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राहुल गांधी के आरोपों पर रिजिजू का पलटवार, गिनाईं पुरानी फायरिंग घटनाएं

Apurva Choudhary 2026-08-20 08:34:29
राहुल गांधी के आरोपों पर रिजिजू का पलटवार, गिनाईं पुरानी फायरिंग घटनाएं
दिल्ली में छात्र प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई को लेकर राहुल गांधी और किरेन रिजिजू आमने-सामने हैं। राहुल ने केंद्र पर कार्रवाई का आरोप लगाया, जबकि रिजिजू ने कांग्रेस शासन के दौरान आंदोलनों में पुलिस फायरिंग की घटनाएं गिनाईं। रिजिजू ने मौजूदा सरकार के संयम का दावा किया, जिसे विपक्ष चुनौती देता रहा है।

Location: New Delhi, India
Date: 19 August 2026
By: Apurva Choudhary 

राहुल गांधी के आरोपों पर रिजिजू का पलटवार, गिनाईं पुरानी फायरिंग घटनाएं
दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी तथा केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर छात्रों के खिलाफ कथित कठोर पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए थे। इसके जवाब में रिजिजू ने कांग्रेस शासन के दौरान आंदोलनों और प्रदर्शनों में हुई पुलिस फायरिंग की कई घटनाओं का हवाला दिया। 
यह विवाद जुलाई 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद की ओर छात्रों के मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई से जुड़ा है। उस प्रदर्शन में कथित परीक्षा अनियमितताओं और नीट पेपर लीक के मुद्दे पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई थी। रिपोर्टों के अनुसार प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई तथा बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। 

क्या हुआ?
राहुल गांधी ने संसद में और सोशल मीडिया पर दिल्ली में छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। 29 जुलाई को लोकसभा में उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को अधिकृत करने का आरोप लगाया। सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया और रिजिजू ने राहुल गांधी से माफी की मांग की। 
रिजिजू ने अब जवाबी राजनीतिक तर्क के तौर पर कांग्रेस शासन के दौरान हुई पुलिस फायरिंग की घटनाओं का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि अलग-अलग दौर में कांग्रेस सरकारों के समय भी आंदोलनों से निपटने के दौरान पुलिस बल का इस्तेमाल हुआ और कई मामलों में लोगों की जान गई।
रिजिजू ने मौजूदा सरकार की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि नागरिकों की जान और सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए तथा हाल के आंदोलनों के दौरान अधिकतम संयम बरता गया।
यह रिजिजू का राजनीतिक और नीतिगत बचाव है। इसे स्वतंत्र रूप से स्थापित निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि सरकार के पक्ष के रूप में देखना जरूरी है।
पूरा संदर्भ क्या है?
दिल्ली का मौजूदा विवाद नीट परीक्षा और कथित पेपर लीक से जुड़ी छात्रों की नाराजगी के बीच सामने आया। 20 जुलाई 2026 को प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की, जिसके दौरान पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया। विभिन्न रिपोर्टों में घायलों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। 
राहुल गांधी ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में हस्तक्षेप किया और बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के निकट धरना भी दिया। दिल्ली पुलिस ने उन्हें और अन्य विपक्षी नेताओं को वहां से हटाकर हिरासत में लिया। 
29 जुलाई को मामला संसद तक पहुंचा, जहां राहुल गांधी ने पुलिस कार्रवाई के लिए गृह मंत्री अमित शाह को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की। सरकार की ओर से जवाब दिया गया कि गोली चलाने का आरोप तथ्यात्मक रूप से गलत है और पुलिस कार्रवाई के अधिकार से संबंधित प्रक्रिया का पालन किया गया था। 

पृष्ठभूमि और घटनाक्रम
रिजिजू ने अपने जवाब में कांग्रेस शासन के अलग-अलग दौर में हुई घटनाओं का उल्लेख किया। इनमें 1969 का तेलंगाना आंदोलन, 1976 का तुर्कमान गेट प्रकरण, 1976 में मुजफ्फरनगर का नसबंदी-विरोधी प्रदर्शन, 1972 का पंजाब का मोगा आंदोलन और 1973-74 का गुजरात नव निर्माण आंदोलन शामिल हैं।
उन्होंने 1998 के मध्य प्रदेश के मुलताई किसान आंदोलन, 2007 के आंध्र प्रदेश के मुदिगोंडा भूमि आंदोलन, 2010 के सोमपेटा पुलिस फायरिंग, 2011 के काकापल्ली मामले और महाराष्ट्र के जैतापुर परमाणु ऊर्जा परियोजना विरोध प्रदर्शन का भी उल्लेख किया।
इन घटनाओं के संदर्भ में मृतकों और पुलिस कार्रवाई के आंकड़ों को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों में अंतर पाया जाता है। इसलिए रिजिजू द्वारा बताए गए आंकड़ों को प्रत्येक मामले के प्राथमिक दस्तावेजों से अलग-अलग सत्यापित किए बिना अंतिम आंकड़े के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
तुर्कमान गेट मामले में भी मौतों की संख्या को लेकर लंबे समय से मतभेद रहा है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों में आधिकारिक और अन्य अनुमानों के बीच अंतर मिलता है। 

प्रमुख पक्षकारों का रुख
राहुल गांधी का तर्क है कि छात्रों के प्रदर्शन के दौरान राज्य की प्रतिक्रिया अत्यधिक कठोर थी और केंद्र सरकार को इसकी जवाबदेही लेनी चाहिए। उन्होंने संसद में गृह मंत्री अमित शाह पर गंभीर आरोप लगाए और मामले में जांच की मांग की। 
सरकार ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज किया है। केंद्रीय मंत्रियों ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस ने कार्रवाई की और गोली चलाए जाने के आरोप गलत हैं। रिजिजू ने विशेष रूप से कांग्रेस शासन के दौरान हुई पुलिस फायरिंग की घटनाओं को सामने रखकर विपक्ष के आरोपों का राजनीतिक जवाब दिया। 
दिल्ली पुलिस का कहना है कि 20 जुलाई के प्रदर्शन में स्थिति बिगड़ने और कथित असामाजिक तत्वों की मौजूदगी के कारण बल प्रयोग करना पड़ा। बाद में पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी अपनी कार्रवाई का बचाव किया और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों के घायल होने का दावा किया। 

उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं?
उपलब्ध रिपोर्टों से यह पुष्टि होती है कि दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ तथा बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। इसके बाद राहुल गांधी ने सरकार के खिलाफ राजनीतिक अभियान तेज किया और संसद में भी इस मुद्दे को उठाया। 
यह भी स्पष्ट है कि राहुल गांधी के आरोपों और सरकार के जवाब के बीच मुख्य विवाद पुलिस कार्रवाई की प्रकृति, उसकी वैधता और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर है।
रिजिजू द्वारा गिनाई गई ऐतिहासिक घटनाएं इस बहस का राजनीतिक संदर्भ जरूर देती हैं, लेकिन किसी पिछली सरकार के दौरान हुई कार्रवाई वर्तमान घटना की वैधता या औचित्य को अपने आप साबित नहीं करती।
इसी तरह, मौजूदा सरकार द्वारा किसी प्रदर्शन में मौत न होने का दावा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पुलिस की हर कार्रवाई उचित थी। हर घटना का मूल्यांकन उपलब्ध वीडियो, मेडिकल रिकॉर्ड, पुलिस रिकॉर्ड, प्रत्यक्षदर्शी बयान और न्यायिक अथवा स्वतंत्र जांच के आधार पर होना चाहिए।

संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं?
राहुल गांधी और रिजिजू के बीच यह विवाद संसद और सड़क दोनों जगह राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकता है। छात्र आंदोलनों, परीक्षा व्यवस्था और पुलिस की भूमिका को लेकर पहले से मौजूद राजनीतिक बहस अब कांग्रेस बनाम भाजपा के पुराने शासन रिकॉर्ड की तुलना में बदलती दिखाई दे रही है।
ऐसे विवाद में मुख्य सार्वजनिक हित का प्रश्न यह है कि प्रदर्शनकारियों के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की राज्य की जिम्मेदारी दोनों साथ मौजूद रहते हैं।

राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही और राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी का सवाल उठाया है। विपक्ष सरकार से स्पष्टीकरण मांग रहा है, जबकि सरकार विपक्ष पर घटना को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगा रही है।
रिजिजू द्वारा दशकों पुरानी घटनाओं को सामने लाने से बहस का फोकस वर्तमान पुलिस कार्रवाई से हटकर कांग्रेस और भाजपा सरकारों के रिकॉर्ड की तुलना पर जा सकता है।
हालांकि, नीति के स्तर पर वास्तविक सवाल यह है कि भविष्य में बड़े छात्र या नागरिक आंदोलनों के दौरान पुलिस बल के इस्तेमाल के लिए पारदर्शी प्रोटोकॉल, जवाबदेही और स्वतंत्र समीक्षा कितनी प्रभावी है।

आर्थिक और सामाजिक असर
छात्र आंदोलन का सीधा असर शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भरोसे पर पड़ सकता है। परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों के भविष्य, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता और संस्थागत जवाबदेही से जुड़ा विषय है।
यदि ऐसे आंदोलनों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव बढ़ता है तो छात्रों और सरकार के बीच संवाद की गुंजाइश कमजोर हो सकती है। इसके उलट, पारदर्शी जांच और नियमित संवाद तनाव को कम करने में मदद कर सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रभाव
मामला मुख्यतः घरेलू राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद है। हालांकि, बड़े छात्र आंदोलनों और राज्य की प्रतिक्रिया से भारत में नागरिक स्वतंत्रता, विरोध के अधिकार और पुलिस जवाबदेही पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा भी हो सकती है।
राष्ट्रीय स्तर पर इसका असर अधिक व्यापक है, क्योंकि नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बड़ी संख्या में युवा शामिल होते हैं। परीक्षा प्रणाली पर भरोसा और सरकार की प्रतिक्रिया दोनों का राष्ट्रीय महत्व है।

कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने किस स्तर का बल प्रयोग किया और किन परिस्थितियों में किया।
दूसरा सवाल यह है कि प्रदर्शन के दौरान घायल हुए छात्रों और पुलिसकर्मियों की संख्या का आधिकारिक, स्वतंत्र और सत्यापित रिकॉर्ड क्या है।
तीसरा सवाल राहुल गांधी के उस आरोप से जुड़ा है जिसमें उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह को पुलिस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार बताया। सरकार इस आरोप को खारिज कर चुकी है, इसलिए इसके समर्थन में कोई सार्वजनिक दस्तावेज या आदेश सामने आया है या नहीं, यह महत्वपूर्ण प्रश्न बना हुआ है। 
चौथा सवाल रिजिजू द्वारा गिनाई गई ऐतिहासिक घटनाओं और मौतों के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि का है। अलग-अलग मामलों में आधिकारिक आंकड़े और ऐतिहासिक आकलन अलग हो सकते हैं।

आगे क्या होगा?
मौजूदा राजनीतिक विवाद आगे संसद में भी जारी रहने की संभावना है। विपक्ष पुलिस कार्रवाई की जांच और जवाबदेही की मांग कर सकता है, जबकि सरकार कानून-व्यवस्था और प्रदर्शन के दौरान पुलिस के सामने मौजूद चुनौतियों को सामने रखेगी।
यदि मामले में कोई स्वतंत्र जांच, न्यायिक हस्तक्षेप या आधिकारिक रिपोर्ट सामने आती है तो पुलिस कार्रवाई के बारे में उपलब्ध तथ्य अधिक स्पष्ट हो सकते हैं।
राजनीतिक स्तर पर दोनों पक्ष अपने-अपने शासनकाल के रिकॉर्ड को सामने रखकर बहस को आगे बढ़ा सकते हैं। लेकिन वर्तमान घटना का अंतिम आकलन ऐतिहासिक राजनीतिक तुलना से नहीं, बल्कि उपलब्ध प्रत्यक्ष और आधिकारिक साक्ष्यों से होना चाहिए।
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Apurva Choudhary

Apurva Choudhary

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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