अमेरिका और कनाडा के बीच ट्रेड टॉक टूट गई है। पीएम मार्क कार्नी ने बातचीत निलंबित कर अमेरिकी 50% टैरिफ का डॉलर-फॉर-डॉलर जवाब देने की बात कही। यह विवाद दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों और आगामी सीयूएसएमए समीक्षा पर असर डाल सकता है।
ओटावा, कनाडा | 22 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
अमेरिका और कनाडा के बीच महीनों से चल रहा ट्रेड विवाद अब नए और ज्यादा सख्त दौर में पहुंच गया है। कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिका के साथ चल रही ट्रेड बातचीत को निलंबित कर दिया है। इसके साथ ही उन्होंने वॉशिंगटन की ओर से लगाए गए नए टैरिफ का डॉलर-फॉर-डॉलर जवाब देने का ऐलान किया है। यह घटनाक्रम ऐसे वक्त हुआ जब दोनों देशों के वार्ताकार अंतिम चरण में समझौते की कोशिश कर रहे थे। कुछ दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 50% टैरिफ को तीन दिनों के लिए टाल दिया था और बातचीत में प्रगति की बात कही थी। लेकिन अंतिम दौर में दोनों पक्ष समझौते तक नहीं पहुंच सके।
अमेरिका ने कनाडा के कुछ उत्पादों पर 50% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की व्यवस्था की है। व्हाइट हाउस के मुताबिक ये शुल्क अमेरिकी व्यापार के साथ कनाडा के कथित भेदभाव को दूर करने के लिए लगाए गए हैं। इन उपायों में अल्कोहल, डेयरी और कुछ अन्य कनाडाई उत्पाद शामिल हैं।
व्हाइट हाउस ने इन टैरिफ को अमेरिकी उत्पादकों के हितों की रक्षा से जोड़ा है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि कनाडा अमेरिकी वस्तुओं, खासकर कुछ कृषि, ऑटो और अल्कोहल उत्पादों के साथ असमान व्यापारिक व्यवहार करता है। यह अमेरिकी पक्ष का आधिकारिक तर्क है, जबकि कनाडा इन शर्तों को स्वीकार नहीं करता।
कार्नी के मुताबिक बातचीत में कुछ प्रगति हुई थी, लेकिन अंतिम समय में अमेरिकी प्रस्ताव में किए गए बदलाव कनाडा के लिए स्वीकार्य नहीं थे। उन्होंने इन्हें अनुचित और आर्थिक रूप से नुकसानदेह बताया तथा कहा कि इन बदलावों ने संभावित समझौते की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए।
कनाडाई प्रधानमंत्री कार्यालय ने पहले 18 अगस्त को कहा था कि बातचीत में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। उसी दौरान अमेरिका ने 50% टैरिफ को 21 अगस्त के अंत तक टालने पर सहमति दी थी, ताकि दोनों पक्ष समझौते को अंतिम रूप दे सकें। लेकिन 21 अगस्त तक अंतिम सहमति नहीं बनी। इसके बाद कनाडा ने अपने वार्ताकारों को वापस बुलाने और बातचीत रोकने का फैसला किया।
कार्नी ने साफ किया है कि अगर अमेरिका कनाडाई सामान पर अतिरिक्त शुल्क लगाता है तो कनाडा भी अमेरिकी उत्पादों पर समान आर्थिक जवाब देगा। इसे डॉलर-फॉर-डॉलर रिटैलिएशन की नीति के रूप में पेश किया गया है। समाचार के मुताबिक अमेरिकी 50% टैरिफ करीब 20 अरब डॉलर के कनाडाई सामान को प्रभावित करते हैं और यह कनाडा के अमेरिका को कुल निर्यात का लगभग 5% हिस्सा है। इसलिए शुरुआती असर पूरे कनाडाई निर्यात क्षेत्र पर समान नहीं होगा, लेकिन संबंधित उद्योगों पर दबाव गंभीर हो सकता है। यहां एक अहम फर्क समझना जरूरी है। 50% टैरिफ का मतलब हर कनाडाई उत्पाद पर 50% शुल्क नहीं है। यह खास श्रेणियों में आने वाले उत्पादों पर लागू अतिरिक्त शुल्क है।
वॉशिंगटन का कहना है कि कनाडा की कुछ नीतियां अमेरिकी कारोबार को दूसरे देशों की तुलना में नुकसान पहुंचाती हैं। व्हाइट हाउस ने अल्कोहल और डेयरी के अलावा ऑटो सेक्टर से जुड़े व्यापारिक नियमों को भी अमेरिकी हितों के खिलाफ बताया है। अमेरिकी प्रशासन ने 1930 के टैरिफ एक्ट की सेक्शन 338 के तहत अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार इस्तेमाल किया है। व्हाइट हाउस के दस्तावेजों के अनुसार इस प्रावधान के तहत किसी दूसरे देश की कथित भेदभावपूर्ण व्यापार नीति के जवाब में अतिरिक्त शुल्क लगाए जा सकते हैं। इसलिए मौजूदा विवाद केवल सामान्य टैरिफ विवाद नहीं है। इसमें कानूनी अधिकार, बाजार पहुंच, कृषि नीति, ऑटो सेक्टर और दोनों देशों के व्यापक व्यापार समझौते का भविष्य भी जुड़ा हुआ है।
ओटावा का कहना है कि अमेरिका पिछले डेढ़ साल से अपने व्यापारिक रिश्तों में एकतरफा बदलाव कर रहा है। कार्नी सरकार ने पहले भी कहा है कि कनाडा अपने घरेलू उद्योग और कामगारों की सुरक्षा के लिए जवाबी कदम उठाएगा। कनाडा साथ ही अमेरिका पर निर्भरता कम करने की स्ट्रैटेजी पर भी जोर दे रहा है। कार्नी ने प्रांतों के साथ बैठकों में घरेलू आर्थिक क्षमता बढ़ाने और दूसरे अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ व्यापारिक रिश्ते मजबूत करने की जरूरत बताई है। इसका मतलब यह है कि मौजूदा टैरिफ विवाद कनाडा की व्यापक आर्थिक नीति को भी प्रभावित कर रहा है। ओटावा अब केवल वॉशिंगटन के साथ समझौते पर निर्भर रहने के बजाय व्यापारिक विविधीकरण पर भी जोर दे रहा है।
अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको के बीच सीयूएसएमए उत्तर अमेरिकी व्यापार व्यवस्था की बुनियाद है। मौजूदा विवाद ने इस समझौते के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है। रॉयटर्स के अनुसार अमेरिका और कनाडा के बीच मौजूदा टकराव व्यापक सीयूएसएमए समीक्षा को भी जटिल बना रहा है। कनाडा और मेक्सिको दोनों के लिए अमेरिका सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। ऐसे में अगर टैरिफ विवाद लंबे समय तक चलता है तो कंपनियों के लिए सप्लाई चेन, निवेश और उत्पादन की योजना बनाना कठिन हो सकता है। कार्नी ने 20 अगस्त को मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम से भी व्यापारिक स्थिति पर बातचीत की थी। दोनों नेताओं ने उत्तर अमेरिकी व्यापार व्यवस्था में अधिक निश्चितता के लिए सीयूएसएमए को नवीनीकृत करने के महत्व पर जोर दिया।
तत्काल असर उन उद्योगों पर अधिक होगा जिनके उत्पाद नए अमेरिकी शुल्क के दायरे में आते हैं। कुछ क्षेत्रों में अमेरिकी बाजार तक पहुंच महंगी होने से निर्यातकों के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। दूसरी तरफ, कनाडा द्वारा जवाबी टैरिफ लगाए जाने पर अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं पर भी लागत बढ़ सकती है। ट्रेड वॉर में शुल्क का आर्थिक बोझ अक्सर दोनों तरफ की सप्लाई चेन में फैलता है, हालांकि वास्तविक असर उत्पाद, बाजार और कंपनियों की मूल्य निर्धारण क्षमता के अनुसार अलग-अलग होता है। रॉयटर्स ने चेतावनी दी है कि नए शुल्क कुछ कनाडाई उद्योगों में रोजगार और कारोबार को नुकसान पहुंचा सकते हैं। वहीं अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि टैरिफ अमेरिकी उत्पादकों को कनाडाई बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी स्थिति देंगे।
फिलहाल बातचीत निलंबित है। इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में दोनों देशों के बीच बातचीत असंभव हो गई है, लेकिन 22 अगस्त की स्थिति में कोई नया वार्ता दौर तय नहीं है। यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और कनाडा के आर्थिक रिश्ते बेहद गहरे हैं। दोनों देशों के उद्योग कई दशकों से एक-दूसरे पर निर्भर सप्लाई चेन के साथ काम करते हैं। इसलिए लंबी अवधि का टकराव दोनों पक्षों के लिए महंगा साबित हो सकता है।
आने वाले समय में दबाव दोनों सरकारों पर रहेगा कि वे टैरिफ और बाजार पहुंच से जुड़े विवादों को किसी नए समझौते के जरिए हल करें।
कनाडा-अमेरिका विवाद का असर उत्तर अमेरिका से बाहर भी देखा जा सकता है। मेक्सिको की सरकार पहले ही संकेत दे चुकी है कि वह अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक समझौते में कनाडा के घटनाक्रम से जुड़े पहलुओं को ध्यान से देख रही है। दूसरे देशों के लिए भी यह मामला अहम है क्योंकि अमेरिकी प्रशासन सेक्शन 338 जैसे प्रावधानों का इस्तेमाल कर व्यापारिक दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है। इससे वैश्विक कंपनियों को अमेरिका के साथ व्यापार करते समय टैरिफ जोखिम को अपनी रणनीति में शामिल करना पड़ सकता है।
अगला चरण मुख्य तौर पर तीन चीजों पर निर्भर करेगा। पहला, अमेरिकी 50% शुल्क कितने समय तक लागू रहते हैं। दूसरा, कनाडा का जवाबी टैरिफ किन अमेरिकी उत्पादों पर और किस स्तर पर लागू होता है। तीसरा, दोनों सरकारें सीयूएसएमए और व्यापक व्यापार संबंधों पर दोबारा बातचीत कब शुरू करती हैं। कार्नी सरकार पहले ही घरेलू आर्थिक क्षमता और नए अंतरराष्ट्रीय व्यापार साझेदारों पर जोर दे चुकी है। इसका मतलब है कि कनाडा अमेरिका के साथ समझौता चाहता है, लेकिन अपनी आर्थिक नीति में अधिक स्वतंत्रता भी तलाश रहा है।
कनाडा ने अमेरिका के साथ ट्रेड टॉक निलंबित करके स्पष्ट संकेत दिया है कि वह 50% अमेरिकी टैरिफ को बिना जवाब के स्वीकार करने के मूड में नहीं है। कार्नी का डॉलर-फॉर-डॉलर रुख अब दोनों देशों के बीच व्यापारिक टकराव को अगले स्तर पर ले गया है फिलहाल स्थापित तथ्य यह है कि बातचीत टूट गई है और नए अमेरिकी शुल्क प्रभावी हो गए हैं। यह भी स्पष्ट है कि दोनों पक्ष अपने-अपने व्यापारिक हितों और नीतिगत दावों को सही ठहरा रहे हैं। लेकिन अंतिम आर्थिक असर अभी तय नहीं है। आने वाले हफ्तों में टैरिफ की अवधि, जवाबी कार्रवाई और सीयूएसएमए पर नई बातचीत यह तय करेगी कि यह विवाद सीमित व्यापारिक टकराव रहता है या उत्तर अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए लंबी अवधि का संकट बनता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।