अमेरिकी कोर्ट से गौतम अडानी को बड़ी कानूनी राहत
अडानी रिश्वत केस खारिज, लेकिन DOJ पर जज के गंभीर सवाल
10 अरब डॉलर के निवेश के बीच अडानी केस का फैसला क्यों अहम?
अमेरिकी जज ने गौतम अडानी के खिलाफ रिश्वत और फ्रॉड मामले को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि 10 अरब डॉलर के निवेश प्रस्ताव ने फैसले को प्रभावित नहीं किया। हालांकि, जज ने DOJ की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। अलग SEC मामले में अडानी ने 60 लाख डॉलर का सिविल भुगतान स्वीकार किया।
न्यूयॉर्क | 10 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
भारतीय कारोबारी गौतम अडानी के खिलाफ अमेरिका में चल रहा आपराधिक रिश्वत और फ्रॉड मामला अब खारिज हो गया है। न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन स्थित अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज निकोलस गरॉफिस ने सोमवार को अभियोजन पक्ष की याचिका मंजूर करते हुए अडानी के खिलाफ आपराधिक आरोपों को समाप्त कर दिया। हालांकि, फैसले के साथ अदालत ने अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट की कार्रवाई और उसके तौर-तरीके पर गंभीर सवाल भी दर्ज किए हैं।
यह मामला 2024 में तब सामने आया था, जब अमेरिकी अभियोजकों ने आरोप लगाया था कि अडानी और उनसे जुड़े लोगों ने भारत में सोलर एनर्जी कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए भारतीय सरकारी अधिकारियों को करीब 26.5 करोड़ डॉलर की कथित रिश्वत देने की योजना बनाई थी। अडानी समूह ने इन आरोपों को लगातार खारिज किया था।
अमेरिकी अभियोजन पक्ष के मुताबिक, मामला एक बड़े सोलर पावर प्रोजेक्ट से जुड़ा था। आरोप था कि अडानी समूह से जुड़ी कंपनियों ने भारत में सरकारी संस्थाओं से ऊर्जा खरीद समझौते हासिल करने के लिए रिश्वत देने की योजना बनाई और इसके बाद अमेरिकी निवेशकों के सामने कंपनी की एंटी-करप्शन स्थिति को गलत तरीके से पेश किया।
अमेरिकी अभियोजकों ने 2024 में आरोप लगाया था कि इस योजना के जरिए करीब 12 गीगावॉट सोलर पावर बेचने से जुड़े समझौतों से अरबों डॉलर के संभावित मुनाफे का रास्ता तैयार हो सकता था। अडानी और समूह ने आरोपों को बेबुनियाद बताया था और किसी गलत काम से इनकार किया था।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अडानी इस आपराधिक मामले में अमेरिका की अदालत में पेश नहीं हुए थे। मामले में गिरफ्तारी या ट्रायल की स्थिति भी नहीं बनी।
मई 2026 में अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट ने अदालत से आपराधिक आरोपों को खारिज करने की मांग की थी। DOJ ने कहा था कि उसने मामले की समीक्षा की और अभियोजन पर आगे संसाधन खर्च नहीं करने का फैसला लिया। यह निर्णय अभियोजन पक्ष के विवेकाधिकार के तहत लिया गया था।
जुलाई में DOJ ने अदालत के सामने अपने फैसले की विस्तृत वजह भी रखी। उसके मुताबिक मामला मुख्य रूप से विदेशी गतिविधियों से जुड़ा था, इसे साबित करना मुश्किल था और मौजूदा विभागीय प्राथमिकताओं के अनुरूप इस पर आगे संसाधन लगाना उचित नहीं माना गया।
यहीं से मामला सामान्य कानूनी कार्रवाई से निकलकर अमेरिकी न्याय व्यवस्था और अभियोजन प्रक्रिया की बहस का हिस्सा बन गया। जज गरॉफिस ने पहले DOJ की शुरुआती दलीलों को अपर्याप्त माना था और विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा था।
इस केस का सबसे संवेदनशील पहलू गौतम अडानी की नवंबर 2024 की अमेरिका में 10 अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा थी। अदालत ने यह जानना चाहा कि क्या इस निवेश प्रस्ताव का आपराधिक मामले को खत्म करने के फैसले से कोई संबंध था।
15 जुलाई को दाखिल एक शपथपत्र में अडानी ने स्वीकार किया कि उन्होंने पहले अमेरिका में 10 अरब डॉलर निवेश करने का वादा किया था। उन्होंने यह भी बताया कि उनके वकीलों ने DOJ के साथ बातचीत में इस निवेश प्रस्ताव को मामले के समाधान का हिस्सा बनाए जाने की संभावना पर चर्चा की थी।
लेकिन जज गरॉफिस ने अंततः कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर वह संतुष्ट हैं कि यह निवेश प्रस्ताव DOJ के मामले को खत्म करने के फैसले का कारण नहीं था। इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने आरोपों को गलत साबित किया या अडानी को ट्रायल के बाद बरी किया। मामला अभियोजन पक्ष के फैसले के आधार पर समाप्त हुआ है।
जज ने यह भी कहा कि इस तरह के वित्तीय प्रस्तावों का न्याय के समान प्रशासन और कानून के शासन पर क्या असर पड़ता है, इसका आकलन जनता पर छोड़ना होगा।
मामला खारिज करते हुए जज गरॉफिस ने DOJ के वरिष्ठ अधिकारी ट्रेंट मैककॉट्टर की भूमिका पर कड़ा रुख अपनाया। उनके मुताबिक मैककॉट्टर ने अडानी के बचाव पक्ष के वकीलों के साथ मिलकर मामले को खत्म करने का फैसला किया और उन FBI तथा SEC अधिकारियों तथा अभियोजकों की राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिया, जिन्होंने मामले की जांच और अभियोजन में काम किया था।
अदालत ने इस प्रक्रिया को असामान्य बताया। जज का सवाल मूलतः यह था कि इतने गंभीर और बहु-एजेंसी मामले में अभियोजन वापस लेने का फैसला किस संस्थागत प्रक्रिया के तहत हुआ और क्या जांच से जुड़े अधिकारियों की पेशेवर राय को पर्याप्त रूप से शामिल किया गया।
DOJ की तरफ से कहा गया कि मैककॉट्टर ने बचाव पक्ष के वकीलों और विभाग के अन्य वकीलों से बातचीत की थी और अपनी स्वतंत्र रिसर्च तथा विश्लेषण के बाद फैसला लिया। यानी सरकार ने अदालत की आलोचना के बावजूद अपने अभियोजन विवेकाधिकार का बचाव किया।
यहां कानूनी स्थिति को सही तरीके से समझना जरूरी है। अमेरिकी जज ने अडानी के खिलाफ आपराधिक मामला खारिज किया है, लेकिन यह फैसला इस अर्थ में ट्रायल के बाद दिया गया बरी का फैसला नहीं है कि अदालत ने सभी आरोपों की सुनवाई कर अडानी को निर्दोष पाया हो।
खुद जज गरॉफिस ने स्पष्ट किया कि मामले को खारिज करने का उनका आदेश DOJ के निर्णय से उनकी सहमति या आरोपों की मेरिट पर कोई राय नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने अतिरिक्त आरोपियों के संबंध में भी DOJ से और जानकारी मांगी थी।
इसलिए संपादकीय तौर पर यह कहना अधिक सटीक है कि अडानी के खिलाफ अमेरिकी आपराधिक अभियोजन समाप्त हो गया है। यह कहना कि अदालत ने आरोपों को गलत साबित कर दिया, उपलब्ध रिकॉर्ड से समर्थित नहीं है।
अडानी से जुड़े अमेरिकी कानूनी मामलों का एक अलग हिस्सा SEC यानी अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन से संबंधित है। मई 2026 में SEC ने गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी के खिलाफ सिविल कार्रवाई में प्रस्तावित अंतिम फैसले पेश किए थे।
SEC के मुताबिक, मामला 2021 में अडानी ग्रीन एनर्जी के 75 करोड़ डॉलर के बॉन्ड ऑफर से जुड़े बयानों पर था। आयोग ने आरोप लगाया था कि कंपनी की एंटी-ब्राइबरी और एंटी-करप्शन नीतियों से संबंधित कुछ बयान उस समय भ्रामक थे, जबकि कथित रिश्वत योजना चल रही थी।
गौतम अडानी ने 60 लाख डॉलर और सागर अडानी ने 1.2 करोड़ डॉलर की सिविल पेनल्टी पर सहमति दी। SEC के रिकॉर्ड के अनुसार दोनों ने आरोपों को स्वीकार या खारिज किए बिना प्रस्तावित अंतिम फैसले पर सहमति दी थी।
इसके अलावा अडानी एंटरप्राइजेज ने ईरान प्रतिबंधों से जुड़े आरोपों के निपटारे के लिए अमेरिकी ट्रेजरी को 27.5 करोड़ डॉलर देने पर सहमति जताई। यह मामला अडानी के खिलाफ समाप्त हुए आपराधिक रिश्वत केस से अलग है।
अमेरिकी आपराधिक मामला लंबे समय से अडानी समूह की अंतरराष्ट्रीय कारोबारी साख और निवेशकों की धारणा के लिए एक बड़ा कानूनी जोखिम बना हुआ था। 2024 में आरोप लगने के बाद समूह की अंतरराष्ट्रीय विस्तार योजनाओं और कई प्रस्तावित कारोबारी समझौतों पर दबाव देखने को मिला था।
अब आपराधिक अभियोजन समाप्त होने से समूह पर तत्काल कानूनी दबाव कम हुआ है। इससे निवेशकों के बीच जोखिम की धारणा में सुधार की गुंजाइश है, हालांकि समूह की कॉरपोरेट गवर्नेंस, रेगुलेटरी निगरानी और दूसरे मामलों से जुड़े सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी आपराधिक केस का खत्म होना कंपनी के कारोबारी प्रदर्शन की गारंटी नहीं देता। शेयर बाजार का रुख आगे भी कमाई, कर्ज, कैश फ्लो, रेगुलेटरी घटनाक्रम और वैश्विक निवेश माहौल जैसे कई कारकों से प्रभावित होगा।
मामले का एक व्यापक जियोपॉलिटिकल पहलू भी है। अडानी समूह भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, पोर्ट्स और दूसरे रणनीतिक क्षेत्रों में बड़ा कारोबारी समूह है। इसलिए अमेरिकी कानूनी कार्रवाई का असर केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं था, बल्कि भारत-अमेरिका कारोबारी संबंधों और अमेरिकी पूंजी बाजार में भारतीय कंपनियों की छवि से भी जुड़ा था।
फिर भी उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इस फैसले को भारत-अमेरिका कूटनीतिक समझौते का परिणाम बताना उचित नहीं होगा। अदालत ने 10 अरब डॉलर के निवेश प्रस्ताव की जांच की, लेकिन जज ने निष्कर्ष निकाला कि यह DOJ के निर्णय का कारक नहीं था।
यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम में तथ्य और राजनीतिक अटकल के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। रिकॉर्ड एक तरफ आपराधिक अभियोजन की समाप्ति दिखाता है, दूसरी तरफ DOJ की आंतरिक प्रक्रिया पर अदालत की चिंता भी दर्ज करता है।
अडानी के खिलाफ अमेरिकी आपराधिक अभियोजन का समाप्त होना तत्काल राहत देता है, लेकिन अमेरिकी नियामकीय और सिविल रिकॉर्ड को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। SEC से जुड़े निपटारे और दूसरे नियामकीय मामलों की स्थिति आगे भी निवेशकों और कॉरपोरेट गवर्नेंस विशेषज्ञों के लिए अहम रहेगी।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल अब यह रहेगा कि इस फैसले का अडानी समूह की अंतरराष्ट्रीय फंडिंग, अमेरिकी निवेश और वैश्विक साझेदारियों पर कितना ठोस असर पड़ता है। दूसरा सवाल अमेरिकी अभियोजन प्रक्रिया को लेकर अदालत की टिप्पणियों का व्यापक संस्थागत असर है।
अमेरिकी अदालत ने इस मामले में एक स्पष्ट सीमा भी सामने रखी है। संघीय अभियोजकों के पास अभियोजन वापस लेने का अधिकार है, लेकिन ऐसे फैसलों की प्रक्रिया, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही पर न्यायपालिका सवाल उठा सकती है।
गौतम अडानी के लिए यह फैसला निश्चित रूप से एक बड़ी कानूनी राहत है। अमेरिकी आपराधिक रिश्वत और फ्रॉड मामला अब आगे ट्रायल की ओर नहीं बढ़ेगा। लेकिन इस फैसले को आरोपों की न्यायिक जांच के बाद मिली क्लीन चिट के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।
अमेरिकी जज ने एक तरफ DOJ की याचिका स्वीकार की, दूसरी तरफ उसी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल दर्ज किए। 10 अरब डॉलर के अमेरिकी निवेश प्रस्ताव को लेकर भी अदालत ने जांच की और अंततः कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड में वह अभियोजन निर्णय का कारक नहीं था।
इसलिए अडानी केस की सबसे अहम कहानी केवल मामला खत्म होने की नहीं है। असली महत्व इस बात में है कि एक हाई-प्रोफाइल अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट केस में अभियोजन विवेकाधिकार, न्यायिक निगरानी, बड़े निवेश प्रस्ताव और कानून के समान प्रशासन के बीच संतुलन कैसे कायम होता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।