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जंतर-मंतर आंदोलन: देश-विदेश से पहुंच रही मदद, क्या बदल रही है विरोध की तस्वीर?
Asif Khan
•
2026-07-24 13:47:07
जंतर-मंतर पर कौन भेज रहा खाना और दवाइयां, सामने आई चौंकाने वाली तस्वीर
भारत से लेकर विदेश तक, छात्रों के समर्थन में क्यों उमड़ रही मदद?
पिज्जा से लेकर सैनिटरी पैड्स तक, जंतर-मंतर आंदोलन को मिल रहा कैसा समर्थन?
NEET पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर जारी CJP आंदोलन को देश और विदेश से ऑनलाइन माध्यमों के जरिए मदद मिल रही है। भोजन, दवाइयों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति आंदोलन के सामाजिक समर्थन का संकेत देती है। इसी बीच सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत की पहल भी जारी है।
📍 नई दिल्ली
📰 24 जुलाई 2026
✍️ Asif Khan
जंतर-मंतर आंदोलन: देश-विदेश से पहुंच रही मदद, क्या बदल रही है विरोध की तस्वीर?
जंतर-मंतर आंदोलन बना राष्ट्रीय बहस का केंद्र
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक मामले को लेकर चल रहा CJP का आंदोलन अब केवल एक धरना नहीं रह गया है। यह देश की शिक्षा व्यवस्था, सरकारी जवाबदेही और नागरिक भागीदारी पर व्यापक बहस का विषय बन चुका है। आंदोलन के बीच देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों से प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन, दवाइयां और अन्य आवश्यक सामान भेजे जाने की घटनाओं ने इस विरोध को नया आयाम दिया है।
पिछले कुछ दिनों में जंतर-मंतर पर फूड डिलीवरी एजेंटों की लगातार आवाजाही चर्चा का विषय बनी रही। विभिन्न मीडिया संस्थानों की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार प्रदर्शनकारियों तक फल, पैक्ड फूड, पानी, दवाइयां, ORS, सैनिटरी पैड्स, मास्क और अन्य जरूरी सामग्री पहुंचाई गई। कई लोगों ने डिजिटल फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म के माध्यम से दूर बैठे अपना समर्थन दर्ज कराया।
आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई
NEET पेपर लीक विवाद के बाद शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग तेज हुई। CJP के नेतृत्व में 20 जून से जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में कथित पेपर लीक की निष्पक्ष जांच, जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग शामिल है।
सरकार का कहना है कि जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं और संवाद के जरिए समाधान निकाला जा सकता है। वहीं आंदोलनकारी कहते हैं कि केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस फैसले और जवाबदेही जरूरी है।
देश और विदेश से कैसे पहुंच रही है मदद
ग्राउंड रिपोर्टों के अनुसार उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, केरल, महाराष्ट्र, दिल्ली सहित कई राज्यों से लोगों ने ऑनलाइन ऑर्डर कर प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन और राहत सामग्री भेजी। कुछ रिपोर्टों में विदेशों में रहने वाले भारतीयों द्वारा भी डिजिटल माध्यम से सहायता भेजने का उल्लेख किया गया है।
हालांकि सभी व्यक्तिगत दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह जरूरी है कि हर वायरल पोस्ट या सोशल मीडिया दावे को तथ्य मानकर स्वीकार न किया जाए। कई घटनाओं की पुष्टि केवल संबंधित पोस्ट या स्थानीय रिपोर्टिंग तक सीमित है।
पिज्जा ऑर्डर की चर्चा क्यों हुई
सोशल मीडिया पर एक व्यक्ति द्वारा लगभग 150 चीज़ बर्स्ट पिज्जा, जिनकी कीमत करीब 68 हजार रुपये बताई गई, प्रदर्शनकारियों के लिए भेजने का दावा व्यापक चर्चा में रहा। संबंधित स्क्रीनशॉट और पोस्ट वायरल हुए तथा कई समाचार संस्थानों ने भी इस घटना का उल्लेख किया।
फिलहाल इसे व्यक्तिगत समर्थन की एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। इस घटना के व्यापक सामाजिक या राजनीतिक प्रभाव को लेकर कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद
केंद्र सरकार ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वह बातचीत के लिए तैयार है। सरकार के अनुसार आंदोलनकारियों को कई बार वार्ता का प्रस्ताव दिया गया। दूसरी ओर CJP का कहना है कि बातचीत किसी तटस्थ स्थान पर होनी चाहिए, न कि किसी राजनीतिक कार्यालय या निजी आवास पर।
यही मतभेद फिलहाल औपचारिक बातचीत में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। इसके बावजूद दोनों पक्षों द्वारा संवाद की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
सामाजिक समर्थन क्या संकेत देता है
किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन में नागरिक समर्थन महत्वपूर्ण माना जाता है। जंतर-मंतर पर भेजी जा रही राहत सामग्री यह संकेत देती है कि समाज का एक वर्ग आंदोलनकारियों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए आगे आया है।
दूसरी ओर कुछ विश्लेषकों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए मिलने वाला समर्थन हमेशा व्यापक जनमत का प्रतिनिधित्व नहीं करता। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली सक्रियता और वास्तविक जनसमर्थन में अंतर हो सकता है।
राजनीतिक असर
विपक्ष इस आंदोलन को शिक्षा व्यवस्था और सरकारी जवाबदेही से जोड़कर देख रहा है। वहीं सरकार का कहना है कि परीक्षा प्रणाली में सुधार और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी राजनीतिक और सार्वजनिक दलीलें सामने रख रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वार्ता सफल नहीं होती है, तो आंदोलन का राजनीतिक असर आने वाले समय में और व्यापक हो सकता है, खासकर युवाओं और छात्रों के बीच।
आगे की राह
आंदोलन के भविष्य का बड़ा सवाल अब संवाद पर टिका है। यदि सरकार और आंदोलनकारी किसी साझा आधार पर सहमत होते हैं, तो समाधान की दिशा में प्रगति संभव है। यदि मतभेद बने रहते हैं, तो आंदोलन लंबा खिंच सकता है और इसका असर शिक्षा, राजनीति तथा सार्वजनिक विमर्श पर जारी रह सकता है।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आंदोलन से जुड़े सभी दावों, वायरल वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। जिम्मेदार पत्रकारिता का तकाजा है कि पुष्ट तथ्यों और अपुष्ट दावों के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाए।
सम्पादकीय दृष्टिकोण
जंतर-मंतर आंदोलन अब केवल एक छात्र विरोध नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में भरोसे, पारदर्शिता और जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुका है। देश और विदेश से मिल रहा नागरिक समर्थन इस आंदोलन की सामाजिक प्रतिध्वनि को दर्शाता है, जबकि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद यह तय करेगा कि यह विवाद समाधान की ओर बढ़ता है या और गहराता है। ऐसे समय में तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग, संयमित सार्वजनिक विमर्श और पारदर्शी संवाद ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत बना सकते हैं।
Asif Khan
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।