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मोहन भागवत का बयान: विभाजन के बाद भारत आए लोग ‘शरणार्थी नहीं, योद्धा थे’

Apurva Choudhary 2026-07-02 08:35:17
मोहन भागवत का बयान: विभाजन के बाद भारत आए लोग ‘शरणार्थी नहीं, योद्धा थे’
नागपुर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 1947 के विभाजन के बाद भारत आए विस्थापितों के संघर्ष का उल्लेख करते हुए उन्हें "संघर्ष के योद्धा" बताया। उन्होंने मूल्य-आधारित शिक्षा और समाज निर्माण में शिक्षकों की भूमिका पर भी अपने विचार रखे।
📍 स्थान: नागपुर, महाराष्ट्र
📰 दिनांक: 2 जुलाई 2026
✍️ Apurva Choudhary

विभाजन की स्मृतियों के बीच भागवत का बयान
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान भारत विभाजन से जुड़े ऐतिहासिक अनुभवों और विस्थापित समुदायों के संघर्ष का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 1947 के बाद भारत आने वाले अनेक लोगों को केवल "शरणार्थी" कहकर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्होंने अपने निर्णय और संघर्ष के माध्यम से असाधारण साहस का परिचय दिया।
भागवत का यह बयान सिंधु एजूकेशन सोसाइटी के 75वें स्थापना दिवस समारोह में आया, जहां उन्होंने विभाजन, शिक्षा और सामाजिक मूल्यों पर विस्तार से अपने विचार रखे। उनके वक्तव्य के बाद विभाजन की ऐतिहासिक स्मृतियों और विस्थापित समुदायों के योगदान पर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई।

विस्थापितों के संघर्ष पर क्या बोले भागवत
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि विभाजन के बाद भारत आने वाले अनेक परिवारों ने कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए नया जीवन शुरू किया। उनके अनुसार इन लोगों ने आर्थिक सुविधाओं से अधिक अपने विश्वास, सांस्कृतिक पहचान और भविष्य को प्राथमिकता दी।
उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को केवल विस्थापित या शरणार्थी कहकर सीमित नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार इन परिवारों ने परिस्थितियों का डटकर सामना किया और समाज के पुनर्निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सिंधी समाज के योगदान का उल्लेख
कार्यक्रम का आयोजन सिंधु एजूकेशन सोसाइटी की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर किया गया था। अपने संबोधन में भागवत ने सिंधी समाज द्वारा शिक्षा, व्यापार और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में किए गए कार्यों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि किसी भी संस्था की लंबी यात्रा केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं होती, बल्कि यह आत्ममंथन और भविष्य की दिशा तय करने का अवसर भी देती है।

शिक्षा को लेकर रखा दृष्टिकोण
मोहन भागवत ने शिक्षा व्यवस्था पर भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें जीवन-मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक व्यवहार का भी समावेश होना चाहिए।
उन्होंने शिक्षकों की भूमिका को विशेष महत्व देते हुए कहा कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में शिक्षक का आचरण उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि पाठ्यक्रम।

इतिहास और वर्तमान के बीच संवाद
भारत का विभाजन देश के इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में गिना जाता है। लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े और बड़ी संख्या में लोगों ने हिंसा तथा विस्थापन का सामना किया। इस विषय पर समय-समय पर अलग-अलग सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण सामने आते रहे हैं।
इसी संदर्भ में मोहन भागवत का यह बयान भी एक वैचारिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है। इतिहासकारों और विभिन्न सामाजिक समूहों की विभाजन को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं रही हैं, इसलिए इस विषय पर सार्वजनिक विमर्श अक्सर व्यापक बहस का कारण बनता है।

विभाजन की विरासत पर जारी बहस
विभाजन का इतिहास केवल राजनीतिक सीमाओं के पुनर्गठन की कहानी नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों के जीवन, पहचान और सामाजिक संरचना से जुड़ा अध्याय भी है। अलग-अलग समुदायों, इतिहासकारों और सार्वजनिक हस्तियों ने समय-समय पर इस घटना की अलग-अलग व्याख्या की है। ऐसे में इस विषय पर दिए गए किसी भी सार्वजनिक वक्तव्य को व्यापक ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में देखा जाता है।
मोहन भागवत के बयान को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। उनके समर्थक इसे विस्थापित परिवारों के साहस और संघर्ष को सम्मान देने वाला वक्तव्य मानते हैं, जबकि आलोचक मानते हैं कि विभाजन जैसे संवेदनशील विषय पर विभिन्न ऐतिहासिक दृष्टिकोणों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
 सार्वजनिक जीवन में ऐसे बयानों का असर
राष्ट्रीय स्तर के सार्वजनिक पदों और संगठनों से जुड़े व्यक्तियों के वक्तव्य अक्सर व्यापक चर्चा का विषय बनते हैं। ऐसे बयान केवल तत्काल राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इतिहास, शिक्षा और सामाजिक स्मृति पर भी प्रभाव डालते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि विभाजन जैसे विषयों पर संवाद करते समय ऐतिहासिक तथ्यों, मानवीय पीड़ा और विभिन्न समुदायों के अनुभवों को संतुलित रूप से सामने रखना लोकतांत्रिक विमर्श के लिए आवश्यक है।
 शिक्षा और सामाजिक मूल्यों पर संदेश
अपने संबोधन में भागवत ने शिक्षा को समाज निर्माण का प्रमुख आधार बताया। उन्होंने कहा कि विद्यालय और शिक्षण संस्थान केवल ज्ञान देने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक तैयार करने की भी भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने मूल्य-आधारित शिक्षा पर बल देते हुए कहा कि विद्यार्थियों के सामने शिक्षकों का व्यवहार और आचरण भी प्रेरणा का महत्वपूर्ण स्रोत होता है। उनके अनुसार समाज के प्रति संवेदनशील और उत्तरदायी पीढ़ी तैयार करना शिक्षा का मूल उद्देश्य होना चाहिए।
आगे की दिशा
विभाजन की स्मृतियां आज भी भारतीय समाज और उपमहाद्वीप के सामूहिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे विषयों पर होने वाले सार्वजनिक वक्तव्य नई बहसों को जन्म देते हैं और अतीत को समझने के अलग-अलग दृष्टिकोण सामने लाते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि ऐतिहासिक घटनाओं पर स्वस्थ और तथ्याधारित चर्चा लोकतांत्रिक समाज को अधिक परिपक्व बनाती है। साथ ही, यह आवश्यक है कि ऐसे विमर्श में सभी पक्षों की संवेदनाओं और ऐतिहासिक तथ्यों का सम्मान बना रहे।

नागपुर में दिए गए अपने संबोधन में मोहन भागवत ने विभाजन के बाद भारत आए विस्थापितों के संघर्ष, सिंधी समाज के योगदान और मूल्य-आधारित शिक्षा पर अपने विचार रखे। उनका "शरणार्थी नहीं, संघर्ष के योद्धा" वाला बयान सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया है। विभाजन जैसे ऐतिहासिक विषय पर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं, इसलिए ऐसे बयानों का मूल्यांकन व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ और तथ्यों के साथ किया जाना चाहिए

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Apurva Choudhary

Apurva Choudhary

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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