इमरान मसूद का वंदे मातरम् पर फिर बड़ा बयान
वंदे मातरम् पर इमरान मसूद का रुख कायम
“पहले नहीं गाया, आगे भी नहीं गाऊंगा”, मसूद
नई दिल्ली / सहारनपुर, उत्तर प्रदेश
17 अगस्त 2026
Mohd Naved
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने वंदे मातरम् को लेकर कहा कि उन्होंने पहले भी यह गीत नहीं गाया और आगे भी नहीं गाएंगे। उनका बयान नए कानूनी प्रावधान के बाद सामने आया है। संसद में वंदे मातरम् को लेकर तीखी बहस हो चुकी है। अब विवाद आस्था, अभिव्यक्ति और राष्ट्र सम्मान से जुड़ गया है।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने वंदे मातरम् को लेकर अपना रुख दोहराया है। आईएएनएस की 17 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक मसूद ने कहा कि उन्होंने पहले भी वंदे मातरम् नहीं गाया और आगे भी नहीं गाएंगे।
यह बयान ऐसे समय आया है जब वंदे मातरम् को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच लंबे समय से राजनीतिक बहस जारी है। जुलाई 2026 में संसद ने Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 को पारित किया था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गान के समान वैधानिक संरक्षण मिला है।
नए प्रावधानों के तहत वंदे मातरम् के गायन को जानबूझकर रोकना या गायन कर रही सभा में बाधा डालना दंडनीय अपराध के दायरे में आता है। रिपोर्टों के अनुसार ऐसे अपराध में तीन साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रीय गीत है, जबकि जन गण मन राष्ट्रीय गान है। दोनों की संवैधानिक और ऐतिहासिक स्थिति को लेकर राजनीतिक बहस पहले भी होती रही है।
2026 में वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के मौके पर संसद में विशेष चर्चा हुई। इस दौरान सत्तापक्ष ने कांग्रेस पर राष्ट्रीय गीत की अनदेखी और तुष्टिकरण की राजनीति के आरोप लगाए। विपक्ष ने सरकार पर ऐतिहासिक मुद्दे को राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।
इमरान मसूद पहले भी इस बहस में अपना अलग रुख रखते रहे हैं। दिसंबर 2025 में उन्होंने वंदे मातरम् पर चर्चा के दौरान धार्मिक आस्था से जुड़े सवाल उठाए थे। उसी दौरान उन्होंने आरएसएस और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े किए थे।
जुलाई 2026 में केंद्र सरकार Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill लेकर आई। इसका मकसद 1971 के कानून में संशोधन करके वंदे मातरम् को भी उन राष्ट्रीय प्रतीकों की कानूनी सुरक्षा के दायरे में लाना था, जिनके अपमान या गायन में जानबूझकर बाधा डालने पर कार्रवाई का प्रावधान है।
राज्यसभा ने 29 जुलाई को विधेयक पारित किया। लोकसभा ने अगले दिन इसे मंजूरी दी। इसके बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास गया और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून का हिस्सा बन गया।
13 अगस्त को संसद के मॉनसून सत्र के समापन के मौके पर लोकसभा में वंदे मातरम् का पूर्ण गायन भी हुआ। यह घटनाक्रम विवाद को एक नए राजनीतिक संदर्भ में ले गया।
इमरान मसूद का रुख धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत मान्यता के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है। उन्होंने पहले कहा था कि राष्ट्रीय गीत का सम्मान करना और उसे गाना दो अलग बातें हैं। दिसंबर 2025 में उन्होंने यह भी कहा था कि वंदे मातरम् का सम्मान किया जा सकता है और उसके दौरान खड़ा हुआ जा सकता है।
सत्तापक्ष का तर्क इससे अलग है। सरकार और उसके नेताओं ने वंदे मातरम् को स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा प्रतीक बताते हुए इसके सम्मान को राष्ट्रीय कर्तव्य के नजरिए से पेश किया है।
कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर एक समान सार्वजनिक भाषा नहीं रही है। कुछ कांग्रेस नेताओं ने वंदे मातरम् की ऐतिहासिक भूमिका और सम्मान को स्वीकार किया, जबकि इसके गायन को लेकर धार्मिक और राजनीतिक आपत्तियां भी सामने आईं।
उपलब्ध रिपोर्टों से तीन बातें स्पष्ट हैं। पहली, इमरान मसूद का वंदे मातरम् पर आपत्ति वाला रुख नया नहीं है। दूसरी, संसद ने 2026 में वंदे मातरम् को लेकर कानून में महत्वपूर्ण बदलाव किया। तीसरी, नए कानून का मुख्य फोकस जानबूझकर गायन रोकने या गायन में बाधा पैदा करने जैसे कृत्यों पर है।
यहां एक अहम फर्क समझना जरूरी है। किसी व्यक्ति का वंदे मातरम् नहीं गाना और किसी सभा में उसके गायन को जानबूझकर बाधित करना एक ही कानूनी स्थिति नहीं है। उपलब्ध कानूनी व्याख्याओं में भी इस अंतर को महत्वपूर्ण माना गया है।
इसलिए इमरान मसूद के बयान को सीधे तौर पर कानून के उल्लंघन के रूप में पेश करना तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी। कानून का वास्तविक इस्तेमाल किसी खास घटना, उसके इरादे और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
मसूद का बयान राजनीतिक तौर पर कांग्रेस और भाजपा के बीच पहले से जारी राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता की बहस को फिर तेज कर सकता है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसका असर खास तौर पर राजनीतिक विमर्श पर पड़ सकता है। सहारनपुर से सांसद होने के कारण इमरान मसूद का बयान उनके संसदीय क्षेत्र और उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन सकता है। हालांकि किसी चुनावी असर का आकलन करने के लिए मौजूदा चुनावी आंकड़े या जनमत सर्वेक्षण उपलब्ध होना जरूरी होगा।
राष्ट्रीय स्तर पर यह विवाद इस सवाल को सामने रखता है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान और नागरिक की व्यक्तिगत आस्था के बीच कानूनी सीमा कहां तय होती है।
वंदे मातरम् को कानूनी संरक्षण मिलने के बाद इस मुद्दे का स्वरूप पहले से अलग हो गया है। अब बहस केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। कानून के दायरे, उसके इस्तेमाल और उसके संभावित प्रभाव पर भी सवाल उठेंगे।
सरकार के लिए चुनौती यह होगी कि कानून को स्पष्ट और सीमित दायरे में लागू किया जाए। किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद और जानबूझकर व्यवधान पैदा करने के बीच फर्क बनाए रखना कानूनी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए अहम रहेगा।
विपक्ष के सामने भी सवाल है कि वह वंदे मातरम् के ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व को स्वीकार करते हुए धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अपने तर्क को किस तरह पेश करता है।
इस विवाद का सीधा आर्थिक प्रभाव फिलहाल सामने नहीं है। इसका मुख्य असर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श पर है।
भारत जैसे बहुलतावादी समाज में राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर सहमति और असहमति दोनों मौजूद रही हैं। ऐसे मुद्दों पर राजनीतिक भाषा जितनी तीखी होती है, सामाजिक ध्रुवीकरण का जोखिम उतना बढ़ सकता है।
इसी वजह से इस बहस में तथ्य, कानून और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
इस मामले का कोई प्रत्यक्ष अंतरराष्ट्रीय असर फिलहाल सामने नहीं आया है। हालांकि भारत में राष्ट्रीय पहचान, धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े विवाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अक्सर व्यापक लोकतांत्रिक बहस के संदर्भ में देखे जाते हैं।
इसलिए आगे होने वाली कानूनी कार्रवाई या राजनीतिक प्रतिक्रिया भारत की बहुलतावादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय विमर्श में भी जगह बना सकती है।
सबसे अहम सवाल यह है कि नए कानून की व्याख्या व्यवहार में किस तरह होगी।
क्या केवल वंदे मातरम् नहीं गाने को अपराध माना जाएगा, या अपराध के लिए जानबूझकर गायन रोकने अथवा सभा में व्यवधान पैदा करने का स्पष्ट प्रमाण जरूरी होगा?
क्या आने वाले मामलों में अदालतें व्यक्तिगत धार्मिक आस्था और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के बीच कोई स्पष्ट कसौटी तय करेंगी?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि राजनीतिक दल इस मुद्दे को राष्ट्रीय एकता के सवाल के रूप में आगे बढ़ाते हैं या इसे चुनावी ध्रुवीकरण के मुद्दे में बदलते हैं।
इमरान मसूद का ताजा बयान फिलहाल एक राजनीतिक और वैचारिक रुख के तौर पर देखा जाना चाहिए। इसे कानूनी उल्लंघन घोषित करने से पहले किसी विशिष्ट घटना और उसके तथ्य सामने आना जरूरी है।
आने वाले दिनों में इस बयान पर भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया सामने आ सकती है। यदि किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में वंदे मातरम् के गायन से जुड़ी कोई घटना होती है, तो नए कानून के तहत उसकी कानूनी व्याख्या इस विवाद को नया आयाम दे सकती है।
इमरान मसूद का “पहले भी नहीं गाया और आगे भी नहीं गाऊंगा” वाला रुख वंदे मातरम् विवाद को फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में लाता है। लेकिन इस बयान को कानून के उल्लंघन के बराबर मानना सही नहीं होगा।
नए कानून का केंद्र जानबूझकर गायन रोकना या गायन में व्यवधान डालना है। इसलिए इस मामले में राजनीतिक बयान, धार्मिक आस्था और आपराधिक जिम्मेदारी के बीच साफ फर्क रखना जरूरी है।
वंदे मातरम् का ऐतिहासिक महत्व निर्विवाद रूप से बड़ा है। साथ ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का इस्तेमाल स्पष्ट प्रावधानों, प्रमाण और निष्पक्ष प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। यही इस विवाद की सबसे अहम कसौटी रहेगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।