बिहार कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं ने दिल्ली में पार्टी मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन का ऐलान किया है। नेताओं की मांग राहुल गांधी से मुलाकात और प्रदेश नेतृत्व में बदलाव है।
Location: नई दिल्ली
Date: 8 सितंबर 2026
By Mohd Naved
कांग्रेस के भीतर बिहार को लेकर संगठनात्मक असंतोष अब पार्टी के केंद्रीय मुख्यालय तक पहुंच गया है। बिहार कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट नेता और कार्यकर्ता 8 सितंबर को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन के बाहर प्रदर्शन कर अपनी शिकायतें पार्टी नेतृत्व तक पहुंचाने की तैयारी में हैं। उनका मुख्य मुद्दा 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के बाद संगठन में जवाबदेही तय करने और शीर्ष नेतृत्व से संवाद की मांग है।
प्रदर्शन की सबसे अहम मांग क्या है
प्रदर्शन की तैयारी कर रहे नेताओं की प्रमुख मांग बिहार कांग्रेस के प्रभारी महासचिव कृष्णा अल्लावरू और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश कुमार राम को उनके पदों से हटाने की है। असंतुष्ट नेताओं का आरोप है कि प्रदेश संगठन के मौजूदा नेतृत्व में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर हुआ और चुनावी हार के बाद भी संगठनात्मक स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। ये आरोप प्रदर्शन में शामिल होने की तैयारी कर रहे नेताओं के हैं, कांग्रेस नेतृत्व की ओर से इन आरोपों पर कोई समानांतर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
राहुल गांधी से क्या चाहते हैं नेता
बिहार कांग्रेस के असंतुष्ट खेमे की दूसरी प्रमुख मांग राहुल गांधी से मुलाकात की है। एआईसीसी सदस्य आनंद माधव के अनुसार, बिहार के नेता नवंबर 2025 से राहुल गांधी से मुलाकात का समय मांग रहे हैं, लेकिन उनकी मुलाकात नहीं हो सकी। इसी शिकायत के बाद नेताओं ने पार्टी मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन का फैसला किया।
आनंद माधव के मुताबिक, 3 नवंबर 2025 को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ बिहार कांग्रेस से जुड़े मुद्दों पर बैठक हुई थी। असंतुष्ट नेताओं का दावा है कि उस बैठक में उनकी शिकायतों पर गौर करने का भरोसा दिया गया था, लेकिन उन्हें लगता है कि उसके बाद ठोस संगठनात्मक बदलाव नहीं हुआ।
बिहार चुनाव के नतीजे बने असंतोष की पृष्ठभूमि
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस का प्रदर्शन पार्टी के लिए बड़ा झटका रहा। कांग्रेस छह विधानसभा सीटों पर सिमट गई। 2020 के चुनाव में पार्टी ने 19 सीटें जीती थीं। यानी पांच साल के अंतराल में उसका विधानसभा आंकड़ा 13 सीट कम हुआ।
2025 के चुनाव में कांग्रेस ने अररिया, किशनगंज, मनिहारी, वाल्मीकिनगर, चनपटिया और फारबिसगंज सीटों पर जीत दर्ज की। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार राम भी चुनाव हार गए। इससे संगठन के भीतर नेतृत्व और चुनावी रणनीति को लेकर सवाल उठे।
आलोचना का केंद्र प्रदेश संगठन
असंतुष्ट नेताओं का तर्क है कि चुनावी नतीजों की समीक्षा केवल उम्मीदवारों या स्थानीय स्तर पर नहीं होनी चाहिए, बल्कि प्रदेश संगठन के शीर्ष स्तर पर भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसी वजह से कृष्णा अल्लावरू और राजेश कुमार राम को हटाने की मांग प्रदर्शन का प्रमुख हिस्सा बनी है।
हालांकि, चुनावी हार के लिए किसी एक नेता को जिम्मेदार ठहराना अपने आप में स्थापित तथ्य नहीं है। बिहार जैसे बड़े राज्य में गठबंधन की रणनीति, उम्मीदवार चयन, स्थानीय संगठन, सामाजिक समीकरण और चुनावी नैरेटिव जैसे कई कारक नतीजों को प्रभावित करते हैं। इसलिए प्रदर्शनकारी नेताओं के आरोपों को उनके राजनीतिक और संगठनात्मक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए।
कौन-कौन नेता प्रदर्शन में शामिल हो सकते हैं
रिपोर्टों के मुताबिक, बिहार कांग्रेस के पूर्व उपाध्यक्ष जमाल अहमद और राजकुमार राजन, एआईसीसी सदस्य नागेंद्र पासवान, पूर्व विधायक छत्रपति यादव, बी. अख्तर और पूर्व विधायक अनिल कुमार सिंह सहित कई नेता प्रदर्शन में शामिल होने की तैयारी में हैं।
बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता किशोर कुमार झा ने भी प्रदर्शनकारी नेताओं की शिकायतों को सुने जाने की जरूरत बताई है। उनके मुताबिक, पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं की बात नेतृत्व को सुननी चाहिए और बातचीत के जरिए समाधान तलाशना बेहतर रास्ता होगा।
पार्टी मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन क्यों अहम है
किसी राजनीतिक दल के नेता और कार्यकर्ता जब अपनी ही पार्टी के केंद्रीय मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन करते हैं, तो यह संगठन के भीतर संवाद और असंतोष की स्थिति का सार्वजनिक संकेत माना जाता है। इस मामले में भी विरोध का केंद्र विपक्षी दल या सरकार नहीं, बल्कि कांग्रेस का अपना संगठनात्मक ढांचा है।
प्रदर्शनकारियों ने इसे शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का प्रयास बताया है। उनका मकसद पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व तक बिहार संगठन से जुड़ी शिकायतें पहुंचाना और राहुल गांधी से सीधे संवाद स्थापित करना है।
कांग्रेस के लिए चुनौती क्या है
बिहार में कांग्रेस के सामने चुनौती केवल छह विधानसभा सीटों तक सीमित नहीं है। पार्टी को संगठन की जमीनी मौजूदगी, कार्यकर्ताओं के मनोबल और नेतृत्व के प्रति भरोसे से जुड़े सवालों का सामना करना पड़ रहा है। चुनावी प्रदर्शन के बाद इन सवालों का समाधान पार्टी की आगामी रणनीति के लिए अहम रहेगा।
दूसरी तरफ, कांग्रेस नेतृत्व के सामने यह संतुलन भी है कि आंतरिक शिकायतों को किस तरह सुना जाए और संगठनात्मक फैसलों को सार्वजनिक दबाव के बजाय संस्थागत प्रक्रिया के तहत कैसे आगे बढ़ाया जाए।
राहुल गांधी से मुलाकात क्यों महत्वपूर्ण
असंतुष्ट नेताओं के लिए राहुल गांधी से मुलाकात प्रतीकात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है। नेताओं का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी शिकायतें सीधे शीर्ष नेतृत्व के सामने रखना चाहते हैं। यदि मुलाकात होती है, तो बिहार संगठन से जुड़े विवाद पर केंद्रीय नेतृत्व को जमीनी कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं का पक्ष सीधे सुनने का अवसर मिलेगा।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि कांग्रेस नेतृत्व प्रदर्शन के बाद इन नेताओं से औपचारिक वार्ता करेगा या संगठनात्मक बदलाव पर कोई फैसला लेगा। इसलिए तत्काल किसी पदाधिकारी को हटाए जाने या बदलाव की घोषणा को लेकर कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
अब आगे क्या
8 सितंबर का प्रदर्शन बिहार कांग्रेस के भीतर जारी असंतोष का अगला सार्वजनिक चरण है। इसके बाद सबसे अहम सवाल यही होगा कि कांग्रेस आलाकमान प्रदर्शनकारी नेताओं की शिकायतों पर क्या रुख अपनाता है।
यदि नेतृत्व बातचीत का रास्ता अपनाता है, तो विवाद को संगठनात्मक स्तर पर सुलझाने की कोशिश हो सकती है। यदि शिकायतें लंबित रहती हैं, तो बिहार कांग्रेस में आंतरिक खींचतान आगे भी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी रह सकती है।
बिहार में कांग्रेस के लिए मौजूदा स्थिति आत्ममंथन की जरूरत को सामने रखती है। 2025 के चुनाव में छह सीटों तक सीमित होने के बाद संगठन को अपने नेतृत्व, रणनीति और जमीनी नेटवर्क पर नए सिरे से काम करना होगा। दिल्ली में प्रस्तावित धरना इसी व्यापक संगठनात्मक बहस का सार्वजनिक चेहरा बन गया है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।