संसद ने जन्म मृत्यु विधेयक 2026 पास किया। कानून में देरी से पंजीकरण के नियम सख्त हुए। सरकार इसे घुसपैठ रोकने से जोड़ रही है। विपक्ष ने प्रक्रिया और मंशा पर सवाल उठाए।
📍 नई दिल्ली
📰 04 जुलाई 2026
✍️ By Asif Khan
संसद ने जन्म मृत्यु विधेयक 2026 को मंजूरी दे दी है। राज्य सभा में पारित होने के बाद यह विधेयक अब कानून बनने की दिशा में आगे बढ़ चुका है। सरकार का दावा है कि यह कदम देश में पंजीकरण व्यवस्था को मजबूत करेगा और प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ाएगा।
राज्य सभा में चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि देश सार्वभौमिक जन्म-मृत्यु पंजीकरण प्रणाली की ओर बढ़ रहा है। उनका कहना था कि मौजूदा सिस्टम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है और नए संशोधन इसे और प्रभावी बनाएंगे।
इस संशोधन का सबसे अहम पहलू देरी से पंजीकरण के नियमों में बदलाव है। अब अगर जन्म या मृत्यु का पंजीकरण दो साल से अधिक देर से किया जाता है, तो इसके लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी होगी।
पहले यह अनुमति जिला मजिस्ट्रेट या अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट के स्तर पर दी जा सकती थी। सरकार का तर्क है कि इससे फर्जी पंजीकरण पर रोक लगेगी और डेटा की विश्वसनीयता बढ़ेगी।
विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष ने गृह मंत्री की अनुपस्थिति को मुद्दा बनाया। सदन में शोर-शराबा हुआ और कार्यवाही प्रभावित रही। विपक्ष का कहना था कि इतने अहम कानून पर वरिष्ठ नेतृत्व की मौजूदगी जरूरी थी।
सरकार की ओर से जवाब देते हुए मंत्री ने कहा कि विधेयक का उद्देश्य प्रशासनिक सुधार है, न कि किसी राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाना। हालांकि बहस के दौरान आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला।
सरकार ने इस विधेयक को राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रशासनिक सुधार से जोड़ा। मंत्री ने कहा कि सख्त पंजीकरण व्यवस्था से अवैध घुसपैठ की पहचान आसान होगी।
उन्होंने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि 2014 से पहले जन्म पंजीकरण दर 86.6 प्रतिशत थी, जो अब 99.8 प्रतिशत तक पहुंच गई है। मृत्यु पंजीकरण भी 72.5 प्रतिशत से बढ़कर 99.4 प्रतिशत हो गया है।
सरकार का कहना है कि देशभर में 3.5 लाख से अधिक पंजीकरण केंद्र स्थापित किए गए हैं, जिससे आम नागरिकों की पहुंच आसान हुई है।
विपक्ष ने विधेयक की मंशा पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि कानून का इस्तेमाल राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों से जोड़ा जा सकता है।
कुछ सदस्यों ने यह भी कहा कि गरीब और दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए सख्त नियम परेशानी बढ़ा सकते हैं। उनका तर्क है कि कई मामलों में देरी प्रशासनिक कारणों से होती है, न कि जानबूझकर।
सत्तारूढ़ गठबंधन के कई सदस्यों ने विधेयक का समर्थन किया। उनका कहना है कि इससे देश में एक मजबूत डेटा सिस्टम बनेगा और सरकारी योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन संभव होगा।
कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया कि ग्रामीण और कमजोर वर्गों के लिए विशेष पंजीकरण अभियान चलाए जाएं। इससे कानून का लाभ सभी तक पहुंच सकेगा।
जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम 1969 लंबे समय से लागू है। यह देश में नागरिक डेटा का मूल आधार माना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल रिकॉर्ड और आधार-आधारित सिस्टम के कारण इसकी अहमियत और बढ़ी है।
संशोधन विधेयक 29 जुलाई को लोकसभा में पेश किया गया था और वहां से पारित होने के बाद राज्य सभा में आया। अब दोनों सदनों की मंजूरी के बाद यह अंतिम चरण में है।
यह विधेयक प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सटीक जनसंख्या डेटा नीति निर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और सामाजिक योजनाओं के लिए जरूरी होता है।
सरकार का मानना है कि मजबूत पंजीकरण सिस्टम से सरकारी योजनाओं का लक्ष्य बेहतर तरीके से तय किया जा सकेगा। साथ ही पहचान और दस्तावेजीकरण में पारदर्शिता आएगी।
हालांकि जमीनी स्तर पर कई चुनौतियां मौजूद हैं। ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की कमी, दस्तावेजी प्रक्रिया की जटिलता और प्रशासनिक देरी आम समस्या है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सख्त नियम लागू करने से पहले सिस्टम को और सरल और सुलभ बनाना जरूरी है। वरना आम नागरिकों पर बोझ बढ़ सकता है।
इस विधेयक का राजनीतिक असर भी देखने को मिल सकता है। सरकार इसे प्रशासनिक सुधार के रूप में पेश कर रही है, जबकि विपक्ष इसे संवेदनशील मुद्दों से जोड़कर देख रहा है।
आने वाले समय में इसका असर राज्यों की नीतियों और स्थानीय प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर भी पड़ेगा। खासकर उन क्षेत्रों में जहां पंजीकरण दर अभी भी कम है।
जन्म मृत्यु विधेयक देश के पंजीकरण ढांचे में अहम बदलाव लेकर आया है। इससे डेटा सिस्टम मजबूत होने की उम्मीद है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी सफलता कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी।
सरकार के लिए चुनौती यह होगी कि सख्ती और सुविधा के बीच संतुलन बनाए। वहीं नागरिकों के लिए यह कानून दस्तावेजी जिम्मेदारी को और स्पष्ट करता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।