मायावती ने सपा पर “रंग बदलने” की राजनीति का आरोप लगाया। “पीडीए” रणनीति को लेकर सवाल उठाए। बयान से यूपी की सियासत में नई बहस शुरू हुई और जातीय समीकरण फिर केंद्र में आ गए।
📍 लखनऊ
📰 8 अगस्त 2026
✍️ By Asif Khan
उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर जुबानी जंग तेज हो गई है। बसपा प्रमुख मायावती ने समाजवादी पार्टी पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि सपा चुनावी फायदे के लिए अपनी राजनीतिक लाइन बार-बार बदलती है। उन्होंने इसे “गिरगिट की तरह रंग बदलना” बताया और कहा कि यह तरीका लंबे वक्त में समाज के हित में नहीं है।
मायावती ने यह बयान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “एक्स” पर सिलसिलेवार पोस्ट के जरिए दिया। उन्होंने अपनी पार्टी को “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” की नीति पर चलने वाली अंबेडकरवादी पार्टी बताया और दावा किया कि बसपा की सरकारें इसी आधार पर चली हैं।
मायावती का मुख्य निशाना सपा का “पीडीए” फॉर्मूला रहा। सपा इस फॉर्मूले के तहत पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को जोड़ने की कोशिश कर रही है। मायावती ने आरोप लगाया कि सपा ने पहले “पी” को पिछड़ा वर्ग बताया, लेकिन अब इसे बदलकर “पंडित” की तरफ मोड़ा जा रहा है।
उनका कहना है कि यह बदलाव इस बात का संकेत है कि सपा जातीय समीकरणों को लेकर लगातार अपनी रणनीति बदल रही है। उन्होंने इसे “राजनीतिक छल” बताया और कहा कि इससे कुछ समय के लिए लाभ हो सकता है, लेकिन समाज के व्यापक हित को नुकसान होता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों पर आधारित रही है। बसपा दलित वोट बैंक पर अपनी मजबूत पकड़ का दावा करती रही है, जबकि सपा पिछड़े वर्ग और मुस्लिम वोट पर भरोसा करती रही है।
हाल के वर्षों में दोनों दलों ने अपने-अपने सामाजिक आधार को विस्तार देने की कोशिश की है। सपा ने “पीडीए” रणनीति के जरिए नए गठजोड़ बनाने का प्रयास किया, जबकि बसपा ने “सर्वजन” लाइन पर जोर देकर ब्राह्मण और अन्य वर्गों को जोड़ने की कोशिश की।
यही बदलते समीकरण अब राजनीतिक टकराव का केंद्र बन गए हैं।
पिछले कुछ महीनों में सपा ने “पीडीए” को अपने मुख्य चुनावी नैरेटिव के रूप में पेश किया। इसके जरिए पार्टी ने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वोट को एक मंच पर लाने का संदेश दिया।
इसके समानांतर बसपा ने अपने संगठन में ब्राह्मण और अन्य सवर्ण वर्ग की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की। कई जगहों पर इस आधार पर उम्मीदवार चयन की खबरें भी सामने आईं।
इसी संदर्भ में मायावती का यह बयान सामने आया, जिसने बहस को और तेज कर दिया।
यह विवाद सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरण जुड़े हैं। राज्य में वोट बैंक की राजनीति का सीधा असर सरकार गठन पर पड़ता है।
मायावती का बयान इस बात की तरफ इशारा करता है कि बसपा सपा की रणनीति को चुनौती देने की कोशिश कर रही है। वहीं सपा अपने सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने में लगी है।
इससे आने वाले चुनावों में जातीय ध्रुवीकरण और तेज हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि यह बयानबाजी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। उनके अनुसार, सभी दल अपने-अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए इस तरह के बयान देते हैं।
दूसरी तरफ कुछ विशेषज्ञ इसे गंभीर राजनीतिक संकेत मानते हैं। उनका कहना है कि सपा और बसपा के बीच बढ़ती दूरी विपक्षी राजनीति को प्रभावित कर सकती है।
मायावती ने सपा पर “रंग बदलने” का आरोप लगाया, लेकिन सपा की तरफ से इस पर अभी तक औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में यह बयान एकतरफा आरोप के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक इतिहास बताता है कि सभी दल समय-समय पर अपने सामाजिक आधार को बढ़ाने के लिए रणनीति बदलते रहे हैं। इसलिए यह भी तर्क दिया जा रहा है कि इसे सिर्फ एक पार्टी तक सीमित नहीं किया जा सकता।
ग्राउंड रिपोर्ट्स से यह संकेत मिलता है कि यूपी में जातीय समीकरण लगातार बदल रहे हैं। युवा वोटर और शहरी इलाकों में मुद्दे अब रोजगार, शिक्षा और विकास की तरफ भी शिफ्ट हो रहे हैं।
फिर भी ग्रामीण इलाकों में जाति आधारित राजनीति का असर बना हुआ है। ऐसे में “पीडीए” या “सर्वजन” जैसे फॉर्मूले चुनावी गणित में अहम भूमिका निभाते हैं।
मायावती के बयान से बसपा और सपा के बीच टकराव और खुलकर सामने आया है। इससे विपक्षी एकजुटता पर असर पड़ सकता है।
अगर यह टकराव बढ़ता है तो इसका फायदा अन्य दलों को मिल सकता है। खासकर उन पार्टियों को जो खुद को स्थिर विकल्प के तौर पर पेश कर रही हैं।
सीधे तौर पर यह मुद्दा आर्थिक नीति से जुड़ा नहीं है, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता का असर निवेश और विकास योजनाओं पर पड़ सकता है।
सामाजिक स्तर पर ऐसे बयान जातीय ध्रुवीकरण को बढ़ा सकते हैं। इससे सामाजिक संतुलन प्रभावित होने का खतरा भी रहता है।
आने वाले दिनों में सपा की प्रतिक्रिया अहम होगी। अगर सपा इस बयान का जवाब देती है तो यह विवाद और बढ़ सकता है।
चुनावी नजरिए से देखें तो दोनों दल अपनी-अपनी रणनीति को और तेज करेंगे। इससे यूपी की राजनीति में बयानबाजी और आक्रामक हो सकती है।
मायावती का सपा पर “रंग बदलती राजनीति” का आरोप सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की बदलती सियासी तस्वीर का संकेत है। “पीडीए” बनाम “सर्वजन” की बहस आने वाले चुनावों में केंद्रीय मुद्दा बन सकती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।