महानगरों से आगे बढ़ रहा छोटे शहरों का इंटरनेट इस्तेमाल
भारत में इंटरनेट की अगली बड़ी कहानी छोटे शहरों की
भारत में इंटरनेट का विस्तार अब महानगरों तक सीमित नहीं है। 2024 में 886 मिलियन एक्टिव इंटरनेट यूजर्स में 55 प्रतिशत ग्रामीण भारत से थे। रिपोर्ट के आंकड़े छोटे महानगरों और 10 लाख से कम आबादी वाले शहरों की भी बड़ी हिस्सेदारी दिखाते हैं। 2025 के सरकारी आंकड़े इस विस्तार को और मजबूत करते हैं।
By Mohd Haris
भारत में इंटरनेट की कहानी अब केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या हैदराबाद जैसे बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रह गई है। छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुंच ने डिजिटल इस्तेमाल का दायरा तेजी से बदला है। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि इंटरनेट की अगली बड़ी वृद्धि का केंद्र बड़े शहरों से बाहर बन रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में भारत में एक्टिव इंटरनेट यूजर्स की संख्या 886 मिलियन थी। इनमें 488 मिलियन यूजर्स ग्रामीण भारत से थे, यानी कुल इंटरनेट आबादी का करीब 55 प्रतिशत। रिपोर्ट में ग्रामीण इंटरनेट यूजर्स की वृद्धि शहरी इलाकों की तुलना में करीब दोगुनी बताई गई है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर छोटा शहर एक समान गति से डिजिटल हो रहा है। लेकिन उपलब्ध डेटा एक साफ रुझान जरूर दिखाता है। इंटरनेट का विस्तार अब भारत के छोटे शहरों और गैर-महानगरीय इलाकों में भी व्यापक हो चुका है।
आईएएमएआई-कैंटर के 2024 डेटा में इंटरनेट यूजर्स को अलग-अलग टाउन क्लास में बांटा गया है। टॉप 9 महानगरों की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत, छोटे महानगरों की 9 प्रतिशत, 10 लाख से कम आबादी वाले शहरों और कस्बों की 22 प्रतिशत और ग्रामीण भारत की 55 प्रतिशत थी। 886 मिलियन एक्टिव इंटरनेट यूजर्स के आधार पर 10 लाख से कम आबादी वाले शहरों और कस्बों की 22 प्रतिशत हिस्सेदारी करीब 195 मिलियन यूजर्स के बराबर बैठती है। छोटे महानगरों की 9 प्रतिशत हिस्सेदारी करीब 80 मिलियन यूजर्स के बराबर है। ये आंकड़े रिपोर्ट की प्रतिशत हिस्सेदारी से निकाले गए अनुमान हैं, अलग से प्रकाशित यूजर काउंट नहीं। यानी अगर ग्रामीण भारत और छोटे शहरों को एक व्यापक गैर-महानगरीय डिजिटल बाजार के रूप में देखा जाए, तो भारत की इंटरनेट अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब इसी क्षेत्र में मौजूद है।
मोबाइल इस बदलाव का सबसे अहम माध्यम जरूर है, लेकिन कहानी केवल स्मार्टफोन तक सीमित नहीं है। ट्राई के दिसंबर 2025 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में कुल इंटरनेट सब्सक्राइबर 1,028.61 मिलियन हो चुके थे। इनमें 983.29 मिलियन वायरलेस इंटरनेट सब्सक्राइबर थे, जबकि कुल ब्रॉडबैंड सब्सक्राइबर 1,007.35 मिलियन थे।
इसी अवधि में ग्रामीण इंटरनेट सब्सक्राइबर 434.27 मिलियन और शहरी इंटरनेट सब्सक्राइबर 594.33 मिलियन थे। ग्रामीण इंटरनेट सब्सक्राइबर प्रति 100 आबादी 47.63 और शहरी आंकड़ा 116.09 था। यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। ट्राई का इंटरनेट सब्सक्राइबर डेटा और आईएएमएआई-कैंटर का एक्टिव इंटरनेट यूजर डेटा एक ही माप नहीं हैं। इसलिए दोनों आंकड़ों को जोड़कर यूजर्स की संख्या नहीं निकालनी चाहिए। दोनों अलग-अलग पहलुओं से इंटरनेट विस्तार की तस्वीर दिखाते हैं।
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारक कनेक्टिविटी का विस्तार है। सरकार के मुताबिक दिसंबर 2025 तक देश के 6,44,131 गांवों में से 6,34,955 गांव मोबाइल कनेक्टिविटी से जुड़े थे। इनमें 6,31,834 गांवों में 4जी कनेक्टिविटी उपलब्ध थी। सरकार ने इसे कुल गांवों का 98.09 प्रतिशत बताया। इसी अवधि तक 2,14,904 ग्राम पंचायतों को भारतनेट के तहत सर्विस-रेडी बनाया जा चुका था। इस नेटवर्क विस्तार का असर छोटे शहरों के आसपास के इलाकों पर भी पड़ता है। जब आसपास के गांवों में मोबाइल इंटरनेट और ब्रॉडबैंड की पहुंच बढ़ती है, तो छोटे शहर स्थानीय डिजिटल बाजार, शिक्षा, स्वास्थ्य, ई-कॉमर्स और सर्विस सेक्टर के केंद्र के रूप में ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2021 में भारत में कुल इंटरनेट सब्सक्राइबर 825.30 मिलियन थे। मार्च 2025 तक यह संख्या बढ़कर 969.10 मिलियन हो गई। इस अवधि में ग्रामीण इंटरनेट सब्सक्राइबर 407.69 मिलियन तक पहुंच गए थे। दिसंबर 2025 तक ट्राई के आंकड़ों में कुल इंटरनेट सब्सक्राइबर 1,028.61 मिलियन दर्ज हुए। सितंबर 2025 के 1,017.81 मिलियन से दिसंबर तक इसमें 1.06 प्रतिशत तिमाही वृद्धि हुई। यह रफ्तार दिखाती है कि भारत का डिजिटल बाजार अब एक अरब इंटरनेट सब्सक्रिप्शन के आसपास पहुंच चुका है। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों की भूमिका इस विस्तार में लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।
छोटे शहरों और ग्रामीण भारत के डिजिटल विस्तार को समझने के लिए युवाओं के आंकड़े खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं। जनवरी से मार्च 2025 के दौरान किए गए कॉम्प्रिहेंसिव मॉड्यूलर सर्वे टेलीकॉम के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में 15 से 29 वर्ष की उम्र के करीब 92.7 प्रतिशत लोगों ने पिछले तीन महीनों में कम से कम एक बार इंटरनेट का इस्तेमाल किया। शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 95.7 प्रतिशत था। इसी आयु वर्ग में ग्रामीण मोबाइल यूजर्स में करीब 95.5 प्रतिशत के पास स्मार्टफोन था। यह अंतर पहले की तुलना में काफी सीमित दिखाई देता है। इसका मतलब यह नहीं कि डिजिटल डिवाइड खत्म हो गया है, लेकिन युवा आबादी में इंटरनेट इस्तेमाल अब ग्रामीण और छोटे शहरों तक गहराई से पहुंच चुका है।
इंटरनेट का इस्तेमाल अब केवल सोशल मीडिया या चैट तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में ओटीटी वीडियो और ऑडियो, कम्युनिकेशन और सोशल मीडिया इंटरनेट की सबसे व्यापक गतिविधियों में शामिल रहे। रिपोर्ट में ऑनलाइन कॉमर्स, डिजिटल पेमेंट और ऑनलाइन लर्निंग भी इंटरनेट इस्तेमाल के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में दर्ज हैं। छोटे शहरों में इसका असर स्थानीय कारोबारी मॉडल पर भी पड़ता है। दुकानदार डिजिटल पेमेंट स्वीकार कर रहे हैं, ग्राहक ऑनलाइन कीमतें देख रहे हैं, विद्यार्थी वीडियो और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से पढ़ रहे हैं और स्थानीय कारोबारी सोशल मीडिया के जरिये ग्राहकों तक पहुंच बना रहे हैं। यह बदलाव एकतरफा नहीं है। छोटे शहरों के यूजर्स केवल कंटेंट के उपभोक्ता नहीं हैं। वे डिजिटल इकोनॉमी में लेनदेन, कम्युनिकेशन और कंटेंट प्रोडक्शन के स्तर पर भी शामिल हो रहे हैं।
भारत में छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के इंटरनेट इस्तेमाल को समझने के लिए भाषा सबसे अहम फैक्टर में से एक है। रिपोर्ट के अनुसार 2024 में 870 मिलियन इंटरनेट यूजर्स, यानी करीब 98 प्रतिशत इंटरनेट यूजर्स ने इंडिक भाषाओं में कंटेंट एक्सेस किया। शहरी इंटरनेट यूजर्स में भी 57 प्रतिशत ने इंडिक भाषा में कंटेंट को प्राथमिकता देने की बात कही।
यही वजह है कि हिंदी समेत क्षेत्रीय भाषाओं में डिजिटल न्यूज, वीडियो, शिक्षा और मनोरंजन की मांग बढ़ रही है। छोटे शहरों में इंटरनेट की उपयोगिता तब बढ़ती है जब यूजर को अपनी भाषा में जानकारी मिलती है। अंग्रेजी-केंद्रित इंटरनेट मॉडल की तुलना में इंडिक भाषा वाला डिजिटल इकोसिस्टम ज्यादा व्यापक आबादी को जोड़ता है।
यह हिस्सा शाह टाइम्स जैसे डिजिटल न्यूज़रूम के लिए खास महत्व रखता है।
रिपोर्ट के 2024 डेटा के मुताबिक 886 मिलियन इंटरनेट यूजर्स में से 582 मिलियन यानी करीब 66 प्रतिशत यूजर्स इंटरनेट पर न्यूज और जानकारी तक पहुंच रहे थे। इनमें न्यूज वेबसाइट और ऐप के साथ सोशल मीडिया पोस्ट, मैसेज फॉरवर्ड और यूट्यूब जैसे माध्यम भी शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार 180 मिलियन यूजर्स ऐसे थे जो जानबूझकर ऑनलाइन न्यूज और जानकारी हासिल करते थे। इन कॉन्शस ऑनलाइन न्यूज यूजर्स में ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी 53 प्रतिशत थी। इसका संपादकीय मतलब साफ है। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के पाठक अब डिजिटल न्यूज के लिए महत्वपूर्ण ऑडियंस हैं। लेकिन इस बाजार में सफलता के लिए केवल खबर प्रकाशित करना पर्याप्त नहीं होगा। स्थानीय संदर्भ, भरोसेमंद फैक्ट-चेक, सरल भाषा और मोबाइल-फर्स्ट प्रस्तुति ज्यादा महत्वपूर्ण होगी।
इंटरनेट विस्तार का असर वित्तीय व्यवहार पर भी दिखता है। 2025 के सरकारी सर्वे में 15 से 29 वर्ष की उम्र के उन लोगों में, जिन्होंने ऑनलाइन बैंकिंग ट्रांजैक्शन करने की क्षमता बताई, करीब 99.5 प्रतिशत ने यूपीआई के जरिए ऑनलाइन बैंकिंग करने की क्षमता बताई। यह आंकड़ा ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में डिजिटल पेमेंट की व्यापक पहुंच का संकेत देता है। यहां भी सावधानी जरूरी है। यह आंकड़ा यूपीआई के वास्तविक ट्रांजैक्शन की संख्या नहीं बताता। यह उन युवाओं की स्वयं बताई गई क्षमता से संबंधित है। इसलिए इसे डिजिटल पेमेंट की उपयोग क्षमता के संकेतक के तौर पर देखना चाहिए, न कि लेनदेन की मात्रा के रूप में।
नहीं। इंटरनेट पहुंच में बड़ा विस्तार हुआ है, लेकिन डिजिटल डिवाइड अभी मौजूद है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 630 मिलियन लोग अभी भी एक्टिव इंटरनेट यूजर नहीं थे। ग्रामीण भारत में गैर-इंटरनेट आबादी का हिस्सा 51 प्रतिशत बताया गया। इंटरनेट इस्तेमाल न करने वालों के बीच जागरूकता की कमी, कनेक्शन की अनुपलब्धता, डिवाइस की कमी और खर्च जैसे कारण सामने आए। इसलिए यह कहना गलत होगा कि छोटे शहरों और गांवों में इंटरनेट पहुंच अब पूरी तरह समान हो चुकी है। कनेक्टिविटी और उपयोग में भी फर्क है। किसी इलाके में मोबाइल सिग्नल पहुंच जाना और वहां लोगों का नियमित, सुरक्षित और उपयोगी इंटरनेट इस्तेमाल करना दो अलग बातें हैं।
आईएएमएआई-कैंटर रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण पहलू साझा डिवाइस का इस्तेमाल है। रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में इंटरनेट यूजर्स में किसी दूसरे व्यक्ति के मोबाइल के जरिये इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की हिस्सेदारी बढ़ी। ग्रामीण इलाकों में साझा डिवाइस का इस्तेमाल शहरी इलाकों की तुलना में अधिक था और ग्रामीण साझा-डिवाइस यूजर्स में 2024 के दौरान वृद्धि भी दर्ज की गई। इसका मतलब है कि इंटरनेट पहुंच का विस्तार हमेशा व्यक्तिगत स्मार्टफोन स्वामित्व के बराबर नहीं होता। किसी परिवार में एक स्मार्टफोन कई लोगों के डिजिटल कनेक्शन का माध्यम हो सकता है। इसलिए इंटरनेट यूजर की संख्या बढ़ने के बावजूद डिवाइस की व्यक्तिगत उपलब्धता और डिजिटल स्वतंत्रता अलग मुद्दे बने हुए हैं।
अगला चरण केवल नए इंटरनेट यूजर्स जोड़ने का नहीं होगा। सवाल यह है कि ये यूजर्स इंटरनेट का इस्तेमाल किस काम के लिए करते हैं। ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल पेमेंट, ई-कॉमर्स, टेलीमेडिसिन, सरकारी सेवाएं, स्थानीय कारोबार और डिजिटल न्यूज ऐसे क्षेत्र हैं जहां छोटे शहरों की मांग आगे बढ़ सकती है। सरकार ने भी टियर-2 और टियर-3 शहरों में डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ाने के लिए कई योजनाओं का उल्लेख किया है। जुलाई 2025 में सरकार ने बताया था कि जेन-नेक्स्ट सपोर्ट फॉर इनोवेटिव स्टार्टअप्स के तहत करीब 1,600 टेक्नोलॉजी स्टार्टअप्स को बढ़ाने की योजना है। इसके अलावा आईबीपीएस और नॉर्थ ईस्ट बीपीओ प्रमोशन स्कीम के तहत 104 छोटे शहरों और कस्बों में 246 यूनिट स्थापित करने का लक्ष्य बताया गया था। इससे संकेत मिलता है कि छोटे शहर अब केवल इंटरनेट के उपभोक्ता नहीं, बल्कि डिजिटल कारोबार और रोजगार के संभावित केंद्र भी बन रहे हैं।
भारत के डिजिटल विस्तार का अगला सवाल केवल यह नहीं है कि इंटरनेट कहां पहुंचा। सवाल यह है कि लोग इंटरनेट से क्या हासिल कर रहे हैं। कनेक्शन उपलब्ध होने के बाद डिजिटल साक्षरता, साइबर सिक्योरिटी, स्थानीय भाषा की गुणवत्ता, ऑनलाइन फ्रॉड से सुरक्षा और भरोसेमंद जानकारी तक पहुंच महत्वपूर्ण हो जाती है। छोटे शहरों में इंटरनेट इस्तेमाल बढ़ने के साथ साइबर फ्रॉड और गलत सूचना का जोखिम भी गंभीर मुद्दा है। इसलिए डिजिटल विस्तार को केवल यूजर संख्या से मापना अधूरा विश्लेषण होगा। अगर इंटरनेट लोगों को बेहतर शिक्षा, रोजगार, बाजार, सरकारी सेवाओं और विश्वसनीय सूचना तक पहुंच देता है, तभी यह विस्तार वास्तविक सामाजिक और आर्थिक असर में बदलता है।
उपलब्ध आंकड़े इस दिशा में मजबूत संकेत देते हैं। 2024 में 886 मिलियन एक्टिव इंटरनेट यूजर्स में 55 प्रतिशत ग्रामीण भारत से थे। 10 लाख से कम आबादी वाले शहरों और कस्बों की हिस्सेदारी 22 प्रतिशत थी। छोटे महानगरों की हिस्सेदारी 9 प्रतिशत थी। दूसरी तरफ 2025 के सरकारी आंकड़ों में इंटरनेट सब्सक्राइबर की संख्या एक अरब के पार पहुंच गई और ग्रामीण इंटरनेट सब्सक्राइबर 434.27 मिलियन दर्ज हुए। इन आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो भारत के डिजिटल विस्तार का अगला चरण महानगरों से बाहर दिखाई देता है। लेकिन इसे “छोटे शहरों में इंटरनेट सबसे तेज बढ़ रहा है” जैसे पूर्ण दावे में बदलना अभी सावधानी के बिना सही नहीं होगा। उपलब्ध सार्वजनिक आंकड़े अक्सर ग्रामीण और शहरी श्रेणियों में प्रकाशित होते हैं। टियर-2, टियर-3 और छोटे शहरों की साल-दर-साल इंटरनेट वृद्धि का एक समान राष्ट्रीय टाइम सीरीज डेटा सीमित है।
क्या छोटे शहरों में इंटरनेट इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है?
उपलब्ध डेटा का जवाब है, हां, और इसका सबसे मजबूत संकेत ग्रामीण तथा गैर-महानगरीय इंटरनेट विस्तार से मिलता है। 2024 में भारत के एक्टिव इंटरनेट यूजर्स का 55 प्रतिशत ग्रामीण भारत से आया और 10 लाख से कम आबादी वाले शहरों तथा कस्बों की हिस्सेदारी 22 प्रतिशत रही। ग्रामीण इंटरनेट यूजर्स की वृद्धि शहरी यूजर्स से करीब दोगुनी रही। 2025 के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि कनेक्टिविटी का नेटवर्क भी लगातार फैल रहा है। करीब 98 प्रतिशत गांवों में मोबाइल कनेक्टिविटी की पहुंच और 4जी नेटवर्क का व्यापक विस्तार छोटे शहरों और आसपास के इलाकों के डिजिटल बाजार को मजबूत कर रहा है। लेकिन असली बदलाव केवल यूजर संख्या में नहीं है। छोटे शहरों में इंटरनेट अब न्यूज, मनोरंजन, शिक्षा, डिजिटल पेमेंट, ई-कॉमर्स और स्थानीय कारोबार का हिस्सा बन रहा है। इसलिए भारत की अगली डिजिटल कहानी केवल महानगरों की नहीं होगी। उसका बड़ा हिस्सा उन शहरों और कस्बों से आएगा, जहां इंटरनेट अब पहली बार सुविधा से आगे बढ़कर रोजमर्रा की जरूरत बन रहा है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।