प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत ओलंपिक के बड़ी संख्या में खेलों में हिस्सा नहीं लेता। उन्होंने 2036 तक नए खेलों में भागीदारी बढ़ाने और देशव्यापी टैलेंट हंट की जरूरत बताई।
नई दिल्ली|27 अगस्त 2026|शाह टाइम्स
By Mohd Haris
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के ओलंपिक प्रदर्शन को लेकर एक अहम चुनौती सामने रखी है। उन्होंने कहा कि भारत ओलंपिक में शामिल कई खेलों में हिस्सा ही नहीं लेता और बड़ी संख्या में स्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ी क्वालिफाई नहीं कर पाते। प्रधानमंत्री के मुताबिक अगर भारत को अपनी पदक संख्या बढ़ानी है तो उसे पारंपरिक रूप से मजबूत खेलों से आगे बढ़कर ज्यादा ओलंपिक खेलों में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी होगी।
ओलंपिक में सीमित भागीदारी बड़ी चुनौती
प्रधानमंत्री ने कहा कि ओलंपिक में करीब 40 खेल होते हैं और इनमें लगभग 325 से 350 स्पर्धाएं शामिल रहती हैं। उनके मुताबिक भारत करीब दो-तिहाई स्पर्धाओं में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाता, क्योंकि कई मामलों में भारतीय खिलाड़ी क्वालिफिकेशन हासिल नहीं कर पाते। पीएम मोदी ने इसे भारत के खेल अभियान की एक अहम कमी के तौर पर रेखांकित किया। उनका तर्क है कि अगर भारत कई स्पर्धाओं में शुरुआत से ही प्रतिस्पर्धा नहीं करता, तो पदक तालिका में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना मुश्किल रहेगा। दूसरे देशों के खिलाड़ी उन खेलों में भी पदक जीतते हैं, जिनमें भारत की मौजूदगी सीमित या अनुपस्थित रहती है।
2036 ओलंपिक की तैयारी से जोड़ा लक्ष्य
प्रधानमंत्री ने खेलों में व्यापक भागीदारी की इस जरूरत को 2036 ओलंपिक की संभावित मेजबानी से जोड़ा है। भारत ने 2036 ओलंपिक की मेजबानी की अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर की है और सरकार खेल ढांचे तथा प्रतिभा विकास को इसके लिए अहम आधार मान रही है। प्रधानमंत्री के मुताबिक 2036 के लिए तैयारी किसी एक आयोजन के करीब आने पर शुरू नहीं होनी चाहिए। इसके लिए उन बच्चों और युवाओं की पहचान अभी से करनी होगी, जिनमें अलग-अलग खेलों के लिए क्षमता मौजूद है।
देशभर में टैलेंट हंट पर फोकस
मोदी ने देशव्यापी टैलेंट हंट अभियान की जरूरत बताई है। इसका मकसद गांवों, शहरों और स्कूलों में खेल प्रतिभाओं की पहचान करना है। उन्होंने खास तौर पर 5 से 15 वर्ष की उम्र के बच्चों पर ध्यान देने की बात कही, ताकि शुरुआती स्तर पर प्रतिभा की पहचान करके उन्हें विशेषज्ञ प्रशिक्षण दिया जा सके। प्रधानमंत्री ने बेटियों को भी इस प्रतिभा खोज अभियान में समान प्राथमिकता देने की बात कही। पहचान की गई प्रतिभाओं की क्षमता का आकलन करने के बाद उन्हें उनकी खेल क्षमता के अनुरूप प्रशिक्षण देने की योजना पर जोर दिया गया है। यह रणनीति इसलिए अहम है क्योंकि ओलंपिक स्तर की तैयारी में तकनीकी प्रशिक्षण के साथ लंबे समय की फिटनेस, खेल विज्ञान, पोषण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का अनुभव भी जरूरी होता है।
खेल नीति में पहले से हो रहा बदलाव
प्रधानमंत्री ने खेल क्षेत्र में पिछले वर्षों के दौरान हुए बदलावों का भी उल्लेख किया है। उन्होंने टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम, खेलो इंडिया गेम्स, यूनिवर्सिटी गेम्स, विंटर गेम्स और बीच गेम्स जैसे कार्यक्रमों को खेल प्रतिभाओं के लिए अहम मंच बताया। खेल प्रशिक्षण, स्पोर्ट्स मेडिसिन और स्पोर्ट्स न्यूट्रिशन पर भी जोर दिया गया है। सरकार का दावा है कि इन पहलों से भारत की अंतरराष्ट्रीय खेलों में स्थिति बेहतर हुई है। प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि भारतीय खेल प्रदर्शन में लगातार सुधार हुआ है। लेकिन उनके ताजा बयान का केंद्र यह रहा कि मौजूदा प्रगति के बावजूद देश को अपनी खेल भागीदारी का दायरा काफी बढ़ाना होगा।
सिर्फ पदक जीतना पर्याप्त नहीं
प्रधानमंत्री की टिप्पणी का एक अहम पहलू खेलों में व्यापक भागीदारी है। भारत की ओलंपिक सफलता अक्सर हॉकी, शूटिंग, कुश्ती, बैडमिंटन और एथलेटिक्स जैसी कुछ प्रमुख विधाओं के प्रदर्शन से जुड़ी रही है। लेकिन ओलंपिक कार्यक्रम में कई अन्य खेल भी शामिल हैं, जहां भारतीय प्रतिनिधित्व सीमित रहा है। यही वजह है कि अधिक खेलों में क्वालिफाई करना भारत की दीर्घकालीन रणनीति का हिस्सा बन सकता है। अधिक स्पर्धाओं में खिलाड़ी उतरेंगे तो पदक के संभावित अवसर भी बढ़ेंगे। हालांकि केवल भागीदारी से पदक सुनिश्चित नहीं होते। इसके लिए विश्वस्तरीय कोचिंग, चयन प्रणाली, प्रतियोगी अनुभव, खेल विज्ञान और मजबूत घरेलू ढांचे की भी जरूरत होगी।
कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 भी अहम पड़ाव
भारत 2030 के राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी की तैयारी कर रहा है। प्रधानमंत्री ने इसे भी भारत की खेल महत्वाकांक्षाओं से जोड़ा है।
2030 तक खेल आयोजन और बुनियादी ढांचे के विकास से खिलाड़ियों को घरेलू स्तर पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का अनुभव मिलने की उम्मीद है। इसके साथ प्रशिक्षण केंद्रों, कोचिंग व्यवस्था और खेल चिकित्सा सुविधाओं को मजबूत करना भी जरूरी होगा।
चुनौती केवल प्रतिभा खोज की नहीं
भारत में खेल प्रतिभाओं की कमी लंबे समय से चर्चा का विषय रही है, लेकिन चुनौती केवल प्रतिभा खोज तक सीमित नहीं है। किसी बच्चे की शुरुआती प्रतिभा पहचान लेना पहला कदम है। उसे लंबे समय तक प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता देना, चोट से बचाव और उपचार की व्यवस्था करना, अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं तक पहुंच बनाना और बेहतर कोच उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है। ग्रामीण इलाकों में प्रतिभा खोज का फायदा तभी स्थायी परिणाम देगा, जब चयनित खिलाड़ियों के लिए आगे की पूरी व्यवस्था मौजूद हो। स्कूल स्तर से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक एक स्पष्ट विकास मार्ग जरूरी होगा।
आगे क्या होगा
सरकार की प्रस्तावित टैलेंट हंट मुहिम का असली इम्तिहान इसके क्रियान्वयन में होगा। देश के अलग-अलग हिस्सों से प्रतिभाओं की पहचान के बाद उन्हें वैज्ञानिक प्रशिक्षण, पर्याप्त संसाधन और लगातार प्रतिस्पर्धी अवसर मिलना जरूरी है। 2036 का लक्ष्य लंबी अवधि का है। इसलिए इसके लिए तैयार होने वाले खिलाड़ियों की योजना भी वर्षों पहले से बनानी होगी। 5 से 15 वर्ष की उम्र के बच्चों पर ध्यान देने की घोषणा इसी दीर्घकालीन दृष्टिकोण का हिस्सा है।
भारत के लिए बड़ा सवाल
भारत की ओलंपिक रणनीति के सामने अब सवाल केवल पदकों की संख्या बढ़ाने का नहीं है। असल सवाल यह है कि देश कितने खेलों में विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा खड़ी कर पाता है। प्रधानमंत्री का संदेश साफ है कि भारत को उन खेलों में भी अपनी जगह बनानी होगी, जहां आज उसकी मौजूदगी नहीं है। इसके लिए प्रतिभा पहचान, प्रशिक्षण, खेल विज्ञान, इंफ्रास्ट्रक्चर और क्वालिफिकेशन की पूरी व्यवस्था को एक साथ मजबूत करना होगा।
2036 की संभावित ओलंपिक मेजबानी भारत के लिए खेल व्यवस्था का व्यापक विस्तार करने का अवसर बन सकती है। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आज पहचानी जा रही प्रतिभाओं को अगले दशक में कितनी निरंतरता और पेशेवर समर्थन मिलता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।