाहर की गतिविधियां शामिल करना आंखों की सेहत के लिहाज से उपयोगी रणनीति है।

20-20-20 नियम से क्या फायदा हो सकता है

बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल में छोटे-छोटे ब्रेक आंखों के तनाव को कम करने में मदद कर सकते हैं। आम तौर पर 20-20-20 नियम की सलाह दी जाती है। इस नियम के तहत हर २० मिनट बाद करीब २० सेकंड के लिए कम से कम 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखना होता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल के संदर्भ में नियमित ब्रेक और उचित स्क्रीन व्यवहार पर जोर देती है। यह नियम मायोपिया का इलाज नहीं है। इसका उद्देश्य लगातार नजदीक देखने से होने वाले विजुअल स्ट्रेन को कम करना है।

स्क्रीन कितनी दूरी पर होनी चाहिए

स्क्रीन की दूरी भी महत्वपूर्ण है। बच्चों को फोन या टैबलेट आंखों के बेहद करीब रखकर देखने से बचना चाहिए। 2026 की बिजनेस स्टैंडर्ड रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने फोन और दूसरे डिजिटल डिवाइस को आंखों से पर्याप्त दूरी पर रखने और लंबे स्क्रीन सेशन को छोटे हिस्सों में बांटने की सलाह दी। रिपोर्ट में 30 से 40 सेंटीमीटर की दूरी जैसे व्यावहारिक उपायों का उल्लेख किया गया है। स्क्रीन की ऊंचाई, कमरे की रोशनी और बैठने की मुद्रा भी मायने रखती है। बहुत तेज रोशनी, चकाचौंध या बेहद अंधेरे कमरे में स्क्रीन देखने से आंखों पर असुविधा बढ़ सकती है।

छोटे बच्चों के लिए ज्यादा सतर्कता जरूरी

छोटे बच्चों में स्क्रीन को लेकर सावधानी ज्यादा जरूरी है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी ने जुलाई 2026 में बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल पर अपनी सलाह में छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन एक्सपोजर को सीमित रखने और उम्र के हिसाब से डिजिटल मीडिया का संतुलित इस्तेमाल करने पर जोर दिया। यहां माता-पिता की भूमिका अहम है। बच्चे को केवल स्क्रीन से दूर रखने के बजाय उसके दिन का एक स्पष्ट रूटीन बनाना ज्यादा व्यावहारिक तरीका है। पढ़ाई, स्क्रीन आधारित गतिविधि, नींद, शारीरिक खेल और आउटडोर समय के बीच संतुलन जरूरी है।

बच्चों की आंखों में कौन से संकेत नजरअंदाज न करें

अगर बच्चा बार-बार आंखें मलता है, स्क्रीन को बहुत पास लाकर देखता है, टीवी या बोर्ड देखने के लिए आंखें सिकोड़ता है, सिरदर्द की शिकायत करता है या दूर की चीजें साफ देखने में परेशानी बताता है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। स्कूल में बोर्ड देखने में परेशानी, बार-बार आंखों में जलन या लगातार सिरदर्द भी विजन टेस्ट की जरूरत का संकेत हो सकते हैं। मायोपिया शुरुआती चरण में पकड़ में आने पर इसकी निगरानी और प्रबंधन बेहतर तरीके से किया जा सकता है। माता-पिता को केवल इस आधार पर इंतजार नहीं करना चाहिए कि बच्चा खुद आंखों की समस्या की शिकायत करेगा। नियमित आई चेकअप खासकर उन बच्चों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके परिवार में मायोपिया का इतिहास रहा है।

ब्लू लाइट को लेकर क्या है सच्चाई

स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट को लेकर कई दावे सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया में दिखाई देते हैं। लेकिन उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि ब्लू लाइट सीधे बच्चों में मायोपिया की मुख्य वजह है। २०२६ की बिजनेस स्टैंडर्ड रिपोर्ट में भी विशेषज्ञों ने ब्लू लाइट और मायोपिया के बीच सीधे कारणात्मक संबंध को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत बताई। स्क्रीन इस्तेमाल से जुड़ी आंखों की परेशानी का बड़ा मुद्दा लगातार नजदीक देखना, कम पलक झपकाना और लंबे समय तक बिना ब्रेक स्क्रीन इस्तेमाल करना है। इसलिए केवल ब्लू-लाइट फिल्टर को समाधान मानना सही रणनीति नहीं है। स्क्रीन की अवधि, दूरी, ब्रेक और आउटडोर गतिविधि पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।

भारत में बढ़ता मायोपिया क्यों चिंता का विषय है

भारत में बच्चों में मायोपिया को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जा रही है। 2025 में इंडिया टुडे ने विशेषज्ञों के हवाले से रिपोर्ट किया था कि भारतीय स्कूली बच्चों में मायोपिया का अनुपात बढ़ रहा है और मौजूदा जीवनशैली में बदलाव नहीं हुआ तो आने वाले दशकों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

हालिया भारतीय रिपोर्टिंग में भी बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल और कम आउटडोर एक्टिविटी को लेकर विशेषज्ञों की चिंता सामने आई है। बिहार से जुड़ी हालिया रिपोर्ट में डॉक्टरों ने स्कूल स्तर पर आई स्क्रीनिंग, स्क्रीन टाइम को व्यवस्थित करने और बच्चों को ज्यादा आउटडोर गतिविधियों से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया। इन आंकड़ों को पूरे भारत की मौजूदा स्थिति का सीधा प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा। अलग-अलग राज्यों, आयु समूहों और अध्ययनों में आंकड़े अलग हो सकते हैं। लेकिन उपलब्ध शोध एक व्यापक स्वास्थ्य चिंता की तरफ जरूर इशारा करते हैं।

माता-पिता के लिए सबसे जरूरी संदेश

बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर लक्ष्य तकनीक को पूरी तरह हटाना नहीं होना चाहिए। पढ़ाई और डिजिटल लर्निंग के लिए स्क्रीन जरूरी हो सकती है। सवाल इस्तेमाल के तरीके और संतुलन का है। लंबे स्क्रीन सेशन के बीच नियमित ब्रेक रखें। फोन को आंखों के बहुत करीब न आने दें। कमरे में पर्याप्त रोशनी रखें। बच्चे को रोजाना आउटडोर गतिविधियों के लिए समय दें और सोने से पहले स्क्रीन इस्तेमाल को सीमित करें। अगर बच्चे को लगातार धुंधला दिखाई दे, सिरदर्द हो, आंखों में दर्द या जलन रहे या वह दूर की चीजें देखने में परेशानी महसूस करे, तो आई स्पेशलिस्ट से जांच कराना बेहतर है।

आगे क्या करना जरूरी है

स्क्रीन आधारित शिक्षा और डिजिटल मनोरंजन आने वाले समय में बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बने रहेंगे। इसलिए नीति और परिवार दोनों स्तरों पर व्यावहारिक स्क्रीन हेल्थ गाइडलाइन की जरूरत बढ़ रही है। स्कूलों में नियमित विजन स्क्रीनिंग, बच्चों के लिए पर्याप्त आउटडोर समय, सही बैठने की व्यवस्था और डिजिटल क्लास के दौरान छोटे ब्रेक इस दिशा में उपयोगी कदम हो सकते हैं। सबसे अहम बात यह है कि स्क्रीन टाइम को लेकर डर पैदा करने के बजाय सही व्यवहार विकसित किया जाए। मौजूदा प्रमाण बताते हैं कि लंबे डिजिटल स्क्रीन एक्सपोजर और मायोपिया के बीच संबंध मौजूद है, लेकिन बच्चे की आंखों की सेहत पर असर कई कारकों से तय होता है।

निष्कर्ष

बच्चों का स्क्रीन टाइम अब केवल पैरेंटिंग का मुद्दा नहीं रहा। यह पब्लिक हेल्थ और आई हेल्थ से जुड़ा विषय बन चुका है। उपलब्ध रिसर्च स्क्रीन एक्सपोजर और मायोपिया के बीच संबंध की तरफ इशारा करती है, जबकि कम आउटडोर समय और लगातार नजदीक से काम करना जोखिम को बढ़ा सकते हैं। इसलिए समाधान केवल मोबाइल छीन लेना नहीं है। बेहतर स्क्रीन आदतें, नियमित ब्रेक, उचित दूरी, पर्याप्त नींद और रोजाना आउटडोर गतिविधि ज्यादा व्यावहारिक रास्ता है। बच्चों में नजर से जुड़े लक्षण दिखें तो समय पर आई टेस्ट कराना सबसे अहम कदम है।

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Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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