गीतिका जाखड़ की कुश्ती यात्रा क्यों खास है?
अर्जुन पुरस्कार से कॉमनवेल्थ सिल्वर तक गीतिका का सफर
महिला कुश्ती की राह बदलने वाली गीतिका जाखड़
गीतिका जाखड़ भारतीय महिला कुश्ती की अग्रणी खिलाड़ियों में रहीं। 2006 में वह अर्जुन पुरस्कार पाने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं। 2014 ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने 63 किलोग्राम वर्ग में रजत जीता। उनकी उपलब्धियां महिला कुश्ती के विस्तार की अहम मिसाल हैं।
Location: ग्लासगो, स्कॉटलैंड / हिसार, हरियाणा
Date: 17 अगस्त 2026
By Mohd Naved
भारतीय महिला कुश्ती के इतिहास में गीतिका जाखड़ का नाम एक अहम मुकाम रखता है। 2006 में उन्हें कुश्ती के लिए अर्जुन पुरस्कार मिला। भारत सरकार के खेल मंत्रालय की आधिकारिक सूची में उनका नाम 2006 के अर्जुन पुरस्कार विजेताओं में दर्ज है।
इसके बाद उनका अंतरराष्ट्रीय सफर भी लगातार चर्चा में रहा। 2014 के ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में गीतिका ने महिलाओं की 63 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती में रजत पदक हासिल किया। भारत सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी इस पदक की पुष्टि होती है।
गीतिका जाखड़ का जिक्र भारतीय महिला कुश्ती की उन खिलाड़ियों में होता है जिन्होंने उस दौर में अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान मजबूत की, जब महिला कुश्ती अभी आज जैसी व्यापक लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाई थी।
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक 2006 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार दिया गया। खेल मंत्रालय की आधिकारिक सूची में गीतिका जाखड़ का नाम कुश्ती के अर्जुन पुरस्कार विजेताओं में दर्ज है।
उनके करियर की एक और बड़ी उपलब्धि 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स रही। ग्लासगो में महिलाओं के 63 किलोग्राम फ्रीस्टाइल वर्ग के फाइनल में उनका मुकाबला कनाडा की डेनियल लैपेज से हुआ। गीतिका को 0-7 से हार का सामना करना पड़ा और उन्हें रजत पदक मिला।
गीतिका जाखड़ की उपलब्धियों को केवल एक पदक या एक पुरस्कार के आधार पर देखना अधूरा होगा। उनका करियर भारतीय महिला कुश्ती के उस संक्रमणकाल से जुड़ा रहा, जब महिला पहलवानों की अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी लगातार मजबूत हो रही थी।
उनके नाम 2006 एशियाई खेलों में रजत पदक और 2014 एशियाई खेलों में कांस्य पदक जैसी उपलब्धियां भी दर्ज हैं। 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में उनका रजत इस अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड की एक महत्वपूर्ण कड़ी रहा।
कॉमनवेल्थ गेम्स में 63 किलोग्राम वर्ग का उनका रजत पदक भारतीय खेल रिकॉर्ड में भी दर्ज है। राष्ट्रीय सेवा योजना के आधिकारिक रिकॉर्ड में गीतिका जाखड़ को 31 जुलाई 2014 को महिलाओं की 63 किलोग्राम कुश्ती में रजत पदक विजेता बताया गया है।
गीतिका जाखड़ का खेल सफर हरियाणा की मजबूत कुश्ती परंपरा से जुड़ा रहा है। उपलब्ध प्रोफाइल के मुताबिक उन्होंने कम उम्र में कुश्ती शुरू की और घरेलू स्तर पर भी कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं।
2003 और 2005 में उन्होंने कॉमनवेल्थ कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल किए। 2005 में उन्हें प्रतियोगिता की सर्वश्रेष्ठ पहलवान भी चुना गया था।
2006 उनके करियर का निर्णायक साल रहा। एशियाई खेलों में रजत पदक के साथ उन्हें अर्जुन पुरस्कार मिला। भारत सरकार की आधिकारिक सूची इस पुरस्कार की पुष्टि करती है।
2014 में ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान उन्होंने फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। भारतीय ओलंपिक संघ के रिकॉर्ड में उन्हें महिलाओं के 63 किलोग्राम फ्रीस्टाइल वर्ग के खिलाड़ी के तौर पर दर्ज किया गया है।
गीतिका जाखड़ की उपलब्धियों को लेकर सरकारी संस्थानों का रिकॉर्ड स्पष्ट है। 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान तत्कालीन खेल मंत्री सरबानंद सोनोवाल ने भारतीय पदक विजेताओं को बधाई दी थी। आधिकारिक विज्ञप्ति में गीतिका के 63 किलोग्राम वर्ग के रजत पदक का उल्लेख है।
राष्ट्रपति भवन ने भी 2014 में गीतिका जाखड़ समेत भारतीय पदक विजेताओं को बधाई दी थी। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की ओर से जारी संदेश में खिलाड़ियों की मेहनत और उपलब्धियों की सराहना की गई थी।
भारतीय कुश्ती महासंघ के मौजूदा रिकॉर्ड में भी गीतिका जाखड़ को अर्जुन पुरस्कार विजेता के रूप में दर्ज किया गया है। संगठन की चयन समिति में उनका नाम सदस्य के तौर पर भी दर्ज है।
उपलब्ध प्राथमिक स्रोत गीतिका जाखड़ की तीन अहम उपलब्धियों को मजबूती से स्थापित करते हैं।
पहली, 2006 का अर्जुन पुरस्कार। खेल मंत्रालय की आधिकारिक सूची में उनका नाम स्पष्ट रूप से मौजूद है।
दूसरी, 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स का रजत पदक। भारत सरकार की विज्ञप्ति में 63 किलोग्राम महिला फ्रीस्टाइल वर्ग में उनका रजत दर्ज है।
तीसरी, 2014 में उनकी भागीदारी की पुष्टि भारतीय ओलंपिक संघ के रिकॉर्ड से होती है।
एक सावधानी जरूरी है। कुछ स्रोत अर्जुन पुरस्कार को लेकर उन्हें “पहली भारतीय महिला पहलवान” बताते हैं। यह दावा कई प्रतिष्ठित स्रोतों में मिलता है, जबकि खेल मंत्रालय की आधिकारिक सूची पुरस्कार विजेताओं का रिकॉर्ड देती है। इसलिए इसे ऐतिहासिक संदर्भ के तौर पर प्रस्तुत करना अधिक उपयुक्त है।
गीतिका जाखड़ की कहानी का महत्व उनके पदकों से आगे जाता है। महिला कुश्ती के शुरुआती अंतरराष्ट्रीय दौर में उनकी मौजूदगी ने भारतीय महिला पहलवानों की प्रतिस्पर्धी क्षमता को सामने रखा।
उनके बाद भारतीय महिला कुश्ती में कई खिलाड़ियों ने बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पदक जीते। गीतिका का दौर इस बदलाव की शुरुआती कड़ियों में शामिल रहा।
हरियाणा की कुश्ती संस्कृति ने इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई। विभिन्न रिपोर्टों में गीतिका ने खुद महिला कुश्ती के प्रति समाज की बदलती सोच और खेल में लड़कियों की बढ़ती भागीदारी पर बात की थी।
गीतिका जाखड़ की उपलब्धियों का सीधा राजनीतिक प्रभाव बताना उचित नहीं होगा। लेकिन उनकी कामयाबी उस व्यापक खेल नीति और संस्थागत व्यवस्था के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिसमें राष्ट्रीय स्तर के प्रदर्शन को पुरस्कार, सरकारी समर्थन और खेल संस्थाओं में प्रतिनिधित्व से जोड़ा जाता है।
अर्जुन पुरस्कार इस संदर्भ में एक अहम राष्ट्रीय सम्मान है। 2006 में गीतिका को यह सम्मान मिलना महिला कुश्ती के लिए एक उल्लेखनीय संस्थागत मान्यता थी।
महिला कुश्ती के लिए सामाजिक स्वीकृति लंबे समय से एक महत्वपूर्ण मुद्दा रही है। गीतिका जाखड़ की पीढ़ी के खिलाड़ियों ने ऐसे समय में प्रतिस्पर्धा की जब महिला पहलवानों की संख्या और दृश्यता आज की तुलना में कम थी।
हरियाणा में महिला कुश्ती को लेकर सामाजिक नजरिए में बदलाव पर प्रकाशित रिपोर्टों में गीतिका की भूमिका और उनके अनुभवों का उल्लेख मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां खेल को सामाजिक स्वीकृति दिलाने की प्रक्रिया का हिस्सा बनीं।
2014 ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने कुश्ती में कई पदक जीते। गीतिका का रजत भी उसी अभियान का हिस्सा था। उस दिन भारत ने कुश्ती में उनके अलावा बाबिता कुमारी और योगेश्वर दत्त के जरिए स्वर्ण पदक भी हासिल किए थे।
गीतिका के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी अहम थी क्योंकि कॉमनवेल्थ मंच पर उनका अंतरराष्ट्रीय अनुभव पहले से मजबूत था। उनके पूर्व रिकॉर्ड में कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप की स्वर्ण और रजत उपलब्धियां भी दर्ज हैं।
गीतिका जाखड़ के खेल जीवन से जुड़े प्रमुख तथ्य आधिकारिक रिकॉर्ड में पर्याप्त रूप से दर्ज हैं। हालांकि उनके पूरे करियर की विस्तृत सांख्यिकीय समीक्षा के लिए सभी अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों का एकीकृत प्राथमिक डेटाबेस आवश्यक होगा।
विशेष रूप से अलग-अलग स्रोतों में उनके शुरुआती घरेलू करियर और कुछ उपलब्धियों के वर्ष को लेकर अंतर दिखाई देता है। ऐसे विवरणों में प्राथमिक खेल रिकॉर्ड को प्राथमिकता देना अधिक विश्वसनीय तरीका है।
इसलिए गीतिका की उपलब्धियों का मूल्यांकन करते समय अर्जुन पुरस्कार और कॉमनवेल्थ पदक जैसे आधिकारिक रूप से प्रमाणित तथ्यों को आधार बनाना चाहिए।
गीतिका जाखड़ की विरासत भारतीय महिला कुश्ती के इतिहास में दर्ज उपलब्धियों के साथ आगे बढ़ेगी। आज भारतीय महिला पहलवानों की अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी पहले से कहीं अधिक मजबूत है।
इस बदलाव को किसी एक खिलाड़ी के खाते में डालना उचित नहीं होगा। लेकिन गीतिका जाखड़ जैसी शुरुआती अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों ने उस दौर में प्रतिस्पर्धा की जब महिला कुश्ती को व्यापक पहचान हासिल करने की प्रक्रिया चल रही थी।
उनका अर्जुन पुरस्कार और कॉमनवेल्थ रजत इसी व्यापक बदलाव के दो स्पष्ट पड़ाव हैं।
गीतिका जाखड़ का करियर भारतीय महिला कुश्ती के विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। 2006 का अर्जुन पुरस्कार उनकी राष्ट्रीय पहचान को स्थापित करता है, जबकि 2014 ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स का रजत उनकी अंतरराष्ट्रीय निरंतरता को दर्शाता है।
उनकी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि उपलब्धियां केवल पदक और पुरस्कार तक सीमित नहीं रहतीं। वे खेल की सामाजिक स्वीकृति, महिला खिलाड़ियों की दृश्यता और अगली पीढ़ी के लिए बने माहौल पर भी असर डालती हैं। गीतिका जाखड़ इसी बदलाव के शुरुआती महत्वपूर्ण चेहरों में एक हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।