यूपी की 10 राज्यसभा सीटों पर चुनाव से पहले बसपा की संसद में वापसी चर्चा में है। बीजेपी के संख्याबल और मायावती की स्वतंत्र चुनावी रणनीति के बीच नए सियासी समीकरण पर नजर है।
📍 उत्तर प्रदेश
🗓️ 16 सितंबर 2026
✍️ वसी सिद्दीकी
उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा चुनाव एक अहम राजनीतिक पड़ाव बनने जा रहा है। राज्य की 10 राज्यसभा सीटों के मौजूदा कार्यकाल नवंबर 2026 में पूरे होने हैं। इनमें बीजेपी के 8 और समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी के 1-1 सदस्य शामिल हैं।
इस चुनाव की खासियत केवल राज्यसभा की सीटों का गणित नहीं है। बसपा की संसद में मौजूदा मौजूदगी भी दांव पर है। बसपा के राज्यसभा सदस्य रामजी गौतम का कार्यकाल समाप्त होने के बाद पार्टी के पास संसद के दोनों सदनों में कोई निर्वाचित सदस्य नहीं रह सकता है, जब तक वह किसी नए सदस्य को राज्यसभा भेजने में सफल नहीं होती।
इसी पृष्ठभूमि में यह राजनीतिक चर्चा सामने आई है कि बीजेपी अपने संख्याबल के जरिए बसपा के किसी उम्मीदवार को राज्यसभा पहुंचाने में समर्थन दे सकती है। हालांकि, अभी तक बीजेपी और बसपा के बीच ऐसे किसी औपचारिक समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई है।
राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव राज्यों की निर्वाचित विधानसभा के सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत प्रणाली से करते हैं।
उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस समय 402 सदस्य हैं और 1 सीट रिक्त है। उपलब्ध मौजूदा संख्या के अनुसार बीजेपी के 258, समाजवादी पार्टी के 103 और बसपा के 1 विधायक हैं। बीजेपी के सहयोगी दलों में अपना दल, राष्ट्रीय लोक दल, निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के विधायक भी शामिल हैं।
मौजूदा संख्या के आधार पर एक राज्यसभा सीट के लिए लगभग 37 विधायकों का समर्थन जरूरी माना जा रहा है। इसी गणित से बीजेपी अपने सहयोगियों के समर्थन के साथ 8 सीटों तक पहुंच सकती है, जबकि समाजवादी पार्टी 2 उम्मीदवारों को निर्वाचित कराने की स्थिति में है।
यहीं से बसपा के लिए राजनीतिक संभावना की चर्चा शुरू होती है। पार्टी के पास विधानसभा में केवल 1 विधायक है। इसलिए अपने दम पर राज्यसभा सीट हासिल करना उसके लिए संभव नहीं है।
न्यूज़ रिपोर्टों में यह संभावना उठाई गई है कि बीजेपी अपने कोटे या सहयोगी दलों के समर्थन के जरिए बसपा के किसी उम्मीदवार को राज्यसभा पहुंचाने का रास्ता खोल सकती है।
लेकिन इसे फिलहाल राजनीतिक संभावना के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। किसी समझौते, सीट बंटवारे या उम्मीदवार के नाम की आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है।
इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि बीजेपी और बसपा के बीच राज्यसभा चुनाव को लेकर कोई डील तय हो चुकी है।
यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि बसपा अध्यक्ष मायावती लगातार 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ने की बात कह रही हैं। अगस्त 2026 में उन्होंने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में पार्टी के स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की घोषणा की थी।
सितंबर 2026 में भी मायावती ने पार्टी की सभी चुनावों में स्वतंत्र रूप से उतरने की रणनीति दोहराई है।
बसपा की मौजूदा रणनीति का केंद्रीय बिंदु संगठन को अपने दम पर मजबूत करना है। पार्टी ने बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करने और 2027 के लिए उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया पर जोर दिया है।
मायावती पहले भी बीजेपी, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी से किसी चुनावी गठबंधन की संभावनाओं को खारिज करती रही हैं। फरवरी 2026 में उन्होंने बीजेपी के साथ कथित नजदीकी की खबरों को खारिज करते हुए 2027 का चुनाव स्वतंत्र रूप से लड़ने की बात कही थी।
इसलिए राज्यसभा चुनाव में किसी संभावित समर्थन को सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव के गठबंधन से जोड़ना अभी उचित नहीं होगा।
राज्यसभा का चुनाव विधानसभा चुनाव से अलग प्रक्रिया और अलग राजनीतिक परिस्थितियों में होता है। दोनों के बीच राजनीतिक संवाद या समर्थन की संभावना को अलग-अलग संदर्भ में देखना होगा।
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की राजनीतिक रणनीति में पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समूहों का गठजोड़ प्रमुख मुद्दा रहा है।
ऐसे में बसपा की राजनीतिक गतिविधियां उत्तर प्रदेश के विपक्षी सामाजिक समीकरण के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। बसपा का मुख्य सामाजिक आधार दलित मतदाताओं में रहा है और उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में दलित मत लंबे समय से निर्णायक सामाजिक समूहों में शामिल रहा है।
हालांकि, किसी राज्यसभा सीट के लिए संभावित समर्थन को सीधे किसी दल के वोट बैंक के टूटने या किसी दूसरे दल के सामाजिक समीकरण के ध्वस्त होने के रूप में पेश करना तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं होगा।
2027 के चुनाव में मतदाताओं का व्यवहार कई मुद्दों, उम्मीदवारों, स्थानीय समीकरणों, संगठनात्मक क्षमता और चुनावी गठबंधनों पर निर्भर करेगा।
बसपा के सामने संसद में प्रतिनिधित्व बनाए रखने की चुनौती है। लोकसभा में पार्टी का कोई सदस्य नहीं है और रामजी गौतम का राज्यसभा कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त होना है।
इस स्थिति में राज्यसभा में वापसी बसपा के लिए संसदीय मौजूदगी बनाए रखने का एक रास्ता हो सकती है।
लेकिन इसके लिए पार्टी को किसी दूसरे दल या विधायकों के समूह का समर्थन चाहिए होगा। मौजूदा विधानसभा संख्या बल बसपा के पक्ष में नहीं है।
यही वजह है कि राज्यसभा चुनाव में बीजेपी की भूमिका को लेकर राजनीतिक विश्लेषण सामने आ रहा है।
अगर भविष्य में बीजेपी किसी बसपा उम्मीदवार को राज्यसभा पहुंचाने के लिए समर्थन देती है, तो उसका राजनीतिक संदेश दलित प्रतिनिधित्व और सामाजिक संपर्क के संदर्भ में देखा जा सकता है।
लेकिन इसके असर का आकलन चुनावी नतीजे आने से पहले निश्चित रूप से नहीं किया जा सकता।
उत्तर प्रदेश में बीजेपी पहले से ही गैर-यादव पिछड़े और दलित सामाजिक समूहों के बीच अपना समर्थन बनाए रखने की रणनीति पर काम करती रही है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी पीडीए के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समूहों को अपने राजनीतिक आधार में जोड़ने की कोशिश कर रही है।
इसलिए बसपा से जुड़ा कोई भी बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम 2027 के चुनावी नैरेटिव में चर्चा का विषय बन सकता है।
बसपा की मौजूदा दिशा बीजेपी या समाजवादी पार्टी के साथ तत्काल गठबंधन की बजाय स्वतंत्र राजनीतिक विस्तार की है।
अगस्त 2026 में मायावती ने उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने की बात कही। पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और सामाजिक आधार के विस्तार पर भी जोर दिया जा रहा है।
जून 2026 में मायावती ने पार्टी कार्यकर्ताओं से अन्य पिछड़ा वर्ग के बीच समर्थन बढ़ाने की कोशिश करने को कहा था। पार्टी ने 2007 में अपने दम पर सरकार बनाने के अनुभव को भी कार्यकर्ताओं के सामने रखा था।
इससे संकेत मिलता है कि बसपा 2027 में केवल पारंपरिक दलित आधार पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक सामाजिक समर्थन बनाने की कोशिश कर रही है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। उपलब्ध आधिकारिक और विश्वसनीय सूचनाओं के मुताबिक उत्तर प्रदेश की इन 10 राज्यसभा सीटों के मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त होना है। चुनाव की सटीक तारीख का निर्धारण निर्वाचन कार्यक्रम के जरिए होगा। इसलिए अक्टूबर में चुनाव होने की बात को फिलहाल अंतिम कार्यक्रम के रूप में पेश करना उचित नहीं है।
राज्यसभा एक स्थायी सदन है। इसके करीब एक तिहाई सदस्य हर 2 साल में सेवानिवृत्त होते हैं और उनकी जगह नए सदस्य चुने जाते हैं।
अगला महत्वपूर्ण चरण उम्मीदवारों के नाम और चुनाव कार्यक्रम को लेकर होगा। बीजेपी और उसके सहयोगी दल अपने उम्मीदवारों की रणनीति तय करेंगे। समाजवादी पार्टी भी अपने दोनों संभावित उम्मीदवारों को लेकर फैसला करेगी।
सबसे ज्यादा नजर इस बात पर होगी कि बसपा राज्यसभा चुनाव में अपना उम्मीदवार उतारती है या नहीं और अगर उतारती है तो उसे किस तरह का समर्थन मिलता है।
फिलहाल उपलब्ध तथ्यों में बीजेपी और बसपा के बीच किसी औपचारिक राज्यसभा समझौते की पुष्टि नहीं है। दूसरी तरफ मायावती की घोषित रणनीति 2027 में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की है।
इसलिए राज्यसभा चुनाव को 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखने के बजाय इसे उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीतिक रणनीतियों की एक अलग कड़ी के रूप में देखना अधिक तथ्यपरक होगा।
2027 के चुनाव से पहले यूपी की राजनीति में पीडीए, दलित प्रतिनिधित्व, बसपा का स्वतंत्र आधार और बीजेपी का सामाजिक विस्तार लगातार प्रमुख मुद्दे बने रहेंगे। राज्यसभा चुनाव इस बड़े सियासी परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम जरूर होगा, लेकिन इसका वास्तविक चुनावी असर विधानसभा चुनाव के दौरान ही स्पष्ट होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।