ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की मांग के बीच अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने सुरक्षा समझौते पर सहमति जताई है। समझौते में अमेरिकी सैन्य बेस, पहुंच और ओवरफ्लाइट अधिकार शामिल हैं। डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने संप्रभुता और आत्मनिर्णय बरकरार रहने की बात कही है।
ग्रीनलैंड | 19 सितंबर 2026
By Mohd Haris
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच महीनों से जारी तनाव के बाद अब दोनों पक्षों के बीच एक सुरक्षा समझौते पर सहमति बनी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ऐसा समझौता बताया है, जिसके तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों पर स्थायी भूमिका मिलेगी। दूसरी ओर डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने साफ किया है कि समझौता उनकी संप्रभुता और आत्मनिर्णय के अधिकार को खत्म नहीं करता।
समझौते में क्या हुआ?
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अमेरिका को ग्रीनलैंड में स्थायी सैन्य पहुंच, बेसिंग और ओवरफ्लाइट अधिकार देने की व्यवस्था की गई है। इससे वॉशिंगटन को द्वीप पर अपनी मौजूदा सैन्य मौजूदगी बढ़ाने और नई सैन्य सुविधाएं विकसित करने का रास्ता मिलेगा। अमेरिकी प्रशासन ने ग्रीनलैंड में बड़ी सैन्य मौजूदगी विकसित करने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही है।
समझौते में यह भी प्रावधान है कि अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी देशों को ग्रीनलैंड में सैन्य बेस या सैन्य मौजूदगी स्थापित करने की अनुमति नहीं होगी। संवेदनशील क्षेत्रों में विदेशी निवेश को लेकर भी नियंत्रण की व्यवस्था बताई गई है। अमेरिकी अधिकारियों ने खास तौर पर रूस और चीन की सैन्य और निवेश गतिविधियों को रोकने की बात कही है।
ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा नहीं
इस समझौते को अमेरिकी कब्ज़े के रूप में पेश करना उपलब्ध जानकारी के अनुरूप नहीं है। ग्रीनलैंड डेनमार्क के साम्राज्य के भीतर एक स्वायत्त क्षेत्र है और नए समझौते में उसका क्षेत्र अमेरिका को हस्तांतरित किए जाने की बात सामने नहीं आई है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने कहा है कि समझौता डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता को मान्यता देता है।
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन ने भी समझौते को तीनों पक्षों के हित में बताया है। उनके मुताबिक इसमें ग्रीनलैंड के हितों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में उसकी भूमिका को मान्यता दी गई है।
ट्रंप का दावा क्या है?
ट्रंप ने समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा पर स्थायी नियंत्रण मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका द्वीप पर अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में तुरंत काम शुरू करेगा। हालांकि समझौते का अंतिम कानूनी स्वरूप और उसके सभी प्रावधान अभी सार्वजनिक रूप से पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुए हैं।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड का रुख
डेनमार्क और ग्रीनलैंड लंबे समय से कहते रहे हैं कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने पिछले महीनों में द्वीप को अमेरिका के नियंत्रण में लाने की मांग की थी और सैन्य विकल्प से इनकार नहीं किया था। इससे डेनमार्क और उसके यूरोपीय सहयोगियों के साथ तनाव बढ़ गया था।
नए समझौते में डेनमार्क ने अपनी संप्रभुता और ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को महत्वपूर्ण शर्त के तौर पर रेखांकित किया है। इसका अर्थ है कि ग्रीनलैंड के भविष्य की राजनीतिक स्थिति का फैसला वहां के लोगों के अधिकारों के दायरे में रहेगा।
रूस और चीन पर असर
ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण अमेरिका और यूरोप के लिए रणनीतिक महत्व रखता है। समझौते में गैर-नाटो देशों के सैन्य बेस और संवेदनशील निवेश पर रोक लगाने की व्यवस्था बताई गई है। इससे रूस और चीन की संभावित रणनीतिक मौजूदगी पर अंकुश लगाने की अमेरिकी कोशिश मजबूत होगी।
अमेरिका पहले से ग्रीनलैंड में मौजूद
अमेरिका की ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी नई नहीं है। 1951 के रक्षा समझौते के बाद से अमेरिका को वहां सैन्य पहुंच हासिल है। उत्तर-पश्चिमी ग्रीनलैंड में पिटुफिक स्पेस बेस अमेरिकी मिसाइल चेतावनी, मिसाइल रक्षा और अंतरिक्ष निगरानी अभियानों के लिए इस्तेमाल होता है। नए समझौते का प्रमुख असर इस मौजूदा पहुंच को और व्यापक तथा दीर्घकालिक बनाने पर है।
समझौता कब लागू होगा?
डेनमार्क और ग्रीनलैंड के मुताबिक तीनों सरकारें अगले सप्ताह न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान समझौते पर हस्ताक्षर करने की योजना बना रही हैं। इसके बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संसदों की प्रक्रिया भी जरूरी होगी। इसलिए मौजूदा स्थिति को अंतिम रूप से लागू समझौते के बजाय सहमति और हस्ताक्षर की तैयारी के चरण के तौर पर देखना अधिक सटीक है।
आगे क्या बदलेगा?
सबसे बड़ा बदलाव ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों के विस्तार के रूप में सामने आ सकता है। अमेरिका को बेसिंग, सैन्य पहुंच और हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल के लिए दीर्घकालिक अधिकार मिलने से आर्कटिक में उसकी रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी।
दूसरी ओर डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि सुरक्षा सहयोग का अर्थ क्षेत्रीय संप्रभुता का हस्तांतरण न हो। इसलिए इस समझौते में सुरक्षा और संप्रभुता के बीच संतुलन सबसे महत्वपूर्ण पहलू बना हुआ है।
ग्रीनलैंड विवाद का नया चरण
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी दबाव अब सैन्य कब्ज़े की बहस से हटकर सुरक्षा सहयोग और सैन्य पहुंच के ढांचे में जाता दिखाई दे रहा है। फिर भी समझौते की वास्तविक अहमियत उसके अंतिम कानूनी पाठ, संसदों की मंजूरी और ग्रीनलैंड के राजनीतिक नेतृत्व की आगे की भूमिका से तय होगी।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी में ग्रीनलैंड का अमेरिका को हस्तांतरण नहीं हुआ है। इसके बजाय अमेरिका की सैन्य मौजूदगी बढ़ाने और आर्कटिक सुरक्षा में उसकी भूमिका को स्थायी बनाने पर सहमति बनी है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।