NCPCR के देशव्यापी अभियान में 3,800 से ज्यादा बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराया गया और 575 से अधिक FIR दर्ज हुईं। 12 जून से 31 अगस्त तक चले अभियान में उत्तर प्रदेश से 1,480, राजस्थान से 804 और गुजरात से 630 बच्चों का रेस्क्यू हुआ। पुनर्वास और शिक्षा पर भी जोर दिया गया।
Location: नई दिल्ली | Date: 4 सितंबर 2026 | Byline: Apurva Choudhary
बाल श्रम के खिलाफ राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग यानी NCPCR की विशेष मुहिम में 3,800 से ज्यादा बच्चों को रेस्क्यू किया गया है। 12 जून से 31 अगस्त 2026 तक चले इस अभियान के दौरान 575 से अधिक FIR भी दर्ज की गईं। केंद्र सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के मुताबिक अभियान का मकसद सिर्फ बच्चों को काम से बाहर निकालना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित माहौल, पुनर्वास और शिक्षा से जोड़ना भी था।
NCPCR ने इस विशेष अभियान को “Pan-India Rescue and Rehabilitation Campaign” के तौर पर चलाया। आयोग ने राज्य सरकारों, केंद्रशासित प्रदेशों, जिला प्रशासन, श्रम विभाग, पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर बाल श्रम और मानव तस्करी के लिहाज से संवेदनशील इलाकों में कार्रवाई तेज करने को कहा था।
अभियान के दौरान 3,800 से ज्यादा बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराया गया। इसके साथ ही 575 से अधिक मामलों में FIR दर्ज हुईं। NCPCR ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से रेस्क्यू किए गए बच्चों, दर्ज FIR, पुनर्वास, परिवार में वापसी, शिक्षा से जोड़ने और मुआवजे से संबंधित जानकारी नियमित तौर पर साझा करने को कहा था।
यह आंकड़ा इस मायने में अहम है कि अभियान का फोकस केवल छापेमारी और रेस्क्यू तक सीमित नहीं रखा गया। आयोग ने रेस्क्यू के बाद बच्चों की स्थिति पर फॉलो-अप और उनके पुनर्वास की निगरानी पर भी जोर दिया, ताकि बच्चे दोबारा बाल श्रम के चक्र में न लौटें।
राज्यों में उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा 1,480 बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराया गया। इसके बाद राजस्थान में 804 और गुजरात में 630 बच्चों का रेस्क्यू किया गया। उपलब्ध रिपोर्टों में इन तीन राज्यों को अभियान के दौरान सबसे अधिक रेस्क्यू वाले राज्यों में बताया गया है।
इन आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि बड़े और श्रम-प्रधान राज्यों में बाल श्रम से जुड़े जोखिम वाले इलाकों पर विशेष निगरानी की जरूरत बनी हुई है। हालांकि केवल रेस्क्यू की संख्या के आधार पर किसी राज्य में बाल श्रम की कुल स्थिति या प्रवृत्ति का अंतिम आकलन करना उचित नहीं होगा, क्योंकि अभियान की पहुंच, कार्रवाई की तीव्रता और रिपोर्टिंग व्यवस्था भी आंकड़ों को प्रभावित करती है।
NCPCR ने अभियान के तहत राज्यों और संबंधित प्रशासन को बाल श्रम तथा मानव तस्करी के हॉटस्पॉट की पहचान कर लक्षित कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। इसका मकसद ऐसे स्थानों तक पहुंचना था जहां बच्चे श्रम, तस्करी या अन्य प्रकार के शोषण के जोखिम में हो सकते हैं।
जिला प्रशासन के साथ बैठकों के जरिए अभियान की प्रगति की समीक्षा भी की गई। इन बैठकों में रेस्क्यू ऑपरेशन से जुड़ी जमीनी दिक्कतों, विभागों के बीच समन्वय और Action Taken Reports यानी ATR समय पर भेजने जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई।
अभियान के दौरान 575 से अधिक FIR दर्ज होना कार्रवाई के कानूनी पहलू को भी सामने लाता है। इसका अर्थ यह है कि कई मामलों में बच्चों को रेस्क्यू करने के साथ संबंधित परिस्थितियों में आपराधिक कार्रवाई की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई गई।
हालांकि FIR दर्ज होना अपने आप में किसी व्यक्ति के दोषी साबित होने का प्रमाण नहीं है। संबंधित मामलों में जांच, साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही कानूनी जिम्मेदारी तय होगी। इसलिए अभियान के आंकड़ों को कार्रवाई के स्तर के रूप में देखना चाहिए, न कि सभी मामलों में दोष सिद्ध होने के रूप में।
बाल श्रम से बच्चे को बाहर निकालना पहली जरूरत है, लेकिन इसके बाद की प्रक्रिया उतनी ही महत्वपूर्ण है। NCPCR ने अभियान में पुनर्वास, परिवार में बहाली, शिक्षा से जोड़ने और मुआवजे जैसे फॉलो-अप उपायों की जानकारी भी मांगी थी।
अगर रेस्क्यू किए गए बच्चे को सुरक्षित आवास, परिवार का सहयोग, स्कूल में दाखिला और आर्थिक-सामाजिक सहायता नहीं मिलती, तो उसके दोबारा श्रम में जाने का जोखिम बना रह सकता है। इसी वजह से बाल संरक्षण व्यवस्था में रेस्क्यू के बाद की निगरानी को महत्वपूर्ण माना जाता है।
NCPCR ने कार्रवाई के साथ जागरूकता और आउटरीच गतिविधियां भी चलाईं। सोशल मीडिया और अन्य संचार माध्यमों के जरिए लोगों को बाल श्रम की सूचना देने तथा बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा से जोड़ने के महत्व के बारे में जानकारी दी गई।
इसका उद्देश्य प्रशासनिक कार्रवाई को सामाजिक भागीदारी से जोड़ना था। बाल श्रम के कई मामलों की पहचान स्थानीय स्तर पर ही संभव होती है, इसलिए नागरिकों, स्कूलों, स्थानीय प्रशासन और पुलिस के बीच सूचना का तंत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
नहीं। 3,800 से ज्यादा बच्चों का रेस्क्यू इस विशेष अभियान के दौरान हुई कार्रवाई का आंकड़ा है। इसे देश में बाल श्रम करने वाले बच्चों की कुल संख्या नहीं माना जा सकता।
यह अभियान विशेष रूप से पहचाने गए संवेदनशील इलाकों और प्रशासनिक कार्रवाई पर केंद्रित था। इसलिए इसके आंकड़े यह बताते हैं कि अभियान के दौरान कितने बच्चों तक कार्रवाई पहुंची, न कि देश में बाल श्रम की पूरी तस्वीर।
अभियान समाप्त होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि रेस्क्यू किए गए बच्चों का पुनर्वास किस स्तर तक हुआ और कितने बच्चों को स्थायी तौर पर शिक्षा या सुरक्षित पारिवारिक माहौल से जोड़ा जा सका। NCPCR ने राज्यों से इसी तरह की फॉलो-अप जानकारी मांगी है।
साथ ही, दर्ज FIR में जांच की प्रगति और कानूनी कार्रवाई की स्थिति भी आगे की तस्वीर स्पष्ट करेगी। बाल श्रम के खिलाफ प्रभावी नीति के लिए रेस्क्यू, कानून का प्रवर्तन, परिवारों की सामाजिक-आर्थिक सहायता और शिक्षा—इन सभी मोर्चों पर लगातार काम जरूरी है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।