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एंटीबायोटिक दवाओं का असर क्यों हो रहा है कम? भारतीय अध्ययन ने बढ़ाई चिंता

Neelam Saini 2026-09-07 20:45:36
एंटीबायोटिक दवाओं का असर क्यों हो रहा है कम? भारतीय अध्ययन ने बढ़ाई चिंता

आईसीएमआर के अध्ययन में दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों से मृत्यु और इलाज का खर्च अधिक पाया गया। विशेषज्ञों ने निगरानी, संक्रमण नियंत्रण और एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण इस्तेमाल पर जोर दिया।

एंटीबायोटिक दवाओं का असर क्यों हो रहा है कम?

एंटीबायोटिक दवाएं आधुनिक चिकित्सा की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल हैं, लेकिन इनके सामने अब एक गंभीर चुनौती खड़ी हो रही है। जब बैक्टीरिया उन दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं जिनसे उन्हें खत्म किया जाता है, तो सामान्य संक्रमणों का इलाज भी मुश्किल हो सकता है। इसी चुनौती के बीच भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर से जुड़े एक बहुकेंद्रीय अध्ययन ने दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों के गंभीर असर को सामने रखा है। अध्ययन में देश के २० तृतीयक स्तर के अस्पतालों में अप्रैल २०२२ से अप्रैल २०२५ के बीच भर्ती मरीजों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध में चार प्रमुख ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया—ईशरीशिया कोलाई, क्लेबसिएला न्यूमोनिए, एसिनेटोबैक्टर बॉमानी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा—से होने वाले संक्रमणों पर खास तौर पर ध्यान दिया गया। 

करीब १.६ लाख मरीजों के आंकड़ों का विश्लेषण

शोध में कुल १,५९,३३६ अस्पताल में भर्ती मरीजों और करीब १७.६ लाख मरीज-दिवसों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। इनमें २७,२८३ मरीजों में सूक्ष्मजीव परीक्षण से संक्रमण की पुष्टि हुई और २६,२१३ मरीजों में ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया से संक्रमण पाया गया। 
अध्ययन का प्रमुख फोकस कार्बापेनेम नामक महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक वर्ग के प्रति प्रतिरोध पर था। गंभीर संक्रमणों में कार्बापेनेम दवाओं का इस्तेमाल महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में इन दवाओं के प्रति बैक्टीरिया का प्रतिरोध चिकित्सकों के लिए उपचार के विकल्प सीमित कर सकता है।

६१ प्रतिशत से अधिक संक्रमणों में कार्बापेनेम प्रतिरोध

अध्ययन में शामिल ग्राम-नेगेटिव संक्रमणों में ६१ प्रतिशत से अधिक मामलों में कार्बापेनेम प्रतिरोध दर्ज किया गया। हालांकि, यह आंकड़ा अध्ययन में शामिल अस्पतालों और मरीजों से संबंधित है; इसे पूरे भारत की सामान्य आबादी में कार्बापेनेम प्रतिरोध की दर नहीं माना जाना चाहिए। शोधकर्ताओं ने पाया कि कार्बापेनेम-प्रतिरोधी संक्रमण वाले मरीजों में समान बैक्टीरिया से होने वाले संवेदनशील संक्रमणों की तुलना में मृत्यु का जोखिम अधिक था। ईशरीशिया कोलाई के लिए मृत्यु का सापेक्ष जोखिम १.४१, क्लेबसिएला न्यूमोनिए के लिए १.३३, एसिनेटोबैक्टर बॉमानी के लिए १.१६ और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा के लिए १.४३ दर्ज किया गया। 

रक्त में संक्रमण होने पर खतरा और गंभीर

अध्ययन में रक्तप्रवाह से जुड़े संक्रमण विशेष रूप से चिंता का विषय रहे। कार्बापेनेम-प्रतिरोधी गैर-किण्वक ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया से होने वाले रक्तप्रवाह संक्रमणों में मृत्यु दर सबसे अधिक दर्ज की गई और यह कुछ समूहों में लगभग ४६ से ५१ प्रतिशत तक रही। हालांकि, विशेषज्ञों ने यह सावधानी भी बताई है कि केवल एंटीबायोटिक प्रतिरोध को मृत्यु का स्वतंत्र कारण मानना सही नहीं होगा। मरीज की बीमारी की गंभीरता, सही उपचार शुरू होने में लगा समय, संक्रमण के स्रोत पर नियंत्रण और अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियां भी उपचार के नतीजों को प्रभावित करती हैं। 

इलाज का खर्च भी बढ़ा

दवा-प्रतिरोधी संक्रमण का असर सिर्फ मरीज की सेहत तक सीमित नहीं रहता। अध्ययन में प्रतिरोधी संक्रमणों के इलाज की लागत संवेदनशील संक्रमणों की तुलना में लगभग १.१ से २ गुना अधिक पाई गई। प्रतिरोधी बैक्टीरिया के मामले में प्रभावी दवाओं के विकल्प सीमित होने और अस्पताल में उपचार की जटिलता बढ़ने से आर्थिक बोझ भी बढ़ सकता है। इसका सीधा असर मरीज और उसके परिवार पर पड़ सकता है, खासकर तब जब लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने, अतिरिक्त जांच और महंगी दवाओं की जरूरत पड़े।

आखिर एंटीबायोटिक काम करना क्यों कम कर देते हैं?

एंटीबायोटिक प्रतिरोध यानी एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस उस स्थिति को कहा जाता है जब बैक्टीरिया या अन्य सूक्ष्मजीव उन दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं जिनसे पहले उनका इलाज किया जा सकता था।एंटीबायोटिक का अनावश्यक या गलत इस्तेमाल इस समस्या को बढ़ाने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक चुनौती केवल दवाओं के अत्यधिक इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। संक्रमण की रोकथाम में कमी, अस्पतालों में संक्रमण का प्रसार, सही जांच में देरी और प्रभावी उपचार शुरू करने में विलंब भी स्थिति को जटिल बना सकते हैं। आईसीएमआर ने अपनी हालिया सामग्री में भी एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध को भारत और दुनिया के लिए महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बताया है। परिषद के अनुसार, प्रतिरोध बढ़ने से बीमारी लंबी चल सकती है, स्वास्थ्य खर्च बढ़ सकता है और मृत्यु का जोखिम भी बढ़ सकता है। 

हर बुखार में एंटीबायोटिक जरूरी नहीं

इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरियल संक्रमण के इलाज के लिए होती हैं। सामान्य वायरल सर्दी-जुकाम जैसी स्थितियों में इनका इस्तेमाल अपने आप शुरू करना उचित नहीं है।आईसीएमआर ने एंटीमाइक्रोबियल दवाओं के विवेकपूर्ण इस्तेमाल के लिए उपचार संबंधी दिशानिर्देश जारी किए हैं और अस्पतालों में एंटीमाइक्रोबियल स्टूवर्डशिप कार्यक्रम को बढ़ावा दिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सही मरीज को सही दवा, उचित मात्रा और आवश्यक अवधि तक दी जाए। इसलिए किसी भी एंटीबायोटिक को डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू करना, बीच में बंद कर देना या किसी दूसरे व्यक्ति की बची हुई दवा इस्तेमाल करना नुकसानदेह हो सकता है।

अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण भी अहम

विशेषज्ञों के मुताबिक एंटीबायोटिक प्रतिरोध से मुकाबला केवल नई दवाएं विकसित करके नहीं किया जा सकता। अस्पतालों में हाथों की स्वच्छता, संक्रमण नियंत्रण, समय पर जांच, सही निदान और दवाओं के जिम्मेदार इस्तेमाल की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।आईसीएमआर ने देश में एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध की निगरानी के लिए नेटवर्क विकसित किया है। इसके माध्यम से अलग-अलग अस्पतालों से प्रतिरोध के पैटर्न और संक्रमण संबंधी आंकड़े जुटाए जाते हैं, ताकि उपचार संबंधी रणनीति और नीतियों को बेहतर बनाया जा सके। 

आगे क्या चुनौती है?

भारतीय अध्ययन का संदेश साफ है कि एंटीबायोटिक प्रतिरोध अब केवल प्रयोगशाला या अस्पतालों तक सीमित विषय नहीं है। इसका संबंध मरीज की सुरक्षा, उपचार की लागत और स्वास्थ्य व्यवस्था की क्षमता से भी है।

हालांकि अध्ययन मुख्य रूप से तृतीयक अस्पतालों में भर्ती मरीजों पर आधारित है, इसलिए इसके आंकड़ों को पूरे देश की आबादी पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी शोध में सामने आए निष्कर्ष इस बात की अहम चेतावनी देते हैं कि दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों की निगरानी और रोकथाम को मजबूत करना जरूरी है। आईसीएमआर के अनुसार आगे की रणनीति में बेहतर निगरानी, तेज और सटीक जांच, संक्रमण नियंत्रण तथा एंटीमाइक्रोबियल स्टूवर्डशिप को मजबूत करना अहम है। नई उपचार पद्धतियों और प्रभावी दवाओं तक मरीजों की पहुंच भी इस लड़ाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

निष्कर्ष:

एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम होना किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौती है। दवाओं का इस्तेमाल केवल चिकित्सकीय सलाह के अनुसार करना, संक्रमण से बचाव के उपाय अपनाना और डॉक्टर द्वारा बताई गई उपचार अवधि का पालन करना इस चुनौती से निपटने में अहम भूमिका निभा सकता है। साथ ही, अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में मजबूत संक्रमण नियंत्रण तथा वैज्ञानिक निगरानी इस लड़ाई की बुनियाद है।

महत्वपूर्ण सूचना

यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। किसी संक्रमण या एंटीबायोटिक उपचार का निर्णय चिकित्सक की सलाह और आवश्यक जांच के आधार पर ही किया जाना चाहिए।


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Neelam Saini

Neelam Saini

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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