वृद्धि हुई। मृत दाताओं की संख्या भी बढ़ी। यह हेल्थ सिस्टम में सुधार और नीति प्रभाव का संकेत है।
📍 नई दिल्ली
📰 4 अगस्त 2026
✍️ By Asif Khan
भारत के हेल्थ सेक्टर में एक अहम बदलाव सामने आया है। साल 2025 में देशभर में 20,138 अंग प्रत्यारोपण दर्ज किए गए। यह आंकड़ा किसी एक वर्ष का अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड माना जा रहा है।
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने 16वें भारतीय अंगदान दिवस के मौके पर यह डेटा साझा किया। उनका कहना है कि यह बढ़ोतरी केवल मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि पब्लिक अवेयरनेस और पॉलिसी स्ट्रैटेजी का संयुक्त असर है।
2023 में शुरू किया गया राष्ट्रीय डिजिटल अंगदान पोर्टल इस बदलाव का केंद्र बनकर उभरा है। सरकार के मुताबिक 5 लाख से ज्यादा लोगों ने आधार वेरिफिकेशन के साथ अंगदान की शपथ ली है।
इस डिजिटल सिस्टम ने रजिस्ट्रेशन, ट्रैकिंग और एलोकेशन प्रोसेस को अधिक ट्रांसपेरेंट बनाया। पहले जहां डेटा बिखरा हुआ था, अब एक केंद्रीकृत प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।
डेटा का तुलनात्मक विश्लेषण साफ संकेत देता है कि पिछले एक दशक में बड़ा बदलाव आया है।
2013 में कुल 4,990 प्रत्यारोपण हुए थे। 2025 तक यह संख्या बढ़कर 20,138 पहुंच गई। यानी करीब चार गुना वृद्धि दर्ज की गई।
मृत दाताओं से होने वाले ट्रांसप्लांट भी बढ़े हैं। 2013 में यह संख्या 837 थी। 2025 में यह बढ़कर 3,526 हो गई।
भारत अब कुल अंग प्रत्यारोपण के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर है।
जीवित दाताओं से होने वाले ट्रांसप्लांट में भारत पहले स्थान पर बना हुआ है। यह स्थिति भारत के फैमिली-आधारित डोनेशन मॉडल को दर्शाती है।
हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि मृत दाताओं की हिस्सेदारी अभी भी विकसित देशों की तुलना में कम है।
अंगदान को हेल्थ सेक्टर में सबसे बड़ा लाइफ-सेविंग इंटरवेंशन माना जाता है।
एक दाता एक साथ कई लोगों को नया जीवन दे सकता है। किडनी, लिवर, हार्ट, लंग्स और कॉर्निया जैसे अंग हजारों मरीजों की जिंदगी बचाते हैं।
मंत्री अनुप्रिया पटेल ने इसे “सबसे बड़ा मानवीय कार्य” बताया।
रिकॉर्ड आंकड़ों के बावजूद कई चुनौतियां बनी हुई हैं।
ग्रामीण इलाकों में जागरूकता अभी भी सीमित है। ब्रेन-डेथ की पहचान और प्रमाणन प्रक्रिया हर अस्पताल में मजबूत नहीं है।
ट्रांसप्लांट इंफ्रास्ट्रक्चर बड़े शहरों तक सीमित है। छोटे शहरों में सर्जिकल क्षमता और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है।
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई कदम उठाए हैं।
NOTTO के जरिए नेशनल नेटवर्क को मजबूत किया गया। स्टेट और रीजनल लेवल पर ऑर्गन कोऑर्डिनेशन सिस्टम बनाया गया।
ग्रीन कॉरिडोर जैसी व्यवस्थाओं ने ट्रांसपोर्ट टाइम कम किया। इससे अंगों की उपयोगिता बढ़ी।
कुछ हेल्थ एनालिस्ट मानते हैं कि डेटा में सुधार के पीछे बेहतर रिपोर्टिंग भी एक फैक्टर है।
दूसरी ओर, सिविल सोसायटी ग्रुप्स का कहना है कि अभी भी डोनेशन रेट को और बढ़ाने की जरूरत है।
एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या जागरूकता अभियान ग्रामीण और कमजोर वर्ग तक समान रूप से पहुंच पा रहे हैं या नहीं।
अंग प्रत्यारोपण केवल मेडिकल मुद्दा नहीं, बल्कि इकोनॉमी से भी जुड़ा है।
ट्रांसप्लांट सर्जरी महंगी होती है। प्राइवेट सेक्टर में इसकी लागत लाखों में पहुंचती है।
सरकारी योजनाओं जैसे आयुष्मान भारत ने कुछ राहत दी है, लेकिन कवरेज अभी भी सीमित माना जाता है।
अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में मृत दाताओं की संख्या अधिक है। वहां “ऑप्ट-आउट” सिस्टम लागू है, जहां हर नागरिक संभावित दाता माना जाता है।
भारत में अभी “ऑप्ट-इन” मॉडल है, जहां व्यक्ति को खुद रजिस्टर करना पड़ता है।
इस मॉडल में बदलाव को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है।
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि आने वाले वर्षों में तीन क्षेत्रों पर फोकस जरूरी है।
पहला, ग्रामीण जागरूकता अभियान।
दूसरा, अस्पताल स्तर पर ब्रेन-डेथ सर्टिफिकेशन सिस्टम मजबूत करना।
तीसरा, डिजिटल प्लेटफॉर्म को और इंटीग्रेट करना।
अगर ये सुधार होते हैं, तो भारत वैश्विक स्तर पर और ऊपर जा सकता है।
अंग प्रत्यारोपण भारत में बढ़ते आंकड़े एक पॉजिटिव ट्रेंड दिखाते हैं।
यह हेल्थ पॉलिसी, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक जागरूकता के संयुक्त असर का परिणाम है।
फिर भी चुनौती यह है कि इस प्रगति को पूरे देश में समान रूप से लागू किया जाए।
जब तक हर क्षेत्र में समान पहुंच नहीं होगी, तब तक यह सफलता अधूरी मानी जाएगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।