बीजेपी को चुनाव आयोग निष्पक्ष लगता है तो दूसरा चुनाव आयुक्त नियुक्त करे: अखिलेश यादव
Wasi Siddiqui
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2026-10-06 14:08:06
SIR विवाद के बीच अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बीजेपी आयोग को निष्पक्ष मानती है तो दूसरा चुनाव आयुक्त नियुक्त करे।
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नई दिल्ली
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6 अक्टूबर 2026
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Wasi Siddiqui
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर अखिलेश का सवाल
नई दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्षी दलों के विरोध के बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए बीजेपी को चुनौती दी कि अगर उसे निर्वाचन आयोग निष्पक्ष लगता है तो दूसरा चुनाव आयुक्त नियुक्त कर देना चाहिए।
अखिलेश यादव का बयान ऐसे समय आया है जब विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगातार राजनीतिक दबाव बना रहे हैं। मंगलवार, 6 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों ने दिल्ली में निर्वाचन आयोग के दफ्तर की ओर मार्च का प्रयास किया। प्रदर्शन का प्रमुख मुद्दा SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली रहा।
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग क्यों
विपक्ष की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पिछले कुछ दिनों में तेज हुई है। विवाद की प्रमुख वजह SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों की प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल हैं।
विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और निष्पक्षता से जुड़े गंभीर सवाल सामने आए हैं। खास तौर पर आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और SIR से जुड़े मुद्दों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई है।
हालांकि इन आरोपों को तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। निर्वाचन आयोग ने अपने पक्ष में कहा है कि SIR से जुड़े अंतिम फैसले आयोग के सभी सदस्यों की सहमति से लिए गए थे।
अखिलेश यादव ने क्या कहा
अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोकतंत्र में जनता को उम्मीद रहती है कि निर्वाचन आयोग निष्पक्ष भूमिका निभाएगा। उनके मुताबिक मौजूदा विवाद ने इस भरोसे को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
अखिलेश ने यह भी कहा कि अगर बीजेपी को लगता है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष है तो दूसरा चुनाव आयुक्त नियुक्त कर देना चाहिए। उनका यह बयान ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की विपक्षी मांग के बीच सामने आया है।
अखिलेश यादव ने इसी विरोध प्रदर्शन के दौरान चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर कई अन्य आरोप भी लगाए। उन्होंने दावा किया कि मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष की शिकायतों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई। ये उनके राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
SIR विवाद बना राजनीतिक टकराव का केंद्र
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR इस पूरे विवाद का प्रमुख मुद्दा है। निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों ने सवाल उठाए हैं।
विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में मतदाताओं के नाम और पात्रता को लेकर पारदर्शिता पर्याप्त नहीं है। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग ने SIR से जुड़े अपने फैसलों का बचाव किया है और कहा है कि प्रक्रिया संवैधानिक और कानूनी ढांचे के तहत आगे बढ़ाई जा रही है।
इसी विवाद के बीच आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठे। इन दावों के बाद विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को और मुखर किया। Jagran
सुप्रीम कोर्ट में भी मामला पहुंचा
ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और निर्वाचन आयोग के निर्णयों से जुड़े आरोपों पर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। 5 अक्टूबर 2026 को अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने की मांग वाली याचिका पर तत्काल अंतरिम आदेश देने से इनकार किया।
अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने आरोपों को सही या गलत घोषित कर दिया है। फिलहाल न्यायिक प्रक्रिया जारी है।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। राजनीतिक दलों के आरोप और अदालत के समक्ष लंबित कानूनी सवाल अलग-अलग विषय हैं। किसी आरोप को न्यायिक रूप से सिद्ध मानना अभी उचित नहीं होगा।
निर्वाचन आयोग का पक्ष भी महत्वपूर्ण
विवाद के बीच निर्वाचन आयोग ने SIR से जुड़े निर्णयों को लेकर अपना पक्ष रखा है। आयोग का कहना है कि संबंधित अंतिम फैसले सामूहिक रूप से लिए गए थे।
इसलिए मौजूदा विवाद में दो अलग-अलग नैरेटिव सामने आते हैं। विपक्ष आयोग की निष्पक्षता और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है, जबकि आयोग अपने फैसलों की प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप बता रहा है।
यही वजह है कि पूरे मामले में राजनीतिक आरोपों और संस्थागत तथ्यों के बीच स्पष्ट अंतर रखना जरूरी है।
अखिलेश के बयान का राजनीतिक संदेश
अखिलेश यादव का बयान केवल ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक सीमित नहीं है। इसके पीछे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता का बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी जुड़ा हुआ है।
विपक्ष SIR को लेकर मतदाता सूची की शुद्धता, नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया तथा निर्वाचन आयोग की जवाबदेही को राजनीतिक मुद्दा बना रहा है। समाजवादी पार्टी के लिए यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की आगामी चुनावी राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
अखिलेश यादव पहले भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। 6 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शन में उन्होंने कहा कि उनकी निगाहें उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर हैं।
बीजेपी के लिए चुनौती क्या है
बीजेपी और विपक्ष के बीच विवाद का एक अहम पहलू यह है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता पर राजनीतिक बहस किस स्तर तक जाएगी।
अखिलेश यादव का दूसरा चुनाव आयुक्त नियुक्त करने वाला बयान इसी बहस को और राजनीतिक धार देता है। हालांकि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति किसी राजनीतिक दल के सीधे निर्णय से नहीं होती। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति निर्धारित संवैधानिक और वैधानिक प्रक्रिया के तहत होती है।
इसलिए अखिलेश यादव की टिप्पणी को राजनीतिक चुनौती के रूप में समझना चाहिए, न कि किसी तत्काल प्रशासनिक प्रक्रिया की घोषणा के रूप में।
आगे क्या होगा
अब इस विवाद का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव न्यायिक और संस्थागत जवाब होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है और मामले पर आगे सुनवाई होगी। फिलहाल ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने या निलंबित करने का कोई अंतरिम आदेश लागू नहीं है।
दूसरी तरफ विपक्षी दलों का विरोध जारी है। 6 अक्टूबर को दिल्ली में विपक्षी सांसदों ने निर्वाचन आयोग की ओर मार्च करने की कोशिश की। पुलिस ने उन्हें रोका और प्रदर्शनकारी नेताओं ने वहीं धरना दिया।
आने वाले दिनों में SIR, मतदाता सूची और निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। लेकिन अंतिम निष्कर्ष राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि उपलब्ध दस्तावेजों, आयोग के जवाब और न्यायिक प्रक्रिया से तय होंगे।
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग अब विपक्ष और निर्वाचन आयोग के बीच व्यापक राजनीतिक टकराव का हिस्सा बन चुकी है। अखिलेश यादव ने बीजेपी को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा है कि अगर उसे चुनाव आयोग निष्पक्ष नजर आता है तो दूसरा चुनाव आयुक्त नियुक्त करे।
वहीं निर्वाचन आयोग अपने फैसलों को सामूहिक सहमति से लिया गया बता रहा है और ज्ञानेश कुमार से जुड़े आरोपों पर न्यायिक प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है।
फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि SIR और मतदाता सूची से जुड़े विवादों पर संस्थागत स्तर पर कितनी पारदर्शिता सामने आती है। राजनीतिक बयान अपनी जगह हैं, लेकिन अंतिम विश्वसनीयता दस्तावेजी रिकॉर्ड और संवैधानिक प्रक्रिया से ही तय होगी।
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Wasi Siddiqui
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।