मक्का पैक्ट में ईरान की एंट्री पर नया पेच
ईरान ने मक्का रक्षा समझौते के लिए रखी बड़ी शर्त
मक्का डिफेंस पैक्ट में ईरान क्यों चाहता है को-फाउंडर दर्जा?
मक्का रक्षा समझौते में ईरान की संभावित एंट्री को लेकर विरोधाभासी दावे सामने आए हैं। एक ईरानी अधिकारी ने कहा कि तेहरान को शामिल होने का प्रस्ताव मिला है और वह इसकी समीक्षा कर रहा है। वहीं विदेश मंत्रालय ने औपचारिक न्योते से इनकार किया है। ईरान को-फाउंडर भूमिका चाहता है।
मक्का/तेहरान/अंकारा | 25 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच 7 अगस्त को हुआ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता अब एक संभावित चौथे सदस्य को लेकर चर्चा में है। ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दावा किया कि तेहरान को समझौते में शामिल होने का निमंत्रण मिला है और इस प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है। लेकिन ईरान के विदेश मंत्रालय ने बाद में साफ किया कि उसे समझौते में शामिल होने का कोई औपचारिक निमंत्रण नहीं मिला। यही विरोधाभास इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर ईरान की औपचारिक एंट्री अभी तय नहीं है। इसके बावजूद तेहरान ने क्षेत्रीय सिक्योरिटी व्यवस्था में अपनी भूमिका को लेकर एक स्पष्ट नज़रिया सामने रखा है।
ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी मोहसेन रेज़ाई ने 22 अगस्त को कहा कि अगर ईरान मक्का समझौते का हिस्सा बनता है, तो उसे केवल बाद में शामिल किए गए सदस्य के तौर पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक ईरान को को-फाउंडर यानी संस्थापक सदस्य का दर्जा मिलना चाहिए। साथ ही समझौते के बेसिक डॉक्यूमेंट्स और इसकी मूल रूपरेखा तैयार करने में ईरान की भूमिका होनी चाहिए। रेज़ाई का तर्क था कि ईरान और मिस्र जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय देशों को नई क्षेत्रीय सिक्योरिटी व्यवस्था से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक अगर ये देश शामिल होते हैं तो उनकी राय समझौते की बुनियादी संरचना तैयार करने में भी शामिल होनी चाहिए। यह मांग मौजूदा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मक्का समझौते पर पहले ही सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये हस्ताक्षर कर चुके हैं। चाथम हाउस के विश्लेषण के मुताबिक मौजूदा समझौते में इन तीनों देशों को संस्थापक पक्ष के रूप में देखा जाता है।
यहीं सबसे बड़ा तथ्यात्मक पेच है। ईरानी संसद से जुड़ी समाचार एजेंसी के प्रमुख मेहदी रहीमी ने अल-मयादीन से कहा था कि ईरान को मक्का समझौते में शामिल होने का निमंत्रण मिला है और प्रस्ताव समीक्षा के अधीन है। यह दावा कई मीडिया रिपोर्टों में प्रकाशित हुआ। लेकिन ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने 24 अगस्त को कहा कि तेहरान को मक्का समझौते में शामिल होने का कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं मिला। उन्होंने बताया कि क्षेत्रीय सिक्योरिटी पर बातचीत के प्रस्ताव जरूर मिले हैं। इसलिए फिलहाल सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यही है कि ईरान और मक्का समझौते के तीनों देशों के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर संपर्क या बातचीत की संभावना मौजूद है, लेकिन ईरान की औपचारिक सदस्यता स्थापित तथ्य नहीं है।
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर 7 अगस्त को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए थे। समझौते का केंद्रीय सिद्धांत यह है कि किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। इस व्यवस्था को कई विश्लेषकों ने नाटो के आर्टिकल 5 जैसी सामूहिक रक्षा अवधारणा से जोड़ा है। हालांकि इसे सीधे नाटो जैसा सैन्य गठबंधन कहना जल्दबाजी होगी। चाथम हाउस के विश्लेषण के मुताबिक यह समझौता फिलहाल एक क्षेत्रीय सेल्फ-रिलायंस और डिटरेंस मॉडल के रूप में समझना अधिक उचित है। समझौते के तहत रक्षा सहयोग को बढ़ाने की बात भी सामने आई है। तुर्किये की ओर से राजनीतिक और सैन्य स्तर पर समन्वय, संयुक्त सैन्य अभ्यास और डिफेंस इंडस्ट्री में सहयोग की दिशा में काम की जानकारी दी गई है।
ईरान को-फाउंडर का दर्जा इसलिए चाहता है क्योंकि इससे वह समझौते की शुरुआत से ही निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकता है। यह केवल सदस्यता का सवाल नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय सिक्योरिटी आर्किटेक्चर की दिशा तय करने का सवाल है। अगर ईरान को बाद में सदस्य बनाया जाता है, तो मौजूदा तीनों देशों द्वारा तय किए गए नियमों को स्वीकार करना पड़ सकता है। लेकिन अगर तेहरान को को-फाउंडर का दर्जा मिलता है, तो वह मूल दस्तावेजों, सुरक्षा सिद्धांतों और सामूहिक प्रतिक्रिया के नियमों पर अपनी राय रखने की स्थिति में होगा। मोहसेन रेज़ाई ने इसी अंतर पर जोर दिया है। उनके बयान से संकेत मिलता है कि तेहरान केवल किसी मौजूदा व्यवस्था में शामिल होने के बजाय क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था के गठन में अपनी भूमिका चाहता है।
यहां मामला और पेचीदा हो जाता है। बीबीसी की रिपोर्ट में विश्लेषकों के हवाले से कहा गया है कि ईरान संभवतः ऐसी व्यवस्था चाहता है जिसमें क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य इंस्टॉलेशन और बेस का मुद्दा भी शामिल हो। हालांकि यह ईरान की औपचारिक घोषित सदस्यता शर्त के रूप में स्थापित नहीं है। इसे विश्लेषण और संभावित मांग के रूप में ही देखा जाना चाहिए। ईरान लंबे समय से पश्चिम एशिया में विदेशी सैन्य मौजूदगी का विरोध करता रहा है। इसलिए अगर मक्का समझौता भविष्य में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी या बेस से संबंधित प्रावधानों को शामिल करता है, तो यह सऊदी अरब और तुर्किये के लिए एक कठिन रणनीतिक सवाल बन सकता है। तीनों संस्थापक देशों ने अब तक समझौते को किसी खास देश के खिलाफ गठबंधन नहीं बताया है। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने भी कहा है कि यह समझौता ईरान या किसी अन्य देश को निशाना बनाने के लिए नहीं है।
एक दूसरा संभावित पहलू आर्थिक सिक्योरिटी है। बीबीसी से बातचीत में पूर्व डिप्लोमैट अकील नदीम ने संभावना जताई कि ईरान चाहता है कि क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था केवल सैन्य हमलों तक सीमित न रहे। उनके मुताबिक भविष्य में आर्थिक दबाव और सैंक्शंस जैसी कार्रवाइयों के खिलाफ भी सहयोग की व्यवस्था बनाई जा सकती है। यह फिलहाल एक विशेषज्ञ का आकलन है, ईरान की आधिकारिक सदस्यता शर्त नहीं। फिर भी मौजूदा भू-राजनीतिक माहौल में यह संभावना महत्वपूर्ण है। अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाया है और तेहरान पश्चिमी सैंक्शंस को अपनी अर्थव्यवस्था और विदेश नीति के लिए बड़ा खतरा मानता है। अगर मक्का समझौता आर्थिक सुरक्षा तक फैलता है, तो इसका स्वरूप केवल डिफेंस पैक्ट नहीं रहेगा। इससे पश्चिम एशिया में एक अलग क्षेत्रीय आर्थिक और सुरक्षा ब्लॉक बनने की बहस तेज हो सकती है।
सऊदी अरब और ईरान लंबे समय तक पश्चिम एशिया में रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। दोनों देशों ने 2023 में चीन की मध्यस्थता से राजनयिक संबंध बहाल किए थे, लेकिन क्षेत्रीय संघर्षों और सुरक्षा घटनाओं ने इस रिश्ते को फिर जटिल बना दिया है। मक्का समझौते में ईरान की एंट्री इस रिश्ते को एक नए स्तर पर ले जाएगी। रियाद को तय करना होगा कि तेहरान को सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था में शामिल करके क्षेत्रीय तनाव घटाने की कोशिश की जाए या मौजूदा तीन-पक्षीय ढांचे को बनाए रखा जाए। यह फैसला इसलिए भी अहम होगा क्योंकि सऊदी अरब की सुरक्षा रणनीति अभी भी अमेरिका के साथ उसके संबंधों से पूरी तरह अलग नहीं हुई है। मक्का पैक्ट को लेकर विश्लेषणों में भी इसे अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था का सीधा विकल्प नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा में अधिक रणनीतिक स्वायत्तता की कोशिश माना गया है।
ईरान की संभावित एंट्री में पाकिस्तान की भूमिका खास महत्व रखती है। इस्लामाबाद के तेहरान के साथ रिश्ते हैं और वह क्षेत्रीय तनाव में मध्यस्थता की कोशिश भी करता रहा है। 24 अगस्त को पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की ईरान यात्रा भी हुई। अल जज़ीरा के मुताबिक पाकिस्तान ने वॉशिंगटन और तेहरान के बीच संवाद के लिए चैनल उपलब्ध कराने की पेशकश की है। इसलिए पाकिस्तान एक तरफ सऊदी अरब और तुर्किये के साथ सुरक्षा समझौते का हिस्सा है, दूसरी तरफ ईरान से संवाद बनाए हुए है। यही स्थिति उसे संभावित क्षेत्रीय मध्यस्थ की भूमिका देती है।
तुर्किये भी ईरान को शामिल करने के मामले में सावधानी बरतेगा। अंकारा एक तरफ क्षेत्रीय सिक्योरिटी में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है, दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ उसके रणनीतिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। अगर ईरान की एंट्री के साथ मक्का समझौते का नैरेटिव अमेरिका-विरोधी हो जाता है, तो समझौते के मौजूदा तीनों सदस्यों के लिए रणनीतिक लागत बढ़ सकती है। बीबीसी से बात करने वाले विशेषज्ञों ने भी इसी संभावना को एक प्रमुख पेच के रूप में रेखांकित किया है। यही वजह है कि ईरान को शामिल करने का सवाल केवल सदस्यता का नहीं है। यह तय करेगा कि मक्का समझौता रक्षात्मक क्षेत्रीय मंच रहेगा या व्यापक जियोपॉलिटिकल गठजोड़ में बदलने लगेगा।
मक्का समझौते को शुरुआत से ही कई जगह “मुस्लिम नाटो” जैसी संज्ञा दी गई है। लेकिन इस तुलना को सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए।
मौजूदा समझौता तीन देशों के बीच सामूहिक रक्षा और डिटरेंस पर केंद्रित है। इसमें नाटो जैसी एकीकृत कमांड संरचना, स्थायी सैन्य ढांचा या समान स्तर की संस्थागत व्यवस्था स्थापित होने की पुष्टि नहीं हुई है। अगर मिस्र या दूसरे क्षेत्रीय देश आगे जुड़ते हैं, तो इसका दायरा बढ़ सकता है। तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोआन पहले ही संकेत दे चुके हैं कि समझौता आगे दूसरे देशों के लिए खुल सकता है। लेकिन ईरान की एंट्री इस विस्तार को अलग दिशा देगी। इससे सुन्नी और शिया शक्तियों के बीच एक साझा क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा बनाने की संभावना सामने आएगी।
भारत के लिए ईरान की संभावित एंट्री का असर सीधे सैन्य खतरे के रूप में देखना उचित नहीं होगा। असल असर पश्चिम एशिया में बदलते सिक्योरिटी समीकरण, चाबहार, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और भारत के क्षेत्रीय संपर्क हितों पर पड़ सकता है। अगर मक्का समझौता ईरान को भी शामिल करता है, तो सऊदी अरब, पाकिस्तान, तुर्किये और ईरान एक ही क्षेत्रीय सुरक्षा फ्रेमवर्क में आ सकते हैं। इससे पश्चिम एशिया की डिप्लोमैटिक गणित बदल सकती है। भारत के लिए एक संभावित सकारात्मक पहलू यह होगा कि क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता कम होने पर समुद्री व्यापार और ऊर्जा मार्गों में स्थिरता बढ़ सकती है। दूसरी तरफ, अगर यह व्यवस्था अमेरिका-विरोधी या किसी नए सैन्य ब्लॉक के रूप में विकसित होती है, तो भारत को अपनी रणनीतिक डिप्लोमेसी में नया संतुलन साधना पड़ेगा।
मौजूदा स्थिति में ईरान की मक्का समझौते में औपचारिक एंट्री नहीं हुई है। एक ईरानी अधिकारी के निमंत्रण वाले दावे और विदेश मंत्रालय के इनकार के बीच स्पष्ट अंतर है। इसलिए “ईरान मक्का पैक्ट में शामिल हो गया” कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। अभी स्थापित बात यह है कि तेहरान क्षेत्रीय सिक्योरिटी व्यवस्था में सक्रिय भूमिका चाहता है। ईरान के वरिष्ठ अधिकारी ने को-फाउंडर भूमिका की बात रखी है, जबकि विदेश मंत्रालय ने औपचारिक निमंत्रण से इनकार किया है। यानी बातचीत का दरवाजा खुला दिखाई देता है, लेकिन सदस्यता का फैसला अभी सामने नहीं आया है।
पहला संभावित रास्ता यह है कि मक्का समझौते के तीनों संस्थापक देश ईरान को बाद में सदस्य के रूप में शामिल करें। ऐसी स्थिति में तेहरान को पहले से तय फ्रेमवर्क का हिस्सा बनना होगा। दूसरा रास्ता यह है कि ईरान की को-फाउंडर मांग पर नए सिरे से क्षेत्रीय समझौता तैयार हो। ऐसा होने पर मौजूदा मक्का पैक्ट के मूल दस्तावेजों और संस्थागत ढांचे में बदलाव करना पड़ सकता है। तीसरा रास्ता यह है कि औपचारिक सदस्यता के बजाय ईरान और तीनों देशों के बीच अलग क्षेत्रीय सिक्योरिटी डायलॉग शुरू हो। मौजूदा बयानों को देखते हुए यह विकल्प भी गंभीरता से लिया जा सकता है।
मक्का रक्षा समझौते में ईरान की संभावित एंट्री पश्चिम एशिया की जियोपॉलिटिक्स में बड़ा बदलाव ला सकती है, लेकिन अभी इसे तय घटनाक्रम मानना जल्दबाजी होगी। ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने निमंत्रण मिलने और प्रस्ताव की समीक्षा की बात कही, जबकि विदेश मंत्रालय ने औपचारिक निमंत्रण से साफ इनकार किया है। तेहरान की सबसे अहम घोषित मांग को-फाउंडर का दर्जा और समझौते के मूल दस्तावेज तैयार करने में भागीदारी है। संभावित आर्थिक सैंक्शंस विरोधी व्यवस्था या अमेरिकी सैन्य ठिकानों से जुड़े प्रावधानों की चर्चा फिलहाल विशेषज्ञ आकलन के स्तर पर है, आधिकारिक शर्त के रूप में नहीं। आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ईरान की भूमिका को किस रूप में स्वीकार करते हैं। अगर चारों देश साझा सिक्योरिटी फ्रेमवर्क बनाते हैं, तो यह पश्चिम एशिया में प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के बीच एक नई क्षेत्रीय व्यवस्था की शुरुआत हो सकती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।