खरगे ने वंदे मातरम् विवाद पर BJP को घेरा
“गांधी ने जो गाया, हमने वही गाया”, खरगे
वंदे मातरम् विवाद में अब कानून और इतिहास आमने-सामने
वंदे मातरम् विवाद में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सोनिया और राहुल गांधी के खिलाफ शिकायत पर सवाल उठाया। उन्होंने गांधी, नेहरू और वाजपेयी के दौर का हवाला देकर राजनीतिक दोहरे मापदंड का आरोप लगाया। मामला अब नए कानून, पुराने कांग्रेस प्रस्ताव और 15 अगस्त के कार्यक्रम की घटनाओं से जुड़ गया है।
लोकेशन: पणजी, गोवा
तारीख: 18 अगस्त 2026
बाय: Mohd Naved
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने वंदे मातरम् विवाद में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ पुलिस शिकायत को लेकर मंगलवार को तीखा पलटवार किया। पणजी में पत्रकारों से बातचीत में खरगे ने कहा कि कांग्रेस ने वंदे मातरम् का वही पुराना संस्करण गाया है, जिसे महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के दौर में सार्वजनिक कार्यक्रमों में इस्तेमाल किया जाता रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर यही अपराध है, तो गांधी और नेहरू के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।
यह बयान ऐसे समय आया है जब 15 अगस्त को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय, इंदिरा भवन में वंदे मातरम् के गायन को लेकर सियासी टकराव तेज हो गया है। कार्यक्रम के दौरान गीत का पूरा संस्करण गाया गया, जबकि कांग्रेस की ओर से पहले दो अंतरों तक सीमित रहने की बात कही गई थी। इसी घटनाक्रम के बाद सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत दी गई। पुलिस ने शिकायत मिलने की पुष्टि करते हुए मामले की जांच शुरू की है।
15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान मल्लिकार्जुन खरगे ने तिरंगा फहराया। इसके बाद वंदे मातरम् का गायन शुरू हुआ। रिपोर्टों के मुताबिक गायन पहले दो अंतरों से आगे बढ़ गया और पूरा संस्करण गाया गया।
विवाद उस समय शुरू हुआ जब सोनिया गांधी के हावभाव को लेकर भाजपा नेताओं ने दावा किया कि वह गायन रोकने का संकेत दे रही थीं। कांग्रेस ने इस आरोप को खारिज किया। पार्टी नेताओं का कहना है कि सोनिया गांधी का इशारा कार्यक्रम की व्यवस्था और लंबे समय से खड़े खरगे के लिए कुर्सी की व्यवस्था को लेकर था।
इसके बाद सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत दी गई। शिकायत में कथित तौर पर गायन में बाधा डालने के आरोप की जांच और एफआईआर की मांग की गई है। शिकायतकर्ताओं ने नए कानून के तहत कार्रवाई की संभावना का भी हवाला दिया है।
वंदे मातरम् को लेकर मौजूदा विवाद का एक अहम पहलू इसका ऐतिहासिक गायन-प्रारूप है। 1937 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने राष्ट्रीय सभाओं में वंदे मातरम् के पहले दो अंतरे गाने की सिफारिश की थी। इसके पीछे वजह यह थी कि बाद के अंतरों में धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं के संदर्भ मौजूद थे, जिन्हें कुछ समुदायों की धार्मिक संवेदनाओं के संदर्भ में विवादित माना गया।
मौजूदा विवाद में कांग्रेस इसी ऐतिहासिक फैसले को अपने पक्ष का आधार बना रही है। खरगे का तर्क है कि कांग्रेस ने कोई नया संस्करण नहीं बनाया, बल्कि वही परंपरा जारी रखी जिसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौर के प्रमुख नेताओं ने स्वीकार किया था।
हालांकि यहां एक अहम फर्क समझना जरूरी है। खरगे का राजनीतिक तर्क यह है कि कांग्रेस ने पुराने स्वीकृत प्रारूप का इस्तेमाल किया। दूसरी ओर, मौजूदा कानूनी स्थिति 2026 में बदल चुकी है।
संसद ने जुलाई 2026 में प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर अमेंडमेंट बिल पारित किया। इसके बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी भी मिल गई और कानून में वंदे मातरम् को लेकर दंडात्मक प्रावधान जोड़े गए। संशोधन ने 1971 के कानून की धारा 3 के दायरे में राष्ट्रीय गीत को भी शामिल किया।
नए प्रावधान के तहत जानबूझकर राष्ट्रीय गान या राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकना या ऐसे गायन में जुटी सभा में व्यवधान पैदा करना अपराध बनता है। इसके लिए तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
यही बदलाव मौजूदा विवाद को पुराने राजनीतिक विवादों से अलग करता है।
पहले 1971 के कानून की धारा 3 में राष्ट्रीय गान के गायन को जानबूझकर रोकना या उसमें व्यवधान डालना दंडनीय था। वंदे मातरम् उसी प्रावधान में शामिल नहीं था। 2026 के संशोधन ने राष्ट्रीय गीत को भी इस दायरे में ला दिया।
इसलिए अब असली कानूनी सवाल यह है कि क्या 15 अगस्त की घटना में किसी व्यक्ति ने जानबूझकर वंदे मातरम् के गायन को रोका या सभा में व्यवधान पैदा किया।
यहीं राजनीतिक बहस और कानूनी प्रावधान के बीच फर्क सामने आता है।
2026 के संशोधन में जानबूझकर गायन रोकने या व्यवधान पैदा करने को दंडनीय बनाया गया है। इससे यह अपने आप साबित नहीं होता कि हर सार्वजनिक कार्यक्रम में किसी व्यक्ति को पूरे छह अंतरे गाना ही होगा। मौजूदा शिकायत में भी दिल्ली पुलिस से पहले घटनाक्रम, इरादा और लागू कानूनी प्रावधानों की जांच करने की मांग की गई है।
यानी शिकायत दर्ज होना और अपराध साबित होना दो अलग चरण हैं।
वंदे मातरम् के पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय सभाओं में इस्तेमाल करने का फैसला कांग्रेस के 1937 के प्रस्ताव से जुड़ा है। उस दौर में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू सहित कई प्रमुख नेताओं ने पहले दो अंतरों को स्वीकार किया था। राज्यसभा के 2025 के आधिकारिक अभिलेख में भी इस ऐतिहासिक प्रस्ताव और गांधी, नेहरू समेत अन्य नेताओं की सहमति का उल्लेख मिलता है।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि जन गण मन राष्ट्रीय गान होगा और वंदे मातरम् को भी समान सम्मान और दर्जा दिया जाएगा। संविधान सभा के आधिकारिक अभिलेख में यह बयान दर्ज है।
इसलिए खरगे का गांधी और नेहरू का संदर्भ पूरी तरह राजनीतिक बयानबाजी भर नहीं है। इसके पीछे वंदे मातरम् के ऐतिहासिक इस्तेमाल और कांग्रेस के 1937 के फैसले का संदर्भ मौजूद है। हालांकि वाजपेयी के दौर के गायन को लेकर खरगे का दावा मुख्य रूप से उनका राजनीतिक बयान है, जिसकी प्रत्येक घटना का स्वतंत्र प्राथमिक दस्तावेज इस रिपोर्ट के उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिला।
कांग्रेस का कहना है कि सोनिया गांधी ने वंदे मातरम् रोकने की कोशिश नहीं की। पार्टी नेता उदित राज ने आरोपों को गलत बताया और कहा कि उनका इशारा कार्यक्रम के प्रबंधन से जुड़ा था।
भाजपा ने कांग्रेस नेतृत्व पर राष्ट्रगीत के कथित अपमान का आरोप लगाया है। भाजपा नेताओं ने सोनिया गांधी से माफी की मांग की और इस घटना को राष्ट्रवादी मुद्दे के रूप में पेश किया।
खरगे ने जवाब में कहा कि कांग्रेस लंबे समय से उसी संस्करण को गाती रही है। उन्होंने यह भी सवाल किया कि अगर यह अपराध है तो पुराने दौर के नेताओं पर भी समान कार्रवाई होनी चाहिए।
फिलहाल तीन बातें अलग-अलग स्तर पर स्थापित हैं।
पहली, 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् का गायन हुआ और गीत पहले दो अंतरों से आगे बढ़ा। दूसरी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ शिकायत दिल्ली पुलिस को दी गई और पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। तीसरी, 2026 में कानून में संशोधन के बाद वंदे मातरम् के जानबूझकर गायन को रोकने या सभा में व्यवधान पैदा करने पर आपराधिक प्रावधान लागू हो चुके हैं।
लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि सोनिया गांधी या राहुल गांधी ने जानबूझकर कानून में परिभाषित अपराध किया। शिकायत में लगाए गए आरोप और पुलिस जांच के निष्कर्ष अलग चीजें हैं।
यह विवाद केवल एक गीत के गायन तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में राष्ट्रवाद की परिभाषा, कांग्रेस की ऐतिहासिक विरासत और केंद्र सरकार की नई कानूनी नीति तीनों मौजूद हैं।
भाजपा इस मामले को कांग्रेस की राष्ट्रवादी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर रही है। कांग्रेस इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण और अपने ऐतिहासिक रुख के बचाव के तौर पर देख रही है।
2026 का नया कानून इस बहस को और गंभीर बनाता है। अब राजनीतिक बयान और सार्वजनिक आचरण के बीच कानूनी सीमा पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
इस विवाद का सीधा आर्थिक असर फिलहाल दिखाई नहीं देता। इसका मुख्य असर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श पर है।
वंदे मातरम् के बाद के अंतरों में धार्मिक प्रतीकों के उल्लेख का इतिहास पुराना है। 1937 में भी इसी वजह से पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय सभाओं के लिए चुना गया था।
इसलिए मौजूदा बहस को केवल देशभक्ति बनाम देशद्रोह के द्वंद्व में देखना ऐतिहासिक संदर्भ को सीमित कर देता है। इसमें संवैधानिक परंपरा, धार्मिक संवेदनशीलता, राजनीतिक प्रतीकवाद और अब आपराधिक कानून, सभी शामिल हैं।
सबसे अहम सवाल यह है कि 15 अगस्त की घटना में किसी व्यक्ति की मंशा क्या थी।
क्या कोई व्यक्ति गायन रोकना चाहता था या कार्यक्रम प्रबंधन को लेकर संकेत दे रहा था?
क्या उपलब्ध वीडियो से किसी जानबूझकर व्यवधान की पुष्टि होती है?
शिकायत में जिन कानूनी प्रावधानों का हवाला दिया गया है, क्या वे घटनाक्रम पर प्रथमदृष्टया लागू होते हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण, क्या नया कानून लागू होने के बाद भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के पूरे संस्करण और ऐतिहासिक रूप से स्वीकृत पहले दो अंतरों के बीच प्रशासनिक प्रोटोकॉल स्पष्ट है?
इन सवालों का जवाब पुलिस जांच और संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों से मिलेगा।
दिल्ली पुलिस की जांच इस विवाद का अगला अहम चरण है। पुलिस को शिकायत में लगाए गए आरोपों, उपलब्ध वीडियो सामग्री, प्रत्यक्षदर्शी बयानों और नए कानून की लागू धाराओं की समीक्षा करनी होगी।
राजनीतिक स्तर पर कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी रहने की संभावना है। गोवा में खरगे और कांग्रेस नेताओं द्वारा पहले दो अंतरों का गायन भी इस बात का संकेत है कि पार्टी अपने ऐतिहासिक रुख को सार्वजनिक रूप से दोहराना चाहती है।
वंदे मातरम् विवाद में मल्लिकार्जुन खरगे का बयान राजनीतिक जवाब है, लेकिन इसके पीछे एक वास्तविक ऐतिहासिक संदर्भ मौजूद है। कांग्रेस ने 1937 में राष्ट्रीय सभाओं के लिए पहले दो अंतरों को अपनाने का फैसला किया था और संविधान सभा ने 1950 में वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गान के बराबर सम्मान देने की बात कही थी।
दूसरी तरफ 2026 में कानून बदल चुका है। अब जानबूझकर वंदे मातरम् के गायन को रोकना या गायन में व्यवधान पैदा करना दंडनीय प्रावधान के दायरे में है।
इसलिए इस मामले में राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर असली कसौटी साक्ष्य, मंशा और कानून का सटीक अनुप्रयोग होगा। शिकायत को एफआईआर और एफआईआर को दोषसिद्धि मान लेना पत्रकारिता और न्याय, दोनों के लिहाज से उचित नहीं होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।