₹23 करोड़ का ‘बिग ट्री’, मूर्ति देखकर भड़के लोग
करोड़ों खर्च कर बनाया ‘बिग ट्री’, डिजाइन पर उठे सवाल
‘बिग ट्री’ या अजीब मुजस्समा? 23 करोड़ पर बवाल
करोड़ों रुपये की लागत से तैयार किए गए ‘बिग ट्री’ नामक मुजस्समे को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। लोगों का कहना है कि जिस कलाकृति पर भारी रकम खर्च हुई, उसका अंतिम रूप उम्मीदों के मुताबिक नहीं दिखता।
‘बिग ट्री’ बनाने के नाम पर करीब 23 करोड़ रुपये खर्च किए जाने और तैयार मुजस्समे की शक्ल को लेकर सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। वायरल तस्वीरों और वीडियो में दिखाई दे रही कलाकृति को देखकर कई यूजर्स ने इसकी डिजाइन और उपयोगिता पर सवाल उठाए हैं।
लोगों की नाराज़गी का बड़ा हिस्सा इस बात से जुड़ा है कि इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बाद तैयार हुआ मुजस्समा उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इसे हटाने तक की मांग कर दी है। हालांकि यहां एक अहम संपादकीय सावधानी जरूरी है। उपलब्ध सामग्री में 23 करोड़ रुपये की लागत, परियोजना की आधिकारिक स्वीकृति, कलाकार, स्थान और निर्माण एजेंसी से जुड़ी पूरी जानकारी स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हो पाई है। इसलिए इन दावों को अंतिम सरकारी तथ्य के तौर पर पेश करना उचित नहीं होगा।
किसी शहर में विशाल पेड़ की कलाकृति तैयार करने का उद्देश्य सामान्य तौर पर सार्वजनिक कला, शहरी सौंदर्यीकरण और किसी खास जगह की पहचान मजबूत करना होता है। ऐसे प्रोजेक्ट्स में डिजाइन के साथ इंजीनियरिंग, स्ट्रक्चरल सेफ्टी, रोशनी और आसपास के सार्वजनिक स्थान की योजना भी शामिल रहती है। लेकिन इस मामले में विवाद कलाकृति की मूल अवधारणा से ज्यादा उसके अंतिम रूप को लेकर दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल उठाया कि क्या इतनी बड़ी सार्वजनिक राशि के बदले तैयार किया गया मुजस्समा अपेक्षित स्तर का है। यही सवाल इस मामले को केवल एक वायरल तस्वीर से आगे ले जाता है।
किसी सार्वजनिक कला परियोजना की लागत केवल मूर्ति बनाने की कीमत नहीं होती। इसमें डिजाइन, कच्चा माल, स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग, साइट डेवलपमेंट, ट्रांसपोर्टेशन, इंस्टॉलेशन, इलेक्ट्रिकल सिस्टम और रखरखाव जैसे खर्च शामिल हो सकते हैं। इसलिए 23 करोड़ रुपये की पूरी रकम किस मद में खर्च हुई, इसका जवाब आधिकारिक टेंडर, वर्क ऑर्डर और बजट दस्तावेजों से ही स्पष्ट होगा। अगर परियोजना सरकारी फंड से बनी है, तो लागत का विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध होना चाहिए। इसी रिकॉर्ड से पता चलेगा कि 23 करोड़ रुपये पूरी परियोजना की लागत है या केवल निर्माण से जुड़ी रकम।
वायरल तस्वीरों में दिखाई देने वाला मुजस्समा सोशल मीडिया यूजर्स के बीच व्यंग्य और आलोचना का विषय बन गया। कुछ प्रतिक्रियाओं में इसकी तुलना पेड़ की सामान्य आकृति से की गई, जबकि कुछ लोगों ने सवाल किया कि इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बाद डिजाइन इतना विवादित क्यों दिखाई दे रहा है। यह प्रतिक्रिया सार्वजनिक कला की एक पुरानी बहस को भी सामने लाती है। किसी कलाकृति का मूल्य केवल इस आधार पर तय नहीं होता कि वह देखने में पारंपरिक या सुंदर लगती है। समकालीन कला में कई बार असामान्य डिजाइन और अमूर्त रूप जानबूझकर इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन सार्वजनिक धन से तैयार परियोजनाओं में एक अतिरिक्त सवाल जुड़ जाता है, जनता के पैसे का इस्तेमाल किस स्तर की पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ हुआ।
जरूरी नहीं। किसी मूर्ति की कलात्मक गुणवत्ता का फैसला केवल सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया से नहीं किया जा सकता।
समकालीन सार्वजनिक कला में कलाकार पारंपरिक आकृतियों से अलग डिजाइन अपना सकते हैं। किसी कलाकृति का उद्देश्य यथार्थवादी पेड़ बनाना भी जरूरी नहीं होता। फिर भी अगर परियोजना का आधिकारिक उद्देश्य एक विशाल और आकर्षक ‘बिग ट्री’ बनाना था, तो उसके डिजाइन की गुणवत्ता पर सार्वजनिक बहस होना स्वाभाविक है। खासकर तब, जब लागत बहुत अधिक बताई जा रही हो।
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि लोगों को मुजस्समा सुंदर लगा या नहीं। ज्यादा अहम सवाल यह है कि परियोजना किसने मंजूर की, इसका अनुमानित बजट कितना था, टेंडर किसे मिला और अंतिम भुगतान कितना हुआ। इसके अलावा यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि परियोजना की तकनीकी और डिजाइन समीक्षा किस स्तर पर हुई। अगर 23 करोड़ रुपये का आंकड़ा सही है, तो इतनी बड़ी लागत के पीछे विस्तृत दस्तावेज और औचित्य होना चाहिए। यही जानकारी सोशल मीडिया की बहस को राय से निकालकर तथ्य आधारित समीक्षा में बदल सकती है।
पब्लिक आर्ट का सीधा संबंध आम लोगों से होता है। इसे निजी गैलरी के भीतर नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थान पर स्थापित किया जाता है और कई मामलों में इसके लिए सरकारी या सार्वजनिक धन का इस्तेमाल होता है। इसलिए नागरिकों की प्रतिक्रिया को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन सोशल मीडिया की नाराज़गी को अंतिम फैसला मानना भी सही नहीं होगा। सही तरीका यह है कि परियोजना के डिजाइन, लागत, प्रक्रिया और उपयोगिता को आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर परखा जाए।
अगर आधिकारिक दस्तावेज 23 करोड़ रुपये की लागत की पुष्टि करते हैं, तो परियोजना की लागत-प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं। खासकर अगर इतनी बड़ी राशि केवल एक सीमित आकार के मुजस्समे या उसके इंस्टॉलेशन पर खर्च हुई हो। इसके विपरीत, अगर 23 करोड़ रुपये में पूरा सार्वजनिक स्थल, स्ट्रक्चरल काम, लैंडस्केपिंग, लाइटिंग और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं, तो तस्वीर अलग हो सकती है। इसलिए केवल वायरल पोस्ट देखकर “23 करोड़ मूर्ति पर खर्च” कहना भ्रामक हो सकता है। खर्च का पूरा ब्रेकअप देखना जरूरी है।
फिलहाल उपलब्ध सामग्री में इसे हटाने के किसी आधिकारिक फैसले की पुष्टि नहीं है। सोशल मीडिया पर लोग इसे गिराने या हटाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन सार्वजनिक परियोजना को हटाने का फैसला प्रशासनिक और तकनीकी प्रक्रिया के बाद ही हो सकता है।
अगर संरचनात्मक सुरक्षा से जुड़ी कोई समस्या सामने आती है, तो मामला अलग होगा। लेकिन केवल सौंदर्य संबंधी आलोचना अपने आप में किसी सार्वजनिक कलाकृति को हटाने का आधार नहीं बनती।
सोशल मीडिया पर किसी कलाकृति की एक तस्वीर उसके पूरे संदर्भ को नहीं दिखाती। कैमरा एंगल, रोशनी, आसपास का निर्माण और तस्वीर की गुणवत्ता किसी संरचना की धारणा बदल सकते हैं। इसी वजह से इस मामले में परियोजना की वास्तविक साइट, आधिकारिक डिजाइन और पूरा बजट देखना जरूरी होगा। उपलब्ध स्रोतों में इन सभी पहलुओं की पर्याप्त स्वतंत्र पुष्टि नहीं है।
इस मामले में सबसे उपयोगी अगला कदम आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच होगी। परियोजना का टेंडर, स्वीकृत बजट, ठेकेदार, डिजाइन प्रस्ताव और अंतिम भुगतान का विवरण सामने आने पर ही 23 करोड़ रुपये के दावे का पूरा संदर्भ समझा जा सकेगा।
अगर लागत आधिकारिक रूप से इतनी ही है, तो प्रशासन को जनता के सामने यह बताना चाहिए कि रकम किन मदों में खर्च हुई। इससे डिजाइन को लेकर चल रही बहस भी अधिक तथ्य आधारित हो सकेगी।
‘बिग ट्री’ के नाम पर बनाए गए मुजस्समे को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया जरूर सामने आई है, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ा सवाल इसकी शक्ल नहीं, बल्कि लागत और परियोजना की पूरी पृष्ठभूमि है। 23 करोड़ रुपये के आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि के बिना इसे अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं होगा। अगर आधिकारिक दस्तावेज इस रकम की पुष्टि करते हैं, तो सार्वजनिक धन के इस्तेमाल, टेंडर प्रक्रिया और डिजाइन चयन पर जवाबदेही की मांग पूरी तरह जायज़ होगी। फिलहाल इस कहानी का वायरल पहलू साफ है, लोगों को मुजस्समे का डिजाइन पसंद नहीं आया। लेकिन इसकी वास्तविक लागत और परियोजना की पूरी तस्वीर जानने के लिए आधिकारिक दस्तावेज जरूरी हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।