झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्र आंदोलन 17वें दिन विधानसभा मार्च तक पहुंच गया। रांची में बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने मार्च किया और पुलिस ने बैरिकेडिंग के साथ वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया। छात्र परीक्षा प्रक्रिया की जांच, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग पर कायम हैं, जबकि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच गतिरोध बना हुआ है।
📍 Location: Ranchi, Jharkhand
📰 Date: August 10, 2026
✍️ Byline: Apurva Choudhary
झारखंड छात्र आंदोलन 17वें दिन विधानसभा तक पहुंचा
झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहा झारखंड छात्र आंदोलन सोमवार को 17वें दिन विधानसभा मार्च तक पहुंच गया। रांची में बड़ी संख्या में नौकरी के अभ्यर्थी विधानसभा की ओर बढ़े, जिसके बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी।
रिपोर्टों के मुताबिक प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेडिंग पार करने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस ने वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया। स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए विधानसभा क्षेत्र और आसपास के इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था की गई।
छात्रों की मुख्य मांग क्या है?
आंदोलनकारी छात्र JPSC और JSSC से जुड़ी भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। उनके प्रमुख मुद्दों में परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, कथित गड़बड़ियों की जांच और भर्ती व्यवस्था में सुधार शामिल हैं।
मामला खास तौर पर 14वीं JPSC Combined Civil Services Examination को लेकर भी चर्चा में है। इस परीक्षा को लेकर लंबे समय से सवाल उठ रहे हैं और विवाद ने राज्य की भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बहस को तेज किया है।
छात्रों का तर्क है कि सरकारी नौकरी की तैयारी में वर्षों का समय और परिवारों का आर्थिक निवेश जुड़ा होता है। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया पर संदेह पैदा होने से अभ्यर्थियों का भरोसा प्रभावित होता है।
देवेंद्र नाथ महतो की भूख हड़ताल
आंदोलन के प्रमुख चेहरों में देवेंद्र नाथ महतो शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने 2 अगस्त से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी और उनकी सेहत बिगड़ने के बावजूद आंदोलन जारी रहा।
सोमवार को वह एंबुलेंस के जरिए विधानसभा मार्च में शामिल हुए। न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, उन्होंने भूख हड़ताल के दौरान लगभग 10.5 किलोग्राम वजन कम होने की बात सामने आई।
उनकी स्थिति ने आंदोलन को और ज्यादा तवज्जो दी है। हालांकि किसी भी भूख हड़ताल में स्वास्थ्य संबंधी दावों की पुष्टि मेडिकल रिकॉर्ड और चिकित्सकीय आकलन से ही पूरी तरह की जा सकती है।
सरकार और छात्रों के बीच क्यों नहीं बनी सहमति?
पिछले दिनों सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत के कई दौर हुए, लेकिन प्रमुख मांगों पर पूर्ण सहमति नहीं बन सकी। सरकार की ओर से कई मांगों पर कार्रवाई या स्वीकार किए जाने का दावा किया गया, जबकि प्रदर्शनकारी इसे पर्याप्त समाधान नहीं मान रहे हैं।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार छात्रों ने सरकार के उस दावे को स्वीकार नहीं किया कि उनकी अधिकांश मांगें मान ली गई हैं। इसी मतभेद के बीच विधानसभा मार्च का फैसला आगे बढ़ा।
यह गतिरोध केवल राजनीतिक बयानबाजी का मामला नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि भर्ती परीक्षाओं से जुड़े आरोपों की जांच किस संस्था से होगी और जांच के बाद कार्रवाई का दायरा क्या होगा।
विधानसभा मार्च के दौरान क्या हुआ?
रांची में प्रदर्शनकारियों ने विधानसभा की ओर मार्च किया। पुलिस ने रास्ते में बैरिकेडिंग की और प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की।
द स्टेट्समैन की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदर्शनकारियों के बैरिकेड तोड़ने के बाद पुलिस ने वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया। वहीं अन्य रिपोर्टों में भी मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ने की जानकारी दी गई है।
ऐसी स्थिति में प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती रहती है। एक तरफ विधानसभा और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और भीड़ प्रबंधन के बीच संतुलन बनाए रखना भी अहम है।
भर्ती परीक्षाओं पर पहले से उठते रहे हैं सवाल
झारखंड में JPSC और JSSC की भर्ती प्रक्रिया को लेकर विवाद नया नहीं है। जुलाई 2026 में भी छात्रों ने रांची में प्रदर्शन कर परीक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं और पारदर्शिता की मांग उठाई थी।
इंडियन एक्सप्रेस की एक विस्तृत रिपोर्ट में 14वीं JPSC परीक्षा से जुड़े विवाद और आयोग के तत्कालीन चेयरपर्सन एल. खियांग्ते के इस्तीफे के बाद पैदा हुए राजनीतिक और प्रशासनिक सवालों का उल्लेख किया गया था।
इसके अलावा JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर राजनीतिक दलों ने भी प्रदर्शन किए और जांच की मांग उठाई। जुलाई में झारखंड के BJP सांसदों ने संसद परिसर में भी इस मुद्दे को उठाया था।
हालांकि राजनीतिक दलों के आरोपों और छात्रों के दावों को स्वतंत्र जांच के निष्कर्षों से अलग देखना जरूरी है।
आंदोलन का राजनीतिक असर भी बढ़ा
छात्रों की भर्ती संबंधी मांग अब राज्य की राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बन चुकी है। विपक्षी नेताओं ने आंदोलन का समर्थन किया है और सरकार पर छात्रों की मांगों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लेने के आरोप लगाए हैं।
सोमवार के विधानसभा मार्च के दौरान BJP नेताओं, जिनमें विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी भी शामिल थे, को हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई।
लेकिन इस पूरे विवाद का मूल मुद्दा राजनीतिक टकराव से अलग है। छात्रों के लिए सबसे अहम सवाल परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता और भविष्य की भर्ती में निष्पक्षता का है।
सरकार के सामने भरोसा बहाल करने की चुनौती
सरकार यदि आंदोलन को समाप्त करना चाहती है तो केवल मांगें स्वीकार करने की घोषणा पर्याप्त नहीं हो सकती। छात्रों के बीच भरोसा बहाल करने के लिए यह स्पष्ट करना होगा कि किन मांगों पर क्या फैसला हुआ है और कथित अनियमितताओं की जांच किस समयसीमा में होगी।
दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों के लिए भी यह जरूरी है कि उनके आरोपों और मांगों को दस्तावेजी साक्ष्यों तथा सत्यापन योग्य तथ्यों के साथ रखा जाए। इससे आंदोलन की क्रेडिबिलिटी मजबूत होगी और राजनीतिक नैरेटिव से अलग वास्तविक परीक्षा सुधार पर चर्चा संभव होगी।
परीक्षा व्यवस्था में सुधार का बड़ा सवाल
झारखंड का मौजूदा विवाद केवल एक परीक्षा या एक भर्ती आयोग तक सीमित नहीं है। यह सवाल उठाता है कि सरकारी भर्ती परीक्षाओं में transparency, question paper security, result processing और grievance redressal को किस तरह मजबूत किया जाए।
प्रतियोगी परीक्षाओं में किसी भी तरह की अनियमितता का असर केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। इससे हजारों अभ्यर्थियों के समय, आर्थिक संसाधन और मानसिक तैयारी पर असर पड़ सकता है।
इसीलिए परीक्षा विवादों के समाधान के लिए स्पष्ट जांच प्रक्रिया और समयबद्ध निर्णय जरूरी हैं। लंबे समय तक चलने वाली जांच और अनिश्चितता छात्रों के असंतोष को और बढ़ा सकती है।
आगे क्या होगा?
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकार और आंदोलनकारियों के बीच अगली बातचीत का है। यदि सरकार परीक्षा संबंधी शिकायतों पर स्पष्ट रोडमैप, जांच और सुधार की प्रक्रिया सामने रखती है तो तनाव कम होने की संभावना बन सकती है।
दूसरी तरफ यदि प्रमुख मांगों पर गतिरोध जारी रहता है तो आंदोलन आगे भी बढ़ सकता है। विधानसभा मार्च ने यह जरूर स्पष्ट कर दिया है कि भर्ती परीक्षाओं का विवाद अब राज्य की प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक बहसों में शामिल हो चुका है।
छात्रों के भरोसे की परीक्षा
झारखंड का छात्र आंदोलन सरकारी भर्ती व्यवस्था में भरोसे से जुड़ा सवाल बन चुका है। आंदोलनकारियों की मांग है कि परीक्षा प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी हो, जबकि सरकार के सामने कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक प्रक्रिया दोनों को संभालने की चुनौती है।
इस विवाद का स्थायी समाधान सड़क पर शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि विश्वसनीय जांच, सार्वजनिक जवाबदेही और ऐसी भर्ती प्रक्रिया से निकलेगा जिस पर अभ्यर्थियों को भरोसा हो। आखिरकार सरकारी नौकरी की परीक्षा सिर्फ एक चयन प्रक्रिया नहीं होती; यह हजारों युवाओं के भविष्य और राज्य की संस्थागत क्रेडिबिलिटी से भी जुड़ी होती है।