मेघना गुलजार की ‘दायरा’ एक जघन्य अपराध और उसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई के जरिए कानून, न्याय, जवाबदेही और बदले के बीच की बहस सामने रखती है। करीना कपूर और पृथ्वीराज सुकुमारन प्रमुख भूमिकाओं में हैं।
📍 मुंबई
🗓️ 18 सितंबर 2026
✍️ Mohd Naved
‘दायरा’ की कहानी सिर्फ एक अपराध की जांच तक सीमित नहीं रहती। मेघना गुलजार निर्देशित यह फिल्म उस मुश्किल सवाल को केंद्र में रखती है, जिसमें एक तरफ कानून के तहत न्याय पाने की लंबी प्रक्रिया है और दूसरी तरफ ऐसे अपराधों के बाद समाज में पैदा होने वाला तत्काल सजा का दबाव। करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन इस वैचारिक टकराव के दो अलग पक्षों का प्रतिनिधित्व करते नजर आते हैं।
फिल्म 18 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई है। इसमें पृथ्वीराज सुकुमारन, करीना कपूर खान, प्रगति मिश्रा और जितेंद्र जोशी प्रमुख भूमिकाओं में हैं। निर्देशन मेघना गुलजार ने किया है। फिल्म की अवधि करीब 2 घंटे 33 मिनट बताई गई है और इसे अपराध, थ्रिलर तथा ड्रामा के दायरे में रखा गया है।
कहानी का आधार क्या है
‘दायरा’ की कहानी एक युवती की हत्या और उससे जुड़े सामूहिक दुष्कर्म के मामले से शुरू होती है। युवती की मौत के बाद शहर में गुस्सा फैलता है और पुलिस पर आरोपियों को जल्द पकड़ने तथा कार्रवाई करने का दबाव बढ़ता है।
पुलिस चार आरोपियों को गिरफ्तार करती है। कहानी में इन आरोपियों के अपराध स्वीकार करने के बाद एक अहम मोड़ आता है, जब चारों पुलिस मुठभेड़ में मारे जाते हैं। इसके बाद मामला केवल अपराध की जांच नहीं रहता, बल्कि पुलिस कार्रवाई की वैधता और उसके पीछे की मंशा भी जांच के दायरे में आ जाती है।
यहीं से फिल्म का केंद्रीय संघर्ष शुरू होता है। क्या अपराध के आरोपी को अदालत से सजा मिलना ही न्याय की एकमात्र वैधानिक राह है? या ऐसे मामलों में तत्काल कार्रवाई को समाज का एक वर्ग न्याय के रूप में देखने लगता है?
दो पुलिस अधिकारी, दो नजरिए
फिल्म में करीना कपूर खान डीसीपी अजूनी कोहली की भूमिका में हैं। वहीं पृथ्वीराज सुकुमारन डीसीपी रमन कुमार का किरदार निभाते हैं।
अजूनी कोहली पुलिस मुठभेड़ की आधिकारिक कहानी पर सवाल उठाती हैं। उन्हें संदेह है कि आरोपियों की मौत आत्मरक्षा में हुई मुठभेड़ का नतीजा नहीं, बल्कि सुनियोजित कार्रवाई हो सकती है।
रमन कुमार का किरदार दूसरी सोच के साथ सामने आता है। वह अपराधियों को कठोर और तत्काल सजा दिए जाने की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है। इसी टकराव के जरिए फिल्म कानून और बदले के बीच मौजूद महीन सीमा को सामने लाती है।
फिल्म की शुरुआत क्यों असरदार लगती है
उपलब्ध समीक्षाओं के मुताबिक ‘दायरा’ का पहला हिस्सा जांच-पड़ताल, अपराध की गंभीरता और पीड़ित परिवार के दर्द को प्रभावी तरीके से जोड़ता है। एफआईआर दर्ज कराने से लेकर पुलिस जांच तक की प्रक्रिया को कहानी का अहम हिस्सा बनाया गया है।
फिल्म का शुरुआती हिस्सा दर्शक को सीधे मामले के केंद्र में ले जाता है। अपराध के बाद परिवार पर पड़ने वाला दबाव और पुलिस के सामने मौजूद सामाजिक अपेक्षाएं कहानी को एक गंभीर आधार देती हैं।
यही वजह है कि फिल्म शुरुआत में एक सघन पुलिस थ्रिलर की शक्ल लेती है।
दूसरे हिस्से में क्यों कमजोर पड़ती है कहानी
कहानी का दूसरा हिस्सा ज्यादा वैचारिक हो जाता है। यहां जांच के साथ-साथ कानून, न्याय और तत्काल सजा को लेकर दो अलग नजरिए आमने-सामने आते हैं।
नवभारत टाइम्स की समीक्षा में भी फिल्म के दूसरे हिस्से की पटकथा को अपेक्षाकृत कमजोर बताया गया है। समीक्षा के मुताबिक करीना और पृथ्वीराज के किरदारों के बीच वैचारिक संघर्ष को अधिक विस्तार मिलता तो केंद्रीय सवाल ज्यादा प्रभावशाली बन सकता था।
इंडिया टुडे की समीक्षा ने भी फिल्म के विषय को मजबूत बताया, लेकिन यह टिप्पणी की कि फिल्म अपने उठाए गए सवालों को पूरी गहराई तक नहीं ले जा पाती।
दूसरी ओर, हिंदुस्तान टाइम्स ने फिल्म के शुरुआती धीमेपन के बावजूद इसकी जांच और न्याय से जुड़े सवालों को महत्वपूर्ण माना।
पृथ्वीराज सुकुमारन का अभिनय
पृथ्वीराज सुकुमारन फिल्म में डीसीपी रमन कुमार की भूमिका निभाते हैं। उनके किरदार में पुलिस अधिकारी की सख्ती और अपराधियों के प्रति कठोर रवैया प्रमुख है।
नवभारत टाइम्स की समीक्षा में उनके अभिनय और किरदार के प्रति उनके कन्विक्शन को फिल्म की प्रमुख खूबियों में रखा गया है। इंडियन एक्सप्रेस ने भी उनके प्रदर्शन को फिल्म की मजबूत कड़ियों में गिना है।
रमन कुमार का किरदार इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि उसके जरिए फिल्म यह सवाल रखती है कि पुलिस अधिकारी के लिए कानून की प्रक्रिया सर्वोच्च होनी चाहिए या अपराध की गंभीरता उसे कठोर कार्रवाई की तरफ ले जा सकती है।
करीना कपूर खान के किरदार की स्थिति
करीना कपूर खान डीसीपी अजूनी कोहली के किरदार में दिखाई देती हैं। उनका किरदार मुठभेड़ की जांच और पुलिस जवाबदेही के सवाल को आगे बढ़ाता है।
नवभारत टाइम्स ने उनके अभिनय को सहज बताया, लेकिन यह भी माना कि पटकथा उनके किरदार को उतनी गहराई नहीं दे पाती, जितनी इस भूमिका में गुंजाइश थी।
इंडियन एक्सप्रेस की समीक्षा में भी करीना के किरदार को लेकर इसी तरह की समस्या की ओर इशारा किया गया है। समीक्षा के मुताबिक फिल्म उनके स्टार व्यक्तित्व और किरदार के बीच संतुलन पूरी तरह स्थापित नहीं कर पाती।
फिल्म के सह कलाकार भी कहानी को मजबूती देते हैं। जितेंद्र जोशी और तृप्ति खामकर के काम का उल्लेख समीक्षाओं में किया गया है। क्षिति जोग पीड़ित परिवार की मां की भूमिका में दिखाई देती हैं और उनके किरदार के जरिए बेटी को खोने के बाद परिवार के दर्द को सामने लाया जाता है।
यह हिस्सा फिल्म के अपराध और कानूनी बहस वाले ढांचे में मानवीय पहलू जोड़ता है।
वास्तविक घटनाओं से जुड़ा संदर्भ
‘दायरा’ की पृष्ठभूमि दिसंबर 2019 में हैदराबाद में एक महिला के दुष्कर्म और हत्या के आरोपियों की पुलिस मुठभेड़ के बाद शुरू हुई राष्ट्रीय बहस से जुड़ी बताई गई है। उस समय पुलिस ने दावा किया था कि अपराध स्थल की पुनर्रचना के दौरान आरोपियों ने हथियार छीनकर भागने की कोशिश की थी और आत्मरक्षा में गोली चलाई गई। इस घटनाक्रम की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जांच आयोग गठित किया था।
फिल्म इसी व्यापक बहस को काल्पनिक कथा के माध्यम से देखती है। एनडीटीवी की समीक्षा भी इसे सार्वजनिक रूप से उपलब्ध घटनाक्रमों से प्रेरित कथा के रूप में वर्णित करती है और बताती है कि फिल्म किसी निश्चित शहर की पहचान को केंद्र में रखने के बजाय एक अनिर्दिष्ट शहर की पृष्ठभूमि इस्तेमाल करती है।
इसलिए फिल्म को वास्तविक घटना का सीधा पुनर्निर्माण मानने के बजाय उससे प्रेरित एक काल्पनिक सिनेमाई प्रस्तुति के रूप में देखना अधिक उचित है।
कानून बनाम त्वरित इंसाफ की बहस
‘दायरा’ का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही बहस है कि गंभीर अपराध के मामलों में न्याय की प्रक्रिया कैसी होनी चाहिए।
एक पक्ष अदालत और कानूनी प्रक्रिया पर भरोसा करने की बात करता है। दूसरे पक्ष में अपराध की भयावहता के कारण तत्काल सजा की मांग करने वाली सोच दिखाई देती है।
फिल्म किसी एक सरल जवाब पर रुकने के बजाय दोनों सोच को टकराव में रखती है। इसी वजह से कहानी का मूल विषय केवल अपराध की जांच नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था पर सामाजिक भरोसा भी बन जाता है।
पुलिस जवाबदेही का सवाल
फिल्म पुलिस की भूमिका को भी जांच के दायरे में लाती है। किसी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करते समय पुलिस की जवाबदेही, जांच की पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण सवाल बनते हैं।
‘दायरा’ का कथानक इसी बिंदु पर ज्यादा गंभीर हो जाता है। अगर पुलिस की कार्रवाई पर ही संदेह पैदा हो जाए, तो जांच करने वाली संस्था और जांच के घेरे में आने वाली संस्था के बीच संतुलन कैसे कायम होगा?
फिल्म इस सवाल को सीधे दर्शक के सामने रखती है।
जुवेनाइल जस्टिस का पहलू
फिल्म जुवेनाइल जस्टिस जैसे संवेदनशील विषय को भी छूती है। हालांकि उपलब्ध समीक्षा के अनुसार इस मुद्दे को कहानी में पूरी गहराई नहीं मिल पाती।
यह पहलू महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि किशोर अपराध के मामलों में कानून, पुनर्वास, सजा और समाज की सुरक्षा के बीच संतुलन का सवाल अलग कानूनी और सामाजिक संदर्भ पैदा करता है।
मेघना गुलजार का ट्रीटमेंट
मेघना गुलजार की फिल्मों में सामाजिक और मानवीय जटिलताओं को कहानी के केंद्र में रखने की प्रवृत्ति दिखाई देती रही है। ‘दायरा’ में भी वह पुलिस जांच के साथ न्याय और नैतिकता की बहस को जोड़ती हैं।
फिल्म का रियलिस्टिक ट्रीटमेंट कई समीक्षाओं में सकारात्मक पहलू के रूप में सामने आया है। हालांकि पटकथा के दूसरे हिस्से को लेकर आलोचनात्मक टिप्पणियां भी मौजूद हैं।
यानी फिल्म का विषय मजबूत है, लेकिन उसके सिनेमाई विस्तार को लेकर समीक्षकों की राय एक जैसी नहीं है।
फिल्म का असर किस वजह से बनता है
‘दायरा’ की सबसे बड़ी ताकत उसका सवाल है। अपराध के बाद समाज तत्काल परिणाम चाहता है, लेकिन न्याय व्यवस्था प्रक्रिया और प्रमाण पर चलती है।
फिल्म इसी अंतर को पुलिस अधिकारियों और पीड़ित परिवार की कहानी के जरिए सामने रखती है।
पृथ्वीराज का कठोर पुलिस अधिकारी और करीना का जांच पर सवाल उठाने वाला अधिकारी एक ऐसा द्वंद्व तैयार करते हैं, जिसमें दर्शक को कानून, भावना और सामाजिक दबाव के बीच अंतर समझने का मौका मिलता है।
क्या ‘दायरा’ सिर्फ एक क्राइम थ्रिलर है
फिल्म को केवल क्राइम थ्रिलर के रूप में देखना इसके मूल विषय को सीमित कर देगा। इसमें अपराध की जांच जरूर है, लेकिन इसके केंद्र में न्याय व्यवस्था, पुलिस कार्रवाई और सामाजिक प्रतिक्रिया का सवाल है।
यही वजह है कि फिल्म का दूसरा हिस्सा ज्यादा वैचारिक हो जाता है। जहां पहला भाग अपराध और जांच पर केंद्रित है, वहीं बाद का हिस्सा इस सवाल पर जाता है कि इंसाफ की परिभाषा कौन तय करता है।
अलग-अलग समीक्षाओं का नजरिया
‘दायरा’ को लेकर शुरुआती समीक्षाओं में पूरी तरह एकमत राय नहीं है। नवभारत टाइम्स ने फिल्म को 2.5 में से 5 अंक दिए और पटकथा की कमजोरियों की ओर ध्यान दिलाया।
इंडिया टुडे ने फिल्म के केंद्रीय सवालों को प्रभावी माना, लेकिन उसके प्रभाव को सीमित बताया।
हिंदुस्तान टाइम्स ने इसे नैतिक और कानूनी जटिलताओं वाली फिल्म बताया तथा 3 स्टार की रेटिंग दी।
एनडीटीवी की समीक्षा ने करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन दोनों के प्रदर्शन को प्रमुखता दी और फिल्म को 3.5 की रेटिंग दी।
इन अलग-अलग समीक्षाओं से साफ है कि फिल्म की विषयवस्तु और कलाकारों के प्रदर्शन पर सकारात्मक टिप्पणियां मौजूद हैं, जबकि पटकथा की गहराई और दूसरे हिस्से की गति को लेकर आलोचना भी सामने आई है।
दर्शकों के लिए क्या मायने रखता है
‘दायरा’ उन दर्शकों के लिए ज्यादा प्रासंगिक हो सकती है जो अपराध आधारित कहानियों के साथ कानूनी और सामाजिक बहस को भी देखना चाहते हैं।
फिल्म का फोकस केवल यह बताने पर नहीं है कि अपराध किसने किया। वह यह पूछती है कि अपराध के बाद राज्य, पुलिस, अदालत और समाज की भूमिका क्या होनी चाहिए।
यही सवाल फिल्म को सामान्य पुलिस थ्रिलर से अलग दिशा देता है।
‘दायरा’ एक ऐसे विषय को पर्दे पर लाती है जिस पर भारत में लंबे समय से कानूनी और सामाजिक बहस होती रही है। करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन के किरदार इस बहस को दो अलग दृष्टिकोण देते हैं।
फिल्म का पहला हिस्सा अपराध और जांच के स्तर पर मजबूत आधार तैयार करता है। दूसरे हिस्से में कानून, न्याय और त्वरित सजा की वैचारिक बहस कहानी पर हावी हो जाती है। उपलब्ध समीक्षाओं में भी इसी हिस्से को लेकर सबसे अधिक मतभेद दिखाई देता है।
फिल्म की अहमियत उसके अंतिम जवाब में कम और उस सवाल में ज्यादा है जिसे वह दर्शक के सामने छोड़ती है। गंभीर अपराध के बाद इंसाफ की मांग स्वाभाविक है, लेकिन न्याय की प्रक्रिया और पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही भी उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं। ‘दायरा’ इसी तनाव को सिनेमाई कहानी में बदलने की कोशिश करती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।