गुरुवार, 20 August 2026
GOLD ₹0 ▼ 0%
SENSEX 0 ▼ 0%
BITCOIN $0 ▼ 0%
38°C मुजफ्फरनगर
EDITION:
BREAKING
#ShahTimes #Muzaffarnagar #Bijnor #Moradabad #BreakingNews #Politics #Education #Crime #Sports #Business
Book Your Ads With Shah Times
Politics

वंदे मातरम् विवाद पर रविशंकर का हमला, कांग्रेस पर तुष्टीकरण का आरोप

Asif Khan 2026-08-20 16:24:00
वंदे मातरम् विवाद पर रविशंकर का हमला, कांग्रेस पर तुष्टीकरण का आरोप

वंदे मातरम् पर कांग्रेस को रविशंकर प्रसाद ने घेरा

कांग्रेस की नीति पर रविशंकर प्रसाद का बड़ा हमला

वंदे मातरम् विवाद ने फिर बढ़ाया सियासी टकराव


वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस के रुख पर रविशंकर प्रसाद ने तुष्टीकरण की राजनीति का आरोप लगाया है। कांग्रेस ने 1937 के प्रस्ताव का हवाला देते हुए शुरुआती दो पदों के गायन का पक्ष रखा है। विवाद अब राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और राजनीतिक रणनीति के बीच नई बहस बन गया है।

स्थान: नई दिल्ली

तारीख: 20 अगस्त 2026
बाय:Mohd Naved

वंदे मातरम् विवाद पर रविशंकर का हमला, कांग्रेस पर तुष्टीकरण का आरोप

वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच सियासी टकराव एक बार फिर तेज हो गया है। बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति से बाहर नहीं निकल पाने का आरोप लगाया है। उनका बयान ऐसे वक्त आया है जब कांग्रेस के भीतर वंदे मातरम् के गायन को लेकर पार्टी के पुराने रुख की चर्चा फिर सामने आई है।

कांग्रेस कार्यसमिति ने हालिया बैठक में 1937 के प्रस्ताव का हवाला देते हुए वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों के गायन की अपनी स्थिति कायम रखी। कांग्रेस का तर्क है कि इस फैसले का ऐतिहासिक आधार है और यह सभी समुदायों की भावनाओं के सम्मान से जुड़ा है।

क्या हुआ?

वंदे मातरम् विवाद की मौजूदा कड़ी 15 अगस्त के कांग्रेस मुख्यालय में हुए स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम से जुड़ी राजनीतिक बहस से शुरू हुई। कार्यक्रम के दौरान गीत के गायन को लेकर बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस पर सवाल उठाए और इसे राष्ट्रगीत के सम्मान से जोड़ दिया।

कांग्रेस की ओर से इन आरोपों का जवाब दिया गया। पार्टी ने कहा कि वंदे मातरम् का सम्मान उसके लिए महत्वपूर्ण है और विवाद को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। सोनिया गांधी से जुड़ी वायरल वीडियो क्लिप पर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सफाई दी कि वह मल्लिकार्जुन खरगे के लिए बैठने की व्यवस्था को लेकर बात कर रही थीं।

इसके बाद विवाद केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस कार्यसमिति में वंदे मातरम् के गायन को लेकर पार्टी की ऐतिहासिक स्थिति पर चर्चा हुई और शुरुआती दो पदों के गायन का फैसला दोहराया गया।

पूरा संदर्भ क्या है?

वंदे मातरम् भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहरे तौर पर जुड़ा गीत है। इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अहमियत को लेकर व्यापक सहमति है। विवाद मुख्यतः इसके उन हिस्सों को लेकर रहा है जिनमें धार्मिक प्रतीकों और देवी के रूपकों का इस्तेमाल मिलता है।

कांग्रेस ने 1937 के अपने ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए शुरुआती दो पदों को स्वीकार किया था। मौजूदा राजनीतिक विवाद में पार्टी इसी पुराने फैसले को अपनी मौजूदा स्थिति का आधार बता रही है।

बीजेपी इस रुख को अलग नज़रिये से देख रही है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस ने राजनीतिक समीकरणों और कथित तुष्टीकरण के कारण राष्ट्रगीत के पूर्ण गायन से दूरी बनाई है। अमित शाह ने भी कांग्रेस पर इसी मुद्दे को लेकर तीखा हमला किया है।

पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में हुए कार्यक्रम से जुड़े वीडियो और उसके राजनीतिक अर्थ को लेकर बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने आए।

बीजेपी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का रवैया वंदे मातरम् के प्रति सम्मानजनक नहीं था। कांग्रेस ने इन आरोपों को राजनीतिक विवाद बताया और कार्यक्रम के संदर्भ में अपनी सफाई पेश की।

इसके बाद बीजेपी नेताओं ने लगातार कांग्रेस पर निशाना साधा। मामला इतना बढ़ा कि मुंबई में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के खिलाफ शिकायत दिए जाने और एफआईआर की मांग की खबरें सामने आईं।

अब कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले ने बहस को एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया है। पार्टी ने शुरुआती दो पदों के गायन के पुराने रुख को बरकरार रखा है।

प्रमुख पक्षकारों का रुख

रविशंकर प्रसाद का आरोप है कि कांग्रेस अब भी तुष्टीकरण की राजनीति के पुराने ढांचे से बाहर नहीं निकल पाई है। बीजेपी इस पूरे विवाद को राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के सवाल से जोड़ रही है।

अमित शाह ने भी कांग्रेस के फैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है और आरोप लगाया है कि पार्टी ने वंदे मातरम् को दो हिस्सों में बांटने वाला रुख अपनाया है। बीजेपी के दूसरे नेताओं ने भी कांग्रेस से माफी की मांग की है।

कांग्रेस का पक्ष इससे अलग है। पार्टी 1937 के प्रस्ताव को आधार बनाकर शुरुआती दो पदों के गायन को ऐतिहासिक कांग्रेस नीति के अनुरूप बता रही है। कांग्रेस का कहना है कि वंदे मातरम् के प्रति सम्मान और सभी समुदायों की भावनाओं का ख्याल, दोनों साथ चल सकते हैं।

उद्धव ठाकरे गुट के नेता भी इस विवाद में बीजेपी की आलोचना कर चुके हैं। शिवसेना यूबीटी सांसद संजय राउत ने वंदे मातरम् के ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला देते हुए बीजेपी के राष्ट्रवाद के दावे पर सवाल उठाए हैं।

उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं?

उपलब्ध रिपोर्टिंग से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस कार्यसमिति ने शुरुआती दो पदों के गायन की स्थिति को दोहराया है। यह फैसला अचानक लिया गया नया रुख नहीं है, बल्कि कांग्रेस के 1937 के प्रस्ताव से जोड़ा गया है।

दूसरी तरफ 15 अगस्त के कार्यक्रम से जुड़ी वायरल सामग्री को लेकर आरोप और राजनीतिक दावे हुए हैं। इन वीडियो क्लिप्स के अर्थ को लेकर दोनों पक्षों की व्याख्या अलग है। इसलिए किसी कथित व्यवहार को अंतिम निष्कर्ष के रूप में पेश करने से पहले मूल वीडियो, पूरा संदर्भ और स्वतंत्र पुष्टि को महत्व देना जरूरी है।

यही इस विवाद का अहम पत्रकारिता पक्ष है। राजनीतिक बयान और सत्यापित तथ्य एक ही चीज नहीं हैं।

संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं?

वंदे मातरम् विवाद का असर आगामी राजनीतिक विमर्श पर पड़ सकता है। बीजेपी इसे राष्ट्रवाद और कांग्रेस की राजनीतिक सोच से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस इसे अपने ऐतिहासिक फैसले और बहुलतावादी दृष्टिकोण के संदर्भ में रख रही है।

ऐसे मुद्दे चुनावी राजनीति में तेज ध्रुवीकरण पैदा कर सकते हैं। खास तौर पर तब, जब राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक अधिकार जैसे विषय पहले से राजनीतिक बहस के केंद्र में हों।

हालांकि, इस विवाद का वास्तविक चुनावी असर किस हद तक होगा, इसका आकलन अभी जल्दबाजी होगा।

राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव

इस विवाद ने कांग्रेस के सामने एक राजनीतिक चुनौती रखी है। पार्टी को एक तरफ अपने ऐतिहासिक फैसले की व्याख्या करनी है और दूसरी तरफ बीजेपी के उस नैरेटिव का जवाब देना है जिसमें उसके रुख को तुष्टीकरण से जोड़ा जा रहा है।

बीजेपी के लिए भी यह मुद्दा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। पार्टी इसे राष्ट्रवादी नैरेटिव के हिस्से के तौर पर आगे बढ़ा रही है। अमित शाह और अन्य बीजेपी नेताओं के बयान बताते हैं कि पार्टी इस मुद्दे को व्यापक राजनीतिक बहस में ले जाने के लिए तैयार है।

आर्थिक और सामाजिक असर

इस विवाद का प्रत्यक्ष आर्थिक असर फिलहाल सामने नहीं आया है। इसका मुख्य असर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श पर है।

वंदे मातरम् जैसे राष्ट्रीय प्रतीक से जुड़े विवाद में भाषा और राजनीतिक बयानबाजी का असर सामाजिक माहौल पर पड़ सकता है। इसलिए सभी पक्षों के लिए तथ्यात्मक और संयमित संवाद महत्वपूर्ण रहेगा।

मीडिया के लिए भी यह मामला संवेदनशील है। किसी वायरल वीडियो, राजनीतिक आरोप या सोशल मीडिया दावे को स्वतंत्र पुष्टि के बिना तथ्य की तरह पेश करना विवाद को और बढ़ा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रभाव

वंदे मातरम् विवाद का सीधा अंतरराष्ट्रीय असर सीमित है। फिर भी भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में राष्ट्रवाद, बहुलवाद और धार्मिक विविधता पर होने वाली बहस का अंतरराष्ट्रीय मीडिया और पर्यवेक्षकों की नजर में महत्व रहता है।

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे गुट की प्रतिक्रिया इस बात का संकेत देती है कि यह विवाद केवल बीजेपी और कांग्रेस तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र की विपक्षी राजनीति भी इस मुद्दे को अपने राजनीतिक नज़रिये से देख रही है।

कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?

सबसे अहम सवाल यह है कि वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस का मौजूदा रुख आने वाले महीनों में पार्टी की औपचारिक राजनीतिक लाइन बनेगा या यह केवल मौजूदा विवाद के संदर्भ में दोहराया गया ऐतिहासिक फैसला रहेगा।

दूसरा सवाल यह है कि बीजेपी इस मुद्दे को कितने लंबे समय तक अपने राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाएगी।

तीसरा सवाल राजनीतिक आरोपों और वास्तविक घटनाओं के बीच अंतर को लेकर है। 15 अगस्त के कार्यक्रम से जुड़े वीडियो और दावों की स्वतंत्र पुष्टि जितनी स्पष्ट होगी, उतनी ही तथ्याधारित बहस संभव होगी।

आगे क्या होगा?

कांग्रेस और बीजेपी के बीच इस मुद्दे पर बयानबाजी जारी रहने के आसार हैं। बीजेपी कांग्रेस के मौजूदा रुख को तुष्टीकरण से जोड़ सकती है, जबकि कांग्रेस 1937 के फैसले और बहुलतावादी राजनीति को अपनी दलील का आधार बनाएगी।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या विवाद संसद, चुनावी मंचों या राज्यों की राजनीति में औपचारिक मुद्दा बनता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि वंदे मातरम् राजनीतिक विमर्श में फिर एक प्रमुख प्रतीक बन गया है।

संपादकीय निष्कर्ष

वंदे मातरम् विवाद को समझने के लिए राजनीतिक आरोपों और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच फर्क रखना जरूरी है। बीजेपी इसे कांग्रेस की कथित तुष्टीकरण नीति से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस 1937 के प्रस्ताव के आधार पर शुरुआती दो पदों के गायन को अपनी ऐतिहासिक स्थिति बता रही है।

इस बहस का लोकतांत्रिक महत्व इस बात में है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान, धार्मिक संवेदनशीलता और राजनीतिक रणनीति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है। अंतिम निष्कर्ष राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि प्रमाणित तथ्यों और सार्वजनिक बहस की गुणवत्ता से निकलना चाहिए।

वीडियो देखें

ADVERTISEMENT
Asif Khan

Asif Khan

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

BREAKING NEWS

संबंधित खबरें

अमित शाह का कांग्रेस पर हमला, बोले वंदे मातरम् के किए दो टुकड़े

2026-08-20 16:35:23

वंदे मातरम पर अमित शाह का कांग्रेस पर हमला, 1937 का फैसला फिर चर्चा में

2026-08-20 12:56:59

खरगे का पलटवार, “वंदे मातरम् अपराध है तो गांधी-नेहरू पर भी केस हो”

2026-08-18 16:18:11

वंदे मातरम् विवाद पर कंगना का कांग्रेस पर हमला, बोलीं देश के खिलाफ जा रही पार्टी

2026-08-18 15:23:56

वंदे मातरम विवाद: खड़गे, सोनिया और राहुल के खिलाफ मुंबई में शिकायत

2026-08-17 17:27:14

इमरान मसूद का ऐलान, “पहले भी नहीं गाया, आगे भी नहीं गाऊंगा” वंदे मातरम् पर फिर सियासी घमासान

2026-08-17 13:57:56

वंदे मातरम विवाद: सोनिया गांधी के इशारे पर क्या है सच?

2026-08-15 15:37:59

राहुल गांधी के आरोपों पर रिजिजू का पलटवार, गिनाईं पुरानी फायरिंग घटनाएं

2026-08-20 08:34:29

TRENDING

ताज़ा ख़बरें
BREAKING NEWS
ADVERTISEMENT

Your Ad Here
TRENDING
आज का ई-पेपर
मुजफ्फरनगर (12 पेज)
बिजनौर (10 पेज)
सहारनपुर (11 पेज)
मुरादाबाद (14 पेज)
Home Video Epaper Reel Menu
Chat With Us
SHAH TIMES
ख़बरें छुपाता नहीं, छापता है
🏠 होम ⚡ ब्रेकिंग न्यूज़ 📰 ताज़ा खबरें 🇮🇳 देश 🌍 दुनिया 🏛 राजनीति 🚔 क्राइम 📈 बिजनेस 🏏 स्पोर्ट्स 🎓 शिक्षा ❤️ स्वास्थ्य 📰 ई-पेपर