काबुल के ‘महाविनायक’: अफ़ग़ानिस्तान में कैसे मिला प्राचीन गार्देज़ गणपति?
अफ़ग़ानिस्तान को आज भले ही युद्ध, राजनीतिक उथल-पुथल और बदलते सत्ता-समीकरणों के लिए जाना जाता हो, लेकिन इस भूभाग का इतिहास इससे कहीं ज्यादा पुराना और विविध रहा है। इसी प्राचीन अतीत की एक महत्वपूर्ण निशानी है गार्देज़ से मिली संगमरमर की गणेश प्रतिमा, जिसे उसके आधार पर दर्ज संस्कृत शिलालेख में ‘महाविनायक’ कहा गया है।इस प्रतिमा की खोज और उसके बाद की यात्रा इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के लिए लंबे समय से दिलचस्प विषय रही है। खास बात यह है कि प्रतिमा के काल निर्धारण और शिलालेख में उल्लेखित ‘खिंगल’ शासक की पहचान को लेकर विद्वानों के बीच पूरी तरह एकराय नहीं है।
गार्देज़ गणपति आखिर है क्या?
गार्देज़ गणपति संगमरमर से बनी गणेश की एक प्राचीन प्रतिमा है। इसका संबंध अफ़ग़ानिस्तान के पक्तिया प्रांत के गार्देज़ क्षेत्र से बताया जाता है। पुरातात्विक संदर्भों में इसे गार्देज़ गणेश या गार्देज़ महाविनायक के नाम से जाना जाता है।विश्वसनीय पुरातात्विक संदर्भों के मुताबिक प्रतिमा बाद में काबुल लाई गई थी और काबुल के दरगाह पीर रतन नाथ परिसर से इसका संबंध दर्ज किया गया है। एन्साइक्लोपीडिया ईरानिका भी गार्देज़ से मिली गणेश की संगमरमर प्रतिमा का उल्लेख करती है और बताती है कि उसके आधार पर उत्तर-गुप्तकालीन संस्कृत शिलालेख मौजूद है।
1956 में भारतीय पुरातात्विक दल को मिली जानकारी
गार्देज़ गणपति की आधुनिक पुरातात्विक कहानी में वर्ष 1956 अहम माना जाता है। उस साल भारत सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान में पुरातात्विक अन्वेषण के लिए एक दल भेजा था। दल की रिपोर्ट में इस प्रतिमा से संबंधित जानकारी दर्ज हुई।भारतीय पुरातत्व विभाग के अधिकारियों टी. एन. रामचंद्रन और वाई. डी. शर्मा की रिपोर्ट के आधार पर प्रसिद्ध शिलालेखविद डी. सी. सरकार ने बाद में इस अभिलेख का अध्ययन किया। रिपोर्ट में बताया गया था कि काबुल में दल को जानकारी मिली कि गार्देज़ क्षेत्र से कई वर्ष पहले संगमरमर की एक प्रतिमा मिली थी और बाद में उसे काबुल लाया गया था।लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी जरूरी है। 1956 की रिपोर्ट के मुताबिक गार्देज़ में स्थानीय लोगों से प्रतिमा की खोज की कहानी की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी थी। इसलिए यह कहना अधिक सटीक है कि प्रतिमा को गार्देज़ से मिला हुआ बताया गया था, न कि उसके मिलने की पूरी परिस्थितियां निश्चित रूप से प्रमाणित हैं।
प्रतिमा के नीचे क्या लिखा है?
गार्देज़ गणपति की सबसे अहम विशेषता उसके आधार पर मौजूद संस्कृत शिलालेख है। एशियाई अभिलेखों के डिजिटल डेटाबेस में इस अभिलेख को ‘गार्देज़ इंसक्रिप्शन ऑफ खिंगल’ के नाम से दर्ज किया गया है। इस अभिलेख की पहली जानकारी 1956 की भारतीय पुरातात्विक रिपोर्ट से जुड़ी है और बाद में कई विद्वानों ने इसका पाठ एवं व्याख्या प्रकाशित की। शिलालेख में गणेश को ‘महाविनायक’ कहा गया है। इसका आशय गणेश के एक प्रतिष्ठित रूप से है। अभिलेख में एक शाही व्यक्ति द्वारा इस प्रतिमा की प्रतिष्ठा कराए जाने का उल्लेख मिलता है और उसके शासन के आठवें वर्ष का भी जिक्र है।शिलालेख की भाषा संस्कृत है और इसकी लिपि को विद्वानों ने सिद्धमात्रिका अथवा उससे संबंधित प्रारंभिक लिपि-परंपरा से जोड़ा है। लिपि के स्वरूप के आधार पर प्रतिमा के काल को लेकर अलग-अलग मत सामने आए हैं।
कौन था खिंगल?
प्रतिमा से जुड़ा सबसे बड़ा ऐतिहासिक सवाल यही है कि शिलालेख में उल्लिखित खिंगल आखिर कौन था।कुछ अध्ययनों में इसे खिंगिला या खिंगल नाम के ऐसे शासक से जोड़ने की कोशिश की गई है, जिसका संबंध अफ़ग़ानिस्तान और काबुल क्षेत्र के तत्कालीन शाही सत्ता-तंत्र से था। लेकिन इतिहासकारों के सामने समस्या यह है कि अलग-अलग कालखंडों में समान या मिलते-जुलते नाम वाले शासकों का उल्लेख मिलता है।गार्देज़ गणपति के काल निर्धारण पर भी अलग-अलग मत रहे हैं। कुछ विद्वानों ने इसे पांचवीं या छठी सदी के आसपास रखने की संभावना जताई, जबकि अन्य अध्ययनों में इसे बाद के काल, विशेषकर सातवीं-आठवीं सदी के संदर्भ में देखा गया है। एन्साइक्लोपीडिया ईरानिका भी प्रतिमा को विभिन्न विद्वानों द्वारा अलग-अलग समय का बताए जाने की बात दर्ज करती है। इसलिए इसे सीधे किसी एक निश्चित सदी की प्रतिमा घोषित करना ऐतिहासिक रूप से सावधानीपूर्ण नहीं होगा।
अफ़ग़ानिस्तान में गणेश की एक और प्रतिमा
गार्देज़ गणपति अकेली ऐसी प्राचीन गणेश प्रतिमा नहीं है जिसका संबंध काबुल क्षेत्र से सामने आया है। काबुल के उत्तर में शकर दर्रा क्षेत्र से भी संगमरमर की गणेश प्रतिमा मिलने का पुरातात्विक उल्लेख मिलता है।
एन्साइक्लोपीडिया ईरानिका के अनुसार शकर दर्रा, काबुल क्षेत्र से मिली गणेश की एक संगमरमर प्रतिमा बाद में काबुल के नरसिंहद्वारा मंदिर से संबंधित बताई गई।
इन खोजों से कम से कम इतना स्पष्ट होता है कि अफ़ग़ानिस्तान के काबुल क्षेत्र में प्राचीन काल की भारतीय धार्मिक और कलात्मक परंपराओं से जुड़ी मूर्तिकला के प्रमाण मौजूद रहे हैं। हालांकि इन प्रतिमाओं को किसी व्यापक धार्मिक या राजनीतिक निष्कर्ष से जोड़ने के लिए अलग-अलग पुरातात्विक साक्ष्यों का अध्ययन जरूरी है।
प्रतिमा किस कला परंपरा से जुड़ी है?
गार्देज़ गणपति को भारतीय उपमहाद्वीप और अफ़ग़ान क्षेत्र के बीच विकसित कला-संपर्क के संदर्भ में भी देखा जाता है। अफ़ग़ानिस्तान प्राचीन समय में मध्य एशिया, भारतीय उपमहाद्वीप और ईरानी सांस्कृतिक क्षेत्रों के बीच संपर्क का महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा था। गार्देज़ तथा काबुल के आसपास से शिव, दुर्गा और अन्य धार्मिक प्रतिमाओं के मिलने के पुरातात्विक उल्लेख भी उपलब्ध हैं। इससे उस दौर की धार्मिक एवं कलात्मक विविधता का पता चलता है। गार्देज़ गणपति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी पहचान केवल मूर्तिकला के आधार पर नहीं, बल्कि प्रतिमा के आधार पर मौजूद अभिलेख से भी जुड़ी हुई है।
आज कहां है गार्देज़ गणपति?
गार्देज़ से प्रतिमा के काबुल पहुंचने का उल्लेख 1956 की पुरातात्विक सामग्री में मिलता है। उपलब्ध पुरातात्विक संदर्भों में इसका संबंध काबुल स्थित दरगाह पीर रतन नाथ से बताया गया है। हालांकि बाद के दशकों में अफ़ग़ानिस्तान में हुए संघर्षों और राजनीतिक अस्थिरता ने वहां की सांस्कृतिक धरोहरों की स्थिति को प्रभावित किया। इसलिए प्रतिमा की मौजूदा स्थिति के बारे में किसी भी दावे को ताजा और प्रत्यक्ष पुरातात्विक रिकॉर्ड के आधार पर ही निश्चित माना जाना चाहिए।
इतिहास के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह प्रतिमा?
गार्देज़ गणपति केवल गणेश की एक प्राचीन प्रतिमा भर नहीं है। इसके आधार पर मौजूद संस्कृत अभिलेख तत्कालीन सत्ता, धार्मिक परंपरा, भाषा और कला के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देता है।साथ ही, इसकी खोज की कहानी यह भी बताती है कि पुरातत्व में किसी वस्तु की अहमियत सिर्फ उसकी उम्र से तय नहीं होती। उसकी खोज का स्थान, उसके साथ मिला अभिलेख, उसकी कलात्मक शैली और उसके संरक्षण का इतिहास—सभी मिलकर उसके अतीत को समझने में मदद करते हैं।गार्देज़ गणपति के मामले में भी यही स्थिति है। प्रतिमा का काल, शासक खिंगल की पहचान और उसके मूल धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ पर अभी भी विद्वानों के बीच चर्चा मिलती है। ऐसे में इस प्रतिमा को लेकर सबसे विश्वसनीय दृष्टिकोण यही है कि उपलब्ध अभिलेखों और पुरातात्विक अध्ययनों को साथ रखकर इसके इतिहास को समझा जाए।
निष्कर्ष
अफ़ग़ानिस्तान की धरती पर मिला गार्देज़ गणपति उस दौर की याद दिलाता है जब आज की राष्ट्रीय सीमाओं से अलग एक व्यापक मध्य एशियाई और दक्षिण एशियाई सांस्कृतिक संपर्क क्षेत्र मौजूद था। प्रतिमा पर अंकित ‘महाविनायक’ का उल्लेख इसे विशेष ऐतिहासिक महत्व देता है। हालांकि इसके काल और खिंगल शासक की पहचान को लेकर मतभेद हैं, लेकिन 1956 की भारतीय पुरातात्विक रिपोर्ट और बाद के अभिलेखीय अध्ययनों ने इस प्रतिमा को इतिहास और पुरातत्व के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण बना दिया है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।