कंगना का नसीरुद्दीन शाह पर वार, ‘लोमड़ी’ कहकर साधा निशाना
झारखंड छात्र आंदोलन में पियूष मिश्रा की एंट्री, कंगना ने शाह को घेरा
‘कुत्ते’ वाली टिप्पणी पर घिरे नसीरुद्दीन शाह, कंगना का पलटवार
कंगना रनौत ने नसीरुद्दीन शाह की पुरानी ‘कुत्ते और हड्डी’ टिप्पणी को लेकर निशाना साधा। पियूष मिश्रा ने झारखंड छात्र आंदोलन के दौरान शाह से पूछा कि अब कौन चुप है। विवाद के बीच झारखंड में JPSC और JSSC परीक्षाओं को लेकर छात्रों का आंदोलन जारी है और स्वतंत्र जांच की मांग प्रमुख मुद्दा बनी हुई है।
रांची/नई दिल्ली | 13 अगस्त 2026 | Mohd Naved
कंगना रनौत ने नसीरुद्दीन शाह पर तीखा हमला करते हुए उन्हें ‘लोमड़ी’ कहा है। यह बयान उस समय सामने आया जब अभिनेता पियूष मिश्रा ने झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन के दौरान शाह की पुरानी टिप्पणी पर सवाल उठाया। विवाद का केंद्र शाह की वह टिप्पणी है जिसमें उन्होंने छात्र प्रदर्शनों पर बॉलीवुड की खामोशी को ‘मुंह में हड्डी दबाए कुत्ते’ से जोड़ा था।
कंगना ने इंस्टाग्राम पर पियूष मिश्रा से जुड़ी रिपोर्ट साझा करते हुए शाह पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि उन्हें उस ‘कुत्ते’ कहे जाने पर एतराज़ नहीं है, जिसे वह वफादारी से जोड़ती हैं। इसके बाद उन्होंने शाह को ‘लोमड़ी’ कहकर अपने हमले को और तीखा कर दिया।
यह पूरा विवाद केवल दो अभिनेताओं के बीच बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे दिल्ली में छात्र आंदोलन, बॉलीवुड की राजनीतिक खामोशी, झारखंड में भर्ती परीक्षाओं को लेकर जारी असंतोष और सिनेमा से जुड़े सार्वजनिक चेहरों की सामाजिक जिम्मेदारी का सवाल भी जुड़ गया है।
नसीरुद्दीन शाह ने जुलाई में दिल्ली के छात्र आंदोलन के दौरान बॉलीवुड के कई बड़े सितारों की चुप्पी पर सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था कि कुछ लोग तब बोलेंगे जब उनकी अंतरात्मा उन्हें ऐसा करने के लिए कहेगी। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘मुंह में हड्डी’ वाली मिसाल दी थी।
शाह की टिप्पणी का संदर्भ दिल्ली में चल रहे CJP से जुड़े छात्र प्रदर्शन से था। उस समय उन्होंने छात्रों के समर्थन में सार्वजनिक संदेश भी दिया था और सरकार से कहा था कि युवाओं की आवाज़ को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
इस बयान के बाद सवाल उठा कि बॉलीवुड के बड़े नाम सामाजिक और सियासी मुद्दों पर कब बोलते हैं और कब खामोश रहते हैं। शाह का तर्क था कि कुछ लोगों के लिए चुप रहना सुविधाजनक है। यही टिप्पणी बाद में झारखंड के आंदोलन के संदर्भ में उनके सामने वापस आ गई।
पियूष मिश्रा हाल ही में रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम पहुंचे, जहां JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी दौरान उन्होंने शाह की पुरानी टिप्पणी का हवाला देते हुए पूछा कि अब वे ‘कुत्ते’ कौन हैं, जो चुप हैं।
मिश्रा का सवाल मूल रूप से यह था कि यदि बॉलीवुड की खामोशी पर सवाल उठाया गया था, तो झारखंड के छात्रों के मुद्दे पर भी वही कसौटी लागू होनी चाहिए। उनका बयान सीधे शाह की पिछली टिप्पणी से जुड़ा था।
यहां एक अहम तथ्य यह है कि मिश्रा ने झारखंड पहुंचकर छात्रों के मुद्दे पर सार्वजनिक समर्थन जताया। इसलिए उनकी टिप्पणी महज फिल्म इंडस्ट्री के अंदर की व्यक्तिगत तकरार नहीं रही, बल्कि एक जारी छात्र आंदोलन के राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ से जुड़ गई।
पियूष मिश्रा के बयान को साझा करते हुए कंगना रनौत ने नसीरुद्दीन शाह पर और तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति किसी न किसी का ‘कुत्ता’ है, लेकिन वह जिस देश की रोटी खाती हैं, उसकी रखवाली करने पर गर्व करती हैं। इसके बाद उन्होंने शाह पर पड़ोसी देश के लिए लड़ने का आरोप लगाया।
कंगना ने अपने बयान में ‘कुत्ते’ को वफादारी और मासूमियत से जोड़ा। इसके बाद उन्होंने कहा कि वह नसीरुद्दीन शाह जैसी ‘लोमड़ी’ बनने के बजाय कुत्ता कहलाना पसंद करेंगी।
यह आरोप कंगना का राजनीतिक और व्यक्तिगत रुख है। उपलब्ध रिपोर्टों में शाह की ओर से इस ताज़ा आरोप का कोई जवाब सामने नहीं आया है। इसलिए इसे स्थापित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि कंगना के सार्वजनिक बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
कंगना और शाह के बीच बयानबाज़ी के पीछे झारखंड का छात्र आंदोलन एक गंभीर प्रशासनिक मुद्दा है। राज्य में छात्र और सरकारी नौकरी के अभ्यर्थी JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।
आंदोलन 25 जुलाई से तेज हुआ और रांची में हजारों छात्र सड़कों पर उतरे। छात्रों की प्रमुख मांगों में 14वीं JPSC परीक्षा को रद्द करना, भर्ती प्रक्रिया में सुधार और कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच शामिल है।
29 जुलाई को छात्रों ने जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से अल्बर्ट एक्का चौक तक मार्च निकाला था। इसके बाद आंदोलन और व्यापक हुआ। 10 अगस्त को विधानसभा की ओर मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी। पुलिस ने आंसू गैस, पानी की बौछार और लाठी का इस्तेमाल किया। पुलिस का कहना था कि कुछ प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए थे।
JPSC राज्य में उच्च प्रशासनिक पदों की भर्ती से जुड़ा प्रमुख आयोग है, जबकि JSSC राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में भर्ती प्रक्रिया संचालित करता है। इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर लंबे समय से पारदर्शिता, देरी, परिणाम और परीक्षा संचालन से जुड़े सवाल उठते रहे हैं।
मौजूदा आंदोलन में छात्रों का आरोप भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और कथित पेपर लीक से जुड़ा है। आरोपों की अंतिम पुष्टि और जिम्मेदारी तय करने के लिए स्वतंत्र जांच जरूरी है। इसलिए किसी भी राजनीतिक पक्ष के आरोप को स्वतः स्थापित तथ्य मानना संपादकीय रूप से उचित नहीं होगा।
छात्र संगठन और विपक्षी दल CBI जांच की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ राज्य सरकार ने बातचीत का रास्ता अपनाने और छात्रों की शिकायतों पर विचार करने की बात कही है। सरकार का पक्ष है कि कई मांगों पर पहले ही कार्रवाई की जा चुकी है और बातचीत जारी रखी जाएगी।
झारखंड के आंदोलन ने अब सियासी रंग भी पकड़ लिया है। पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता रघुवर दास ने 12 अगस्त को प्रदर्शनकारी छात्रों से मुलाकात की और राज्य सरकार से एक सप्ताह के भीतर CBI जांच की सिफारिश करने की मांग की। उन्होंने ऐसा न होने पर खुद भूख हड़ताल पर बैठने की चेतावनी दी।
बीजेपी लंबे समय से JPSC और JSSC में कथित अनियमितताओं की CBI जांच की मांग कर रही है। कांग्रेस और राज्य सरकार ने आरोपों का अलग दृष्टिकोण रखा है और सरकार ने संवाद के जरिए समाधान तलाशने की बात कही है।
यही वह बिंदु है जहां आंदोलन का मूल मुद्दा, यानी भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता, राजनीतिक टकराव के बीच दबने का जोखिम पैदा करता है।
यहां तथ्य और राजनीतिक टिप्पणी को अलग करना जरूरी है। शाह ने दिल्ली के छात्र आंदोलन पर सार्वजनिक बयान दिया था। उपलब्ध रिपोर्टों में उन्होंने छात्रों के समर्थन में संदेश भी जारी किया था।
लेकिन झारखंड के आंदोलन पर उनकी ओर से कोई ताज़ा सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जिसके आधार पर कंगना और मिश्रा ने सवाल उठाया। इससे यह सवाल जरूर उठता है कि सार्वजनिक हस्तियां अलग-अलग आंदोलनों पर अलग रुख क्यों अपनाती हैं।
फिर भी किसी व्यक्ति की चुप्पी को अपने आप किसी राजनीतिक पक्ष के समर्थन या विरोध का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके पीछे व्यक्तिगत प्राथमिकता, उपलब्ध जानकारी, राजनीतिक दृष्टिकोण या बोलने का निर्णय अलग-अलग हो सकता है। इस मामले में शाह की मंशा पर निष्कर्ष निकालने के लिए उनके किसी ताज़ा प्रत्यक्ष बयान की जरूरत होगी।
कंगना, पियूष मिश्रा और नसीरुद्दीन शाह की बयानबाज़ी एक पुराने सवाल को फिर सामने लाती है। क्या फिल्म कलाकारों से हर बड़े सामाजिक या राजनीतिक आंदोलन पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया की उम्मीद की जानी चाहिए।
एक पक्ष मानता है कि प्रभावशाली सार्वजनिक चेहरों की आवाज़ सामाजिक बहस को दिशा दे सकती है। दूसरा पक्ष मानता है कि किसी कलाकार की चुप्पी को भी उसका व्यक्तिगत अधिकार समझा जाना चाहिए।
इस विवाद में एक और पहलू महत्वपूर्ण है। जब कोई अभिनेता किसी आंदोलन पर बोलता है, तो उसके बयान का असर उसके व्यक्तिगत राजनीतिक रुख से आगे जाता है। इसलिए आरोपों, तथ्यों और भावनात्मक टिप्पणियों के बीच फर्क बनाए रखना जरूरी है।
झारखंड में चल रहे आंदोलन का स्थायी समाधान सोशल मीडिया की बयानबाज़ी से नहीं निकलेगा। इसका केंद्र JPSC और JSSC की भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता है।
यदि छात्रों के आरोप सही पाए जाते हैं, तो जिम्मेदारी तय करने के साथ परीक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधार जरूरी होंगे। यदि कुछ आरोप जांच में गलत साबित होते हैं, तो सरकार और संबंधित संस्थाओं को पारदर्शी तरीके से उसका रिकॉर्ड भी सार्वजनिक करना होगा।
सरकार और छात्रों के बीच बातचीत पहले शुरू हो चुकी है, लेकिन गतिरोध पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा कि क्या सरकार स्वतंत्र जांच की मांग पर कोई ठोस फैसला करती है। इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि JPSC और JSSC से जुड़े आरोपों की जांच किस संस्था से होती है और उसके निष्कर्ष कितने पारदर्शी तरीके से सामने आते हैं।
राजनीतिक दल आंदोलन को अपने एजेंडे से जोड़ेंगे, जबकि छात्र संगठन अपनी मांगों पर दबाव बनाए रख सकते हैं। 10 अगस्त की झड़प के बाद कानून-व्यवस्था का पहलू भी महत्वपूर्ण हो गया है। सरकार के सामने एक साथ दो जिम्मेदारियां हैं, प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार सुनिश्चित करना, साथ ही सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना।
कंगना और नसीरुद्दीन शाह के बीच बयानबाज़ी आगे बढ़ती है या नहीं, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है। लेकिन इस विवाद से ज्यादा महत्वपूर्ण वह मूल सवाल है जिसने इसे जन्म दिया है, यानी छात्रों की यह मांग कि सरकारी नौकरी की भर्ती प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और भरोसेमंद हो।
कंगना ने शाह को ‘लोमड़ी’ कहा और उनकी पुरानी ‘कुत्ते और हड्डी’ वाली टिप्पणी का जवाब दिया। उन्होंने खुद को ‘कुत्ता’ कहे जाने को वफादारी से जोड़ा।
मिश्रा ने झारखंड में प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच शाह की पुरानी टिप्पणी का हवाला देते हुए पूछा कि अब वे ‘कुत्ते’ कौन हैं जो इस आंदोलन पर चुप हैं।
छात्र JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी मांगों में 14वीं JPSC परीक्षा को रद्द करना और स्वतंत्र जांच शामिल है।
राज्य सरकार ने बातचीत और पारदर्शिता पर जोर दिया है। सरकार का कहना है कि छात्रों की कई मांगों पर कार्रवाई की गई है और संवाद का रास्ता खुला है।
उपलब्ध रिपोर्टों में इस ताज़ा विवाद के संदर्भ में शाह की ओर से कोई सार्वजनिक जवाब सामने नहीं आया है। इसलिए उनकी चुप्पी की वजह के बारे में अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
कंगना रनौत और नसीरुद्दीन शाह के बीच ताज़ा विवाद ने फिल्म इंडस्ट्री की राजनीतिक भूमिका पर बहस को फिर तेज कर दिया है। लेकिन इस पूरे प्रकरण का बुनियादी मुद्दा झारखंड के छात्रों का भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और कथित अनियमितताओं की जांच को लेकर आंदोलन है।
कंगना की टिप्पणी और पियूष मिश्रा के सवाल राजनीतिक बयान हैं। इनके जवाब में शाह की स्थिति सामने आना बाकी है। दूसरी ओर, JPSC और JSSC से जुड़े आरोपों का निष्पक्ष परीक्षण ही यह तय करेगा कि छात्रों की शिकायतों में कितनी सच्चाई है।
फिलहाल स्थापित तथ्य यही है कि आंदोलन जारी है, सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत के बावजूद गतिरोध पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और स्वतंत्र जांच की मांग विवाद के केंद्र में बनी हुई है। ऐसे में कंगना रनौत की बयानबाज़ी से ज्यादा अहम यह देखना होगा कि झारखंड की भर्ती व्यवस्था पर उठे सवालों का संस्थागत और पारदर्शी जवाब कब मिलता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।