अमेरिका-कनाडा ट्रेड वॉर में नया टकराव शुरू हो गया है। कनाडा 8 सितंबर से अमेरिकी सामान पर 15% से 50% तक जवाबी शुल्क लगाएगा, जिससे पेपर और टॉयलेट उत्पाद प्रभावित होंगे।
अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक तनातनी अब आम अमेरिकी उपभोक्ता की रोजमर्रा की जरूरतों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। दोनों देशों के बीच बातचीत टूटने के बाद टैरिफ का नया दौर शुरू हुआ है। कनाडा ने अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाने का फैसला किया है, जिसमें पेपर प्रोडक्ट्स और टॉयलेट पेपर भी शामिल हैं। इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि अमेरिका में हर जगह टॉयलेट पेपर की कीमत तुरंत बढ़ जाएगी। लेकिन कनाडाई कच्चे माल और अमेरिकी बाजार के बीच गहरे कारोबारी रिश्तों के कारण लागत बढ़ने का दबाव पैदा हो सकता है। विशेषज्ञों और कारोबारी रिपोर्टों में इसी जोखिम को लेकर चिंता जताई गई है।
अमेरिका ने 22 अगस्त से कनाडा से आने वाले लगभग 27.6 अरब डॉलर के सामान पर 50% तक अतिरिक्त शुल्क लागू किया। अमेरिकी प्रशासन ने इन कदमों को कनाडा की व्यापार नीतियों और अमेरिकी उत्पादों के साथ कथित भेदभाव का जवाब बताया है।
इसके बाद कनाडा ने भी जवाबी कार्रवाई का ऐलान किया। कनाडाई वित्त मंत्रालय के मुताबिक 8 सितंबर 2026 से अमेरिका से आने वाले 27.6 अरब कनाडाई डॉलर के सामान पर 15%, 25% और 50% तक शुल्क लगाया जाएगा। कनाडा का कहना है कि वह अमेरिकी शुल्क के जवाब में समान दर से जवाब देगा। नई सूची में स्टील, डेयरी, घरेलू उपकरण, कृषि मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और कागज से जुड़े उत्पाद शामिल हैं।
टॉयलेट पेपर का मामला इसलिए अहम है क्योंकि यह ऐसा उत्पाद है जिसकी मांग रोजमर्रा की जरूरत से जुड़ी है। कनाडा की आधिकारिक टैरिफ सूची में टॉयलेट पेपर पर 25% जवाबी शुल्क का प्रावधान है। चेहरे और सफाई के लिए इस्तेमाल होने वाले कुछ पेपर उत्पादों पर भी 25% शुल्क रखा गया है। दूसरी ओर कुछ कागज और सैनिटरी पेपर श्रेणियों पर शुल्क 50% तक है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। शुल्क कनाडा द्वारा अमेरिकी मूल के सामान पर लगाया जा रहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका में मौजूद हर टॉयलेट पेपर उत्पाद पर सीधे 25% कीमत बढ़ जाएगी। लेकिन अमेरिकी कंपनियां जिन कच्चे माल या पेपर उत्पादों का आयात करती हैं, उनकी लागत बढ़ने पर कंपनियां इसका कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं तक पहुंचा सकती हैं। यही वजह है कि अमेरिकी बाजार में टॉयलेट पेपर और दूसरे सैनिटरी पेपर उत्पादों की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ी है।
अमेरिकी पेपर उद्योग का कनाडा के साथ मजबूत सप्लाई चेन रिश्ता है। रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका ने 2024 में कनाडा से लगभग 328 मिलियन डॉलर का टॉयलेट पेपर आयात किया था। अमेरिकी कंपनियां कई पेपर उत्पाद घरेलू स्तर पर बनाती हैं, लेकिन उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कुछ कच्चे माल के लिए कनाडा पर निर्भरता बनी हुई है। इस वजह से व्यापारिक टकराव केवल आयातित तैयार उत्पादों तक सीमित नहीं रहता। कच्चे माल, परिवहन, उत्पादन और वितरण की लागत में बदलाव भी बाजार पर असर डाल सकता है।
सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में इस व्यापारिक विवाद को लेकर यह बात मजाकिया अंदाज में कही जा रही है कि अमेरिका में रोना, हंसना और टॉयलेट जाना भी महंगा हो सकता है। इसके पीछे अलग-अलग उत्पादों पर लगने वाले शुल्क और पेपर से जुड़े उत्पादों की लागत का संदर्भ है।
लेकिन इसे शाब्दिक अर्थ में लेना सही नहीं होगा। रोने या हंसने पर कोई सरकारी टैक्स नहीं लगाया गया है। असर उन वस्तुओं की कीमत पर पड़ने की बात है जिनमें पेपर, टिश्यू या दूसरे आयातित उत्पाद शामिल हैं। इसलिए खबर का वास्तविक मुद्दा उपभोक्ता वस्तुओं की संभावित महंगाई और सप्लाई चेन पर पड़ने वाला दबाव है।
अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि कनाडा की कुछ व्यापार नीतियां अमेरिकी कारोबार के लिए असमान परिस्थितियां पैदा करती हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने डेयरी, शराब और ऑटोमोबाइल समेत कई क्षेत्रों में कनाडा की नीतियों को लेकर आपत्ति जताई है। अमेरिका ने कुछ कनाडाई उत्पादों पर 50% तक अतिरिक्त शुल्क लगाया है। इस सूची में शराब, हॉकी उपकरण, शहद, कुछ पेपर उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य सामान शामिल हैं। अमेरिकी सरकार ने इन कदमों को घरेलू कारोबार की सुरक्षा और व्यापारिक असंतुलन से जुड़े अपने तर्कों के आधार पर उचित ठहराया है।
कनाडा ने अमेरिकी शुल्क का जवाब देने के लिए करीब 700 अमेरिकी उत्पादों को अपनी जवाबी सूची में शामिल किया है। इन पर शुल्क की दर उत्पाद के हिसाब से 15%, 25% या 50% होगी। नई व्यवस्था 8 सितंबर से लागू होगी। कनाडा ने प्रभावित कारोबार और कर्मचारियों के लिए लगभग 7.5 अरब कनाडाई डॉलर का सहायता पैकेज भी घोषित किया है। इसमें कंपनियों और कामगारों को वित्तीय राहत देने की व्यवस्था शामिल है।
कनाडाई सरकार का कहना है कि उसका मकसद घरेलू उद्योगों की हिफाजत करना और अमेरिका पर बातचीत की मेज पर लौटने के लिए दबाव बनाना है।
नए टैरिफ का दायरा काफी व्यापक है। कनाडा की आधिकारिक सूची में स्टील, डेयरी, कृषि उपकरण, घरेलू सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स, कागज, प्लाईवुड और सैनिटरी पेपर जैसे उत्पाद शामिल हैं। इसका असर दोनों देशों की कंपनियों पर पड़ सकता है। अमेरिका और कनाडा की अर्थव्यवस्थाएं लंबे समय से एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, ऑटोमोबाइल, कृषि, औद्योगिक सामान और कच्चे माल का बड़ा कारोबार होता है।
टैरिफ बढ़ने पर आयातकों की लागत बढ़ती है। कंपनियां इसका बोझ अपने मुनाफे में समायोजित कर सकती हैं, सप्लायर से कीमत कम कराने की कोशिश कर सकती हैं या उसका एक हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं।
ट्रेड वॉर का सबसे अहम आर्थिक असर महंगाई के मोर्चे पर हो सकता है। रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमत में मामूली वृद्धि भी बड़ी आबादी पर असर डालती है, खासकर तब जब कई दूसरी वस्तुओं की कीमतें पहले से दबाव में हों। अमेरिकी बाजार में टॉयलेट पेपर और अन्य पेपर उत्पादों को लेकर चिंता इसी वजह से बढ़ी है। हालांकि वास्तविक खुदरा कीमत कितनी बढ़ेगी, यह कंपनियों की खरीद लागत, स्टॉक, घरेलू उत्पादन, कनाडाई आयात पर निर्भरता और शुल्क के वास्तविक पास-थ्रू पर निर्भर करेगा।
अमेरिका और कनाडा के बीच मौजूदा विवाद केवल टैरिफ का मामला नहीं है। दोनों देशों के बीच दशकों से बने आर्थिक रिश्तों पर भी इसका असर पड़ रहा है। व्यापार वार्ता टूटने के बाद दोनों पक्षों ने अपने-अपने कदमों को जायज ठहराया है। कनाडा ने अमेरिकी शर्तों को अपने राष्ट्रीय हितों के लिए नुकसानदेह बताते हुए बातचीत रोक दी, जबकि अमेरिकी प्रशासन कनाडा की व्यापार नीतियों पर दबाव बनाए हुए है। अगर टैरिफ लंबे समय तक जारी रहते हैं तो कंपनियों को वैकल्पिक सप्लायर खोजने पड़ सकते हैं। इससे सप्लाई चेन में बदलाव आएगा और कुछ क्षेत्रों में उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
फिलहाल सबसे अहम तारीख 8 सितंबर है। इसी दिन कनाडा के नए जवाबी शुल्क लागू होने हैं। इसके बाद दोनों देशों के कारोबारियों और उपभोक्ताओं पर वास्तविक असर ज्यादा स्पष्ट होगा। ऑटो सेक्टर भी आगे बड़ा मुद्दा बन सकता है। अमेरिकी प्रशासन ने कनाडाई ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट्स पर अतिरिक्त शुल्क की संभावना को लेकर दबाव बनाए रखा है। इससे उत्तर अमेरिकी ऑटो सप्लाई चेन पर असर पड़ने की आशंका है।
आखिरी तस्वीर इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों देश फिर से बातचीत शुरू करते हैं या टैरिफ की जंग आगे बढ़ती है।
इस विवाद का सबसे व्यावहारिक पहलू यही है कि व्यापार नीति का असर अब रोजमर्रा की खरीदारी से जुड़ रहा है। टॉयलेट पेपर पर 25% कनाडाई जवाबी शुल्क तय है, जबकि कई दूसरे पेपर और घरेलू उत्पादों पर शुल्क 50% तक पहुंच रहा है।
फिर भी यह कहना जल्दबाजी होगी कि हर अमेरिकी परिवार का टॉयलेट पेपर बिल सीधे 25% बढ़ जाएगा। टैरिफ और खुदरा कीमत के बीच कई कारोबारी चरण होते हैं। लेकिन अगर विवाद लंबा खिंचता है, सप्लाई चेन महंगी होती है और कंपनियां बढ़ी हुई लागत ग्राहकों तक पहुंचाती हैं, तो उपभोक्ताओं पर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। अमेरिका-कनाडा ट्रेड वॉर की असली परीक्षा अब यही है कि दोनों सरकारें कितनी जल्दी आर्थिक नुकसान को सीमित करती हैं। टैरिफ की लड़ाई में राजनीतिक बयानबाजी सुर्खियां बना सकती है, लेकिन अंतिम असर कारोबार, उद्योग और उपभोक्ताओं की जेब पर दिखाई देगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।