गुरुवार, 03 September 2026
GOLD ₹0 ▼ 0%
SENSEX 0 ▼ 0%
BITCOIN $0 ▼ 0%
38°C मुजफ्फरनगर
EDITION:
BREAKING
#ShahTimes #Muzaffarnagar #Bijnor #Moradabad #BreakingNews #Politics #Education #Crime #Sports #Business
Book Your Ads With Shah Times
India

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी-राजस्थान के सरकारी स्कूलों में मीडिया प्रवेश पर रोक को चुनौती देने वाली याचिका ठुकराई

Mohammad Naved 2026-09-03 12:41:18
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी-राजस्थान के सरकारी स्कूलों में मीडिया प्रवेश पर रोक को चुनौती देने वाली याचिका ठुकराई

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में पत्रकारों, यूट्यूबर्स और सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रवेश व रिकॉर्डिंग पर रोक को चुनौती देने वाली याचिका सुनने से इनकार किया।

📍 नई दिल्ली

🗓️ 3 सितंबर 2026

✍️ By Mohd Naved

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों, पत्रकारों, यूट्यूबर्स, सोशल मीडिया से जुड़े लोगों और सिविल सोसायटी प्रतिनिधियों के प्रवेश पर लागू पाबंदियों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने याचिका को संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुनने के लिए उपयुक्त नहीं माना।

यह मामला सरकारी स्कूलों की स्थिति के सार्वजनिक दस्तावेजीकरण, पत्रकारिता की स्वतंत्रता और बच्चों की निजता तथा सुरक्षा के बीच संतुलन से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को रिकॉर्ड करने पर व्यापक रोक सार्वजनिक हित में जानकारी जुटाने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

3 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने याचिका पर विचार किया। पीठ ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस रिट याचिका को सुनने के लिए इच्छुक नहीं है। इसके बाद याचिका को आगे सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं किया गया।

इस आदेश का सीधा अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका के जरिए संबंधित राज्य सरकारों के आदेशों की संवैधानिक वैधता पर विस्तृत फैसला नहीं दिया। इसलिए इसे इन पाबंदियों को सर्वोच्च अदालत द्वारा पूरी तरह वैध ठहराए जाने के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा।

विवाद की शुरुआत कहां से हुई

राजस्थान के शिक्षा विभाग ने 16 अगस्त 2026 को एक परिपत्र जारी किया था। इसके तहत सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश के लिए प्रधानाचार्य से पूर्व अनुमति लेने की व्यवस्था की गई। फोटो, वीडियो, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइव स्ट्रीमिंग के लिए भी पूर्व लिखित अनुमति जरूरी बताई गई।

उत्तर प्रदेश में अयोध्या के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से 19 अगस्त 2026 को आदेश जारी किया गया। इसमें बाहरी लोगों, यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया से जुड़े व्यक्तियों को सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना परिषद के स्कूलों में प्रवेश करने तथा फोटो या वीडियो बनाने से रोका गया। याचिका में आरोप लगाया गया कि उत्तर प्रदेश के कुछ अन्य जिलों में भी इसी तरह के निर्देश जारी किए गए थे।

प्रशासन की दलील

उत्तर प्रदेश के आदेश में शिक्षा विभाग ने अनधिकृत प्रवेश और स्कूल परिसर में रिकॉर्डिंग को शिक्षण प्रक्रिया में व्यवधान से जोड़ते हुए आपत्ति जताई थी। विभाग का कहना था कि स्कूलों में बिना अनुमति फोटो और वीडियो बनाए जाने तथा उन्हें सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जाने से शिक्षकों और स्कूल की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है।

राजस्थान के आदेश में भी स्कूल परिसर में बाहरी लोगों की आवाजाही और रिकॉर्डिंग के लिए अनुमति की व्यवस्था लागू की गई। सरकारी पक्ष का व्यापक तर्क बच्चों की सुरक्षा, स्कूल के अनुशासन और शिक्षण वातावरण से जुड़ा रहा है।

याचिकाकर्ता की आपत्ति

याचिका प्रिय मिश्रा की ओर से दाखिल की गई थी। अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा के जरिए इसे सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा गया। याचिकाकर्ता ने राजस्थान और उत्तर प्रदेश के आदेशों के उन हिस्सों को चुनौती दी जिनसे सरकारी स्कूलों में सार्वजनिक हित से जुड़ी रिपोर्टिंग और दस्तावेजीकरण पर व्यापक रोक लगने का आरोप था।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 19(1)(g), 21 और 21-A के अधिकारों का हवाला दिया गया। इसमें तर्क दिया गया कि सरकारी स्कूल सार्वजनिक संस्थान हैं और उनके बुनियादी ढांचे, शिक्षा व्यवस्था और सुविधाओं से संबंधित तथ्य सार्वजनिक हित का विषय हैं।

याचिका में एक अहम फर्क भी रखा गया था। इसके मुताबिक बच्चों की पहचान, निजता और सुरक्षा की रक्षा करना अलग मुद्दा है, जबकि खाली कक्षाओं, खराब भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली, फर्नीचर और अन्य बुनियादी सुविधाओं की स्थिति का दस्तावेजीकरण अलग विषय है। याचिकाकर्ता ने कहा था कि बच्चों की सुरक्षा के नाम पर हर तरह के सार्वजनिक हित वाले दस्तावेजीकरण पर रोक नहीं लगनी चाहिए।

स्कूल ठीक करो अभियान का संदर्भ

इस पूरे विवाद का संदर्भ स्कूल ठीक करो अभियान से भी जुड़ा रहा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह अभियान कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़ा है और इसका मकसद सरकारी स्कूलों की बुनियादी स्थिति को सामने लाना है। अभियान से जुड़े लोग स्कूलों में टूटे शौचालय, खराब भवन, पेयजल, फर्नीचर और दूसरी सुविधाओं से संबंधित स्थिति रिकॉर्ड करने की कोशिश कर रहे थे।

यहां एक जरूरी तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। इस अभियान को भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा शुरू किया गया अभियान बताना सही नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टें इसे कॉकरोच जनता पार्टी के अभियान के रूप में दर्ज करती हैं। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने याचिका को 25 अगस्त को शुरुआती तौर पर तत्काल सूचीबद्ध करने की मांग रखी गई थी। बाद में 3 सितंबर को याचिका पर न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने सुनवाई की और उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

पत्रकारिता और सार्वजनिक निगरानी का सवाल

मामले का व्यापक पहलू सरकारी संस्थानों की सार्वजनिक निगरानी से जुड़ा है। सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ते हैं और इन संस्थानों पर सार्वजनिक धन खर्च होता है। इसलिए स्कूल भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली, फर्नीचर और दूसरी सुविधाओं की स्थिति सार्वजनिक चर्चा का विषय बनती है।

दूसरी तरफ स्कूल सामान्य सार्वजनिक स्थल की तरह नहीं होते। वहां बच्चे मौजूद रहते हैं। उनकी पहचान, निजी जानकारी और सुरक्षा से जुड़े जोखिम अलग प्रकृति के होते हैं। बिना अनुमति वीडियो रिकॉर्डिंग में बच्चों के चेहरे, आवाज और व्यक्तिगत परिस्थितियां सार्वजनिक होने की आशंका रहती है।

इसी वजह से विवाद केवल पत्रकारों के प्रवेश का सवाल नहीं है। असल मसला यह है कि सार्वजनिक हित वाली रिपोर्टिंग के लिए किस तरह की अनुमति व्यवस्था हो और बच्चों की सुरक्षा के लिए कौन-सी स्पष्ट सीमाएं तय की जाएं।

उत्तर प्रदेश में स्थिति

अयोध्या के आदेश के मुताबिक बाहरी लोगों, यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों को सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना परिषद स्कूलों में प्रवेश और रिकॉर्डिंग की अनुमति नहीं थी। विभाग ने यह भी कहा था कि स्कूलों की निगरानी के लिए सरकारी स्तर पर अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है और वे नियमित निरीक्षण कर रहे हैं।

याचिका में हालांकि यह सवाल उठाया गया कि सरकारी निरीक्षण व्यवस्था के साथ स्वतंत्र सार्वजनिक निगरानी की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। खास तौर पर उन मामलों में जहां स्थानीय स्तर पर स्कूल की वास्तविक स्थिति और प्रशासनिक दावों के बीच अंतर होने का आरोप सामने आता है।

राजस्थान में विवाद

राजस्थान में 16 अगस्त के परिपत्र के बाद स्कूल परिसरों में बाहरी लोगों के प्रवेश और रिकॉर्डिंग को लेकर अनुमति व्यवस्था लागू हुई। यह घटनाक्रम स्कूलों की खराब स्थिति को सामने लाने वाले अभियान के बीच आया।

इससे शिक्षा व्यवस्था की निगरानी को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हुई। समर्थकों का तर्क रहा कि स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने आनी चाहिए, जबकि प्रशासनिक दृष्टिकोण बच्चों की सुरक्षा, स्कूल अनुशासन और शिक्षण प्रक्रिया की निरंतरता पर जोर देता है।

अदालत के फैसले का मतलब

सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका सुनने से इनकार किए जाने के बाद फिलहाल इस याचिका के जरिए राजस्थान और उत्तर प्रदेश के संबंधित आदेशों को रद्द कराने का रास्ता बंद हो गया है। लेकिन इससे सार्वजनिक हित में स्कूलों की रिपोर्टिंग, मीडिया की भूमिका और बच्चों की निजता से जुड़ी बहस खत्म नहीं होती।

यह भी महत्वपूर्ण है कि अदालत ने उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक इन पाबंदियों पर व्यापक संवैधानिक घोषणा नहीं की। इसलिए फैसले को पत्रकारों के स्कूलों में प्रवेश या रिकॉर्डिंग के अधिकार पर अंतिम संवैधानिक फैसला मानना सही नहीं होगा।

आगे क्या

अब संबंधित राज्य प्रशासन और शिक्षा विभागों के सामने चुनौती यह है कि स्कूलों की सुरक्षा और अनुशासन कायम रखते हुए पारदर्शिता के लिए प्रभावी व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए। पत्रकारों और नागरिक संगठनों के लिए स्पष्ट अनुमति प्रक्रिया, समयबद्ध जवाब और सार्वजनिक हित वाली रिपोर्टिंग के लिए तय दिशा-निर्देश इस विवाद को कम कर सकते हैं।

स्कूलों की स्थिति का स्वतंत्र आकलन तभी प्रभावी होगा जब निरीक्षण व्यवस्था विश्वसनीय, नियमित और जवाबदेह हो। साथ ही बच्चों की पहचान और निजी जानकारी की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का संदेश सीमित दायरे में है। अदालत ने इस विशेष जनहित याचिका को अनुच्छेद 32 के तहत सुनने से इनकार किया है। सरकारी स्कूलों की स्थिति, मीडिया की निगरानी भूमिका और बच्चों की सुरक्षा के बीच संतुलन पर बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।

वीडियो देखें

ADVERTISEMENT
Mohammad Naved

Mohammad Naved

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

BREAKING NEWS

संबंधित खबरें

जस्टिस वर्मा केस: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज

2026-08-07 17:23:02

जंतर-मंतर के विकल्प पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई, प्रदर्शन अधिकार पर नई बहस

2026-08-03 15:50:09

CEC Selection Controversy: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा- CJI को बाहर क्यों रखा?

2026-07-31 13:46:08

सुप्रीम कोर्ट ने शिंदे गुट के विधायकों की अयोग्यता पर क्या कहा? सिब्बल की दलील पर अदालत का अहम रुख

2026-08-20 12:44:58

अभिनंदन वर्धमान की नई उड़ान, वायुसेना से रिटायरमेंट के बाद FLY91 में बने कमर्शियल पायलट

2026-09-03 12:01:58

CJP का 5 सितंबर मार्च नहीं रुकेगा, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल रोक से किया इनकार

2026-09-01 15:06:36

सीजेपी प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ा मोड़, 5 राज्यों ने एफआईआर वापस लेने की मांग रखी

2026-09-01 13:09:12

अब हर साल होगा पायलटों का डोप टेस्ट? DGCA कर रहा 100% टेस्टिंग पर मंथन

2026-08-25 14:46:25

TRENDING

ताज़ा ख़बरें
BREAKING NEWS
ADVERTISEMENT

Your Ad Here
TRENDING
आज का ई-पेपर
मुजफ्फरनगर (12 पेज)
बिजनौर (10 पेज)
सहारनपुर (11 पेज)
मुरादाबाद (14 पेज)
Home Video Epaper Reel Menu
Chat With Us
SHAH TIMES
ख़बरें छुपाता नहीं, छापता है
🏠 होम ⚡ ब्रेकिंग न्यूज़ 📰 ताज़ा खबरें 🇮🇳 देश 🌍 दुनिया 🏛 राजनीति 🚔 क्राइम 📈 बिजनेस 🏏 स्पोर्ट्स 🎓 शिक्षा ❤️ स्वास्थ्य 📰 ई-पेपर