ई20 ईंधन नीति पर कांग्रेस ने सरकार की नीयत और तैयारी पर सवाल उठाए। पार्टी का कहना है कि जल संकट और खाद्य सुरक्षा पर असर का समुचित आकलन नहीं हुआ। बहस अब पर्यावरण बनाम ऊर्जा सुरक्षा के बीच केंद्रित हो गई है।
📍 नई दिल्ली
📰 06 अगस्त 2026
✍️ By Asif Khan
भारत में ई20 ईंधन नीति को लेकर सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस ने इस पॉलिसी पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि इसे जल्दबाजी में लागू किया जा रहा है। पार्टी का आरोप है कि सरकार इसे ग्रीन एनर्जी के तौर पर पेश कर रही है, लेकिन इसके इकोलॉजिकल असर का मुकम्मल तजज़िया नहीं किया गया।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि इस नीति के तहत एथेनॉल उत्पादन के लिए जिन फसलों का इस्तेमाल हो रहा है, वे खुद भारी मात्रा में पानी की खपत करती हैं। ऐसे में यह कदम पर्यावरण संरक्षण के बजाय संसाधनों पर दबाव बढ़ा सकता है।
ई20 ईंधन नीति के तहत पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य तय किया गया है। सरकार का दावा है कि इससे तेल आयात पर निर्भरता कम होगी और कार्बन उत्सर्जन घटेगा।
भारत पहले ही ई10 और ई15 ब्लेंडिंग की दिशा में आगे बढ़ चुका है। अब लक्ष्य 2025-26 तक पूरे देश में ई20 लागू करना है। यह रणनीति ऊर्जा सुरक्षा और इकोनॉमी को मजबूत करने के नजरिए से तैयार की गई है।
लेकिन इस पॉलिसी के लागू होने के साथ ही कई नए सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
कांग्रेस का सबसे बड़ा तर्क पानी की खपत को लेकर है। पार्टी के मुताबिक, गन्ना और धान जैसी फसलें देश के कुल सिंचाई जल का करीब 70 प्रतिशत इस्तेमाल करती हैं।
डेटा के अनुसार
एक लीटर गन्ना आधारित एथेनॉल बनाने में लगभग 3,630 लीटर पानी लगता है
चावल आधारित एथेनॉल में 10,790 लीटर तक पानी की जरूरत होती है
मक्का आधारित एथेनॉल में करीब 4,670 लीटर पानी खर्च होता है
यह आंकड़े जल संकट वाले भारत के लिए चिंता का विषय बनते हैं। खासकर तब, जब देश के कई हिस्सों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है।
नीति आयोग के 2021 एथेनॉल रोडमैप में साफ कहा गया था कि भारत को टिकाऊ फीडस्टॉक की ओर बढ़ना चाहिए। इसमें कृषि अवशेष और बायो-वेस्ट से एथेनॉल बनाने की सलाह दी गई थी।
लेकिन मौजूदा हालात में उत्पादन का बड़ा हिस्सा गन्ना, धान और मक्का पर आधारित है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार इस दिशा में जरूरी बदलाव नहीं कर रही, बल्कि चावल के इस्तेमाल को सब्सिडी देकर और बढ़ावा दे रही है।
यह बहस सिर्फ पानी तक सीमित नहीं है। खाद्य सुरक्षा भी एक बड़ा मसला बनकर उभर रही है।
अगर खाद्यान्न फसलें एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होंगी, तो इसका असर बाजार में उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है।
कांग्रेस का कहना है कि यह नीति लंबे समय में गरीब और मध्यम वर्ग पर बोझ डाल सकती है। हालांकि सरकार का तर्क है कि अतिरिक्त उत्पादन और बफर स्टॉक का इस्तेमाल किया जा रहा है।
सरकार इस पॉलिसी को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम मानती है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, एथेनॉल ब्लेंडिंग से
तेल आयात बिल कम होगा
कार्बन उत्सर्जन घटेगा
किसानों की आय बढ़ेगी
सरकार यह भी कहती है कि एथेनॉल उत्पादन से शुगर इंडस्ट्री को स्थिरता मिली है और गन्ना किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित हुआ है।
कांग्रेस ने यह भी मुद्दा उठाया कि कई देश एथेनॉल उत्पादन के लिए कृषि अपशिष्ट और गैर-खाद्य स्रोतों का उपयोग करते हैं।
ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों में सेकेंड जनरेशन एथेनॉल तकनीक पर ज्यादा फोकस है। इससे पानी और खाद्यान्न पर दबाव कम पड़ता है।
भारत में भी इस दिशा में कुछ प्रोजेक्ट शुरू हुए हैं, लेकिन अभी उनका स्केल सीमित है।
ई20 ईंधन नीति को लागू करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, वाहन संगतता और सप्लाई चेन जैसे मुद्दे भी सामने हैं।
ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री पहले ही कह चुकी है कि सभी वाहन ई20 के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं।
इसके अलावा, देशभर में एथेनॉल सप्लाई का संतुलन बनाए रखना भी एक चुनौती है।
ई20 ईंधन नीति अब सियासी बहस का हिस्सा बन चुकी है। कांग्रेस इसे पर्यावरणीय नजरिए से कमजोर बता रही है, जबकि सरकार इसे विकास और ऊर्जा सुरक्षा से जोड़ रही है।
यह टकराव आने वाले समय में और तेज हो सकता है, खासकर तब जब जल संकट और खाद्य महंगाई जैसे मुद्दे उभरेंगे।
ई20 ईंधन नीति भारत की ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा है, लेकिन इसके साथ जुड़े पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जरूरी है कि नीति का दायरा बढ़ाया जाए और टिकाऊ फीडस्टॉक पर तेजी से काम हो।
ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन के बीच सही तालमेल ही इस नीति की असली कसौटी बनेगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।