2026 में बॉलीवुड बॉक्स ऑफिस पर बड़ी फिल्मों का दबदबा है। ‘धुरंधर २’, ‘बॉर्डर २’ और दूसरी फिल्मों की कमाई ने 1975 के मजबूत सिनेमाई दौर की याद दिलाई है।
मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
07 September 2026
Wasi Siddiqui
हिंदी सिनेमा के इतिहास में १९७५ को एक असाधारण साल के तौर पर याद किया जाता है। इसी साल ‘शोले’, ‘जय संतोषी मां’, ‘दीवार’, ‘चुपके चुपके’, ‘प्रतिज्ञा’ और ‘संन्यासी’ जैसी अलग-अलग मिज़ाज की फिल्मों ने दर्शकों के बीच मजबूत पकड़ बनाई थी। बॉक्स ऑफिस पर कुछ फिल्मों की कामयाबी ने पूरे साल के सिनेमाई माहौल को बदल दिया था।
२०२६ में तस्वीर अलग दौर की है, लेकिन एक समानता साफ नज़र आती है। बड़ी फिल्मों की मजबूत कमाई, सीक्वल और फ्रेंचाइज़ फिल्मों का दबदबा और दर्शकों का कुछ चुनिंदा फिल्मों के लिए सिनेमाघरों की तरफ लौटना बॉलीवुड के लिए अहम संकेत दे रहा है।
२०२६ में हिंदी फिल्मों की कमाई में कुछ बड़े शीर्षकों ने पूरे बाजार का संतुलन बदल दिया है। बॉक्स ऑफिस ट्रैकिंग वेबसाइटों के मुताबिक ‘धुरंधर २’ साल की सबसे बड़ी हिंदी फिल्मों में सबसे ऊपर है। इसके बाद ‘बॉर्डर २’, ‘भूत बंगला’, ‘धमाल ४’ और ‘अवारापन २’ जैसी फिल्मों ने मजबूत कारोबारी प्रदर्शन दर्ज किया है।
कोई एक फिल्म कितना कमा रही है, इससे ज्यादा अहम सवाल यह है कि क्या वह दर्शकों को बड़े पैमाने पर सिनेमाघरों तक ला रही है। टिकट की कीमतें, मल्टीप्लेक्स का विस्तार और आज की टिकट बिक्री व्यवस्था १९७५ से पूरी तरह अलग है। इसलिए दोनों दौर की कमाई को सीधे रुपये में तुलना करना उचित नहीं होगा।
मुद्दा बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों की हूबहू तुलना का नहीं, बल्कि सिनेमाई असर का है।
१९७५ हिंदी सिनेमा के लिए कई मायनों में निर्णायक साल रहा। ‘शोले’ ने एक्शन, दोस्ती और बदले की कहानी को लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बना दिया। ‘जय संतोषी मां’ ने धार्मिक भावनाओं से जुड़े दर्शकों के बीच असाधारण लोकप्रियता हासिल की।
इसी साल ‘दीवार’ और ‘चुपके चुपके’ जैसी फिल्मों ने यह दिखाया कि दर्शक एक ही तरह के सिनेमा तक सीमित नहीं हैं। एक तरफ सामाजिक और अपराध आधारित ड्रामा था, तो दूसरी तरफ कॉमेडी और पारिवारिक मनोरंजन।
बॉक्स ऑफिस के उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड में ‘शोले’ और ‘जय संतोषी मां’ को १९७५ की बड़ी कामयाब फिल्मों में दर्ज किया गया है। ‘दीवार’, ‘प्रतिज्ञा’, ‘चुपके चुपके’ और दूसरी फिल्मों ने भी उस साल के कारोबारी माहौल को मजबूत किया था।
२०२६ की सबसे बड़ी खासियत बड़े स्थापित नामों पर दर्शकों का भरोसा दिखाई देना है।
‘धुरंधर २’ ने बॉक्स ऑफिस पर असाधारण प्रदर्शन किया है। बॉलीवुड हंगामा के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक ३१ अगस्त २०२६ तक फिल्म का भारत नेट कलेक्शन १,१०८ करोड़ रुपये से अधिक और वैश्विक कलेक्शन १,८५२ करोड़ रुपये से अधिक दर्ज किया गया था।
कोई भी बॉक्स ऑफिस आंकड़ा स्रोत और अपडेट की तारीख के साथ पढ़ना जरूरी है। अलग-अलग ट्रैकिंग संस्थानों के आंकड़ों में अंतर दिखाई देता है। इसलिए किसी एक वेबसाइट के आंकड़े को अंतिम और आधिकारिक मानने के बजाय उसे उपलब्ध ट्रेड अनुमान के रूप में देखना ज्यादा उचित है।
१९९७ की चर्चित फिल्म ‘बॉर्डर’ की विरासत से जुड़ी ‘बॉर्डर २’ ने भी २०२६ में मजबूत कारोबार किया। कोइमोई के ६ सितंबर के अपडेट के मुताबिक फिल्म का भारत कलेक्शन ३६२ करोड़ रुपये से अधिक था।
यह प्रदर्शन इस बात का संकेत देता है कि पुरानी फिल्मों से जुड़ी भावनात्मक पहचान और नई कहानी को मिलाकर बनाई गई फिल्मों के लिए बाजार में जगह बनी हुई है।
यहां भी तुलना १९७५ से सीधे करना सही नहीं होगा। आज दर्शकों के पास ओटीटी, सोशल मीडिया, क्षेत्रीय सिनेमा और अंतरराष्ट्रीय कंटेंट के कई विकल्प मौजूद हैं। ऐसे माहौल में किसी फिल्म का लंबे समय तक सिनेमाघरों में टिकना अपने आप में महत्वपूर्ण है।
२०२६ के आंकड़ों में एक पैटर्न दिखाई देता है। बड़े बजट और बड़े ब्रांड वाली फिल्मों को दर्शकों से शुरुआती स्तर पर मजबूत प्रतिक्रिया मिल रही है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल बड़े सितारों वाली फिल्में ही सफल हो रही हैं। ‘अवारापन २’ जैसी फिल्म का प्रदर्शन बताता है कि पुराने लोकप्रिय कंटेंट की नई प्रस्तुति भी दर्शकों के बीच जगह बना सकती है। कोइमोई के ६ सितंबर के आंकड़ों में फिल्म का भारत कलेक्शन १५५ करोड़ रुपये से अधिक दर्ज किया गया है।
इससे एक दूसरा पहलू भी सामने आता है। दर्शक परिचित नाम और कहानी के साथ-साथ भावनात्मक जुड़ाव को भी महत्व दे रहे हैं।
इसे शाब्दिक अर्थ में नहीं देखना चाहिए।
१९७५ और २०२६ के बीच भारतीय फिल्म उद्योग की संरचना में बड़ा बदलाव आया है। १९७५ में सिंगल स्क्रीन थिएटर बाजार का अहम हिस्सा थे। आज मल्टीप्लेक्स, प्रीमियम स्क्रीन, ऑनलाइन टिकट बुकिंग और डिजिटल प्रचार फिल्म कारोबार को प्रभावित करते हैं।
टिकट की कीमतों में भी भारी अंतर है। इसलिए केवल कुल कलेक्शन के आधार पर यह कहना कि २०२६ ने १९७५ को पीछे छोड़ दिया या उसकी हूबहू वापसी कर दी, सांख्यिकीय तौर पर मजबूत निष्कर्ष नहीं होगा।
फुटफॉल एक ज्यादा उपयोगी पैमाना है। मिंट की एक रिपोर्ट ने भी बॉक्स ऑफिस तुलना में टिकट कीमतों के प्रभाव को देखते हुए फुटफॉल को अधिक अर्थपूर्ण पैमाना बताया है।
१९७५ की सबसे बड़ी विशेषता केवल ‘शोले’ की सफलता नहीं थी। उस साल कई अलग-अलग फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी जगह बनाई थी।
२०२६ में भी कुछ ऐसा ही वातावरण दिखाई दे रहा है। एक तरफ बड़े एक्शन और फ्रेंचाइज़ प्रोजेक्ट हैं। दूसरी तरफ कॉमेडी, थ्रिलर, हॉरर और पुराने लोकप्रिय किरदारों से जुड़ी फिल्में मौजूद हैं।
इस विविधता का फायदा सिनेमाघरों को मिलता है। अगर अलग-अलग वर्गों के दर्शकों के लिए अलग तरह का कंटेंट उपलब्ध रहता है, तो थिएटर बाजार को लगातार नई ऑडियंस मिलती रहती है।
२०२६ के आंकड़े फिल्म उद्योग को एक स्पष्ट संदेश दे रहे हैं। दर्शक बड़े पर्दे पर पैसा खर्च करने से पीछे नहीं हट रहे, लेकिन वे चुनाव सोच-समझकर कर रहे हैं।
कंटेंट में पहचान, बड़े पैमाने का मनोरंजन और मजबूत फ्रेंचाइज़ वैल्यू फिल्म की शुरुआती अपील बढ़ा रही है। इसके साथ कहानी और प्रस्तुति कमजोर होने पर केवल स्टार पावर पर्याप्त नहीं होगी।
यह बदलाव निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण है। पहले की तरह बड़ी फिल्म बनाना ही पर्याप्त नहीं है। फिल्म को दर्शक के लिए थिएटर जाने की वजह भी तैयार करनी होगी।
ओटीटी प्लेटफॉर्म के विस्तार के बाद यह सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या दर्शक बड़े पर्दे के लिए पहले जैसा उत्साह दिखाएंगे।
२०२६ का बॉक्स ऑफिस कम से कम यह बताता है कि थिएटर की मांग खत्म नहीं हुई है। बड़ी फिल्मों के लिए दर्शक अब भी टिकट खरीद रहे हैं।
लेकिन बाजार का स्वरूप बदल चुका है। छोटी फिल्मों को थिएटर में लंबी अवधि तक जगह मिलना मुश्किल हो सकता है। वहीं बड़े ब्रांड और स्थापित फ्रेंचाइज़ फिल्मों को स्क्रीन और प्रचार में बढ़त मिलती है।
इसलिए २०२६ का बॉक्स ऑफिस एक साथ अवसर और चुनौती दोनों पेश कर रहा है।
१९७५ ने दिखाया था कि एक ही साल में अलग-अलग तरह की फिल्मों के लिए दर्शक मौजूद रहते हैं। २०२६ भी इसी दिशा में संकेत दे रहा है, हालांकि आज की इंडस्ट्री की आर्थिक और तकनीकी परिस्थितियां पूरी तरह अलग हैं।
बॉक्स ऑफिस की मौजूदा तस्वीर में बड़े शीर्षकों का दबदबा साफ है। लेकिन साल अभी खत्म नहीं हुआ है और आगे कई बड़ी रिलीज़ कतार में हैं। इसलिए पूरे २०२६ का अंतिम मूल्यांकन साल के अंत के आंकड़ों के बाद ही ज्यादा विश्वसनीय होगा।
आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि क्या नए रिलीज़ बड़े बजट वाली फिल्मों के बीच अपनी जगह बना पाती हैं। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि दर्शकों की पसंद केवल स्थापित फ्रेंचाइज़ तक सीमित रहती है या नए किरदार और नई कहानियां भी बड़े स्तर पर काम करती हैं।
अगर साल के बाकी हिस्से में कई और फिल्में मजबूत फुटफॉल और टिकाऊ बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन दर्ज करती हैं, तब २०२६ को हिंदी सिनेमा के मजबूत वर्षों की सूची में रखने का तर्क और मजबूत होगा।
फिलहाल १९७५ से तुलना एक दिलचस्प संपादकीय दृष्टिकोण है, लेकिन इसे ऐतिहासिक समानता के बजाय बॉक्स ऑफिस के माहौल की तुलना के तौर पर देखना ज्यादा सही है। २०२६ ने यह जरूर साबित किया है कि सही फिल्म, सही समय और मजबूत दर्शक जुड़ाव के साथ सिनेमाघरों में अब भी बड़ा कारोबार संभव है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।