CEC Selection Controversy: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा- CJI को बाहर क्यों रखा?
Asif Khan
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2026-07-31 13:46:08
CEC चयन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब
चुनाव आयोग की नियुक्ति पर बड़ा सवाल, अदालत ने सरकार को घेरा
CJI को हटाने का आधार क्या? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। अदालत ने पूछा कि चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाने का संवैधानिक औचित्य क्या है। मामला चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है।
नई दिल्ली
31 जुलाई 2026
आसिफ खान
सीईसी चयन समिति पर सुप्रीम कोर्ट के सवालों ने नई बहस छेड़ी
देश की सबसे अहम संवैधानिक संस्थाओं में शामिल चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया एक बार फिर न्यायिक समीक्षा के दायरे में है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखने का संवैधानिक आधार क्या है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ़ कहा कि लोकतंत्र में केवल स्वतंत्र संस्थाएं होना ही काफी नहीं है, बल्कि जनता के बीच उनका स्वतंत्र दिखाई देना भी उतना ही ज़रूरी है। यही टिप्पणी इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बनकर सामने आई।
क्या है पूरा मामला
2023 में संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा नया कानून पारित किया था। इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि जब तक संसद नया कानून नहीं बनाती, तब तक चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल रहेंगे।
नए कानून में मुख्य न्यायाधीश की जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल किए जाने के बाद इस व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
सुनवाई के दौरान अदालत ने क्या कहा
सुनवाई के दौरान पीठ ने केंद्र सरकार से कई अहम सवाल पूछे। अदालत ने जानना चाहा कि जब पहले न्यायपालिका की मौजूदगी को संस्थागत संतुलन का हिस्सा माना गया था, तब उसे हटाने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई।
पीठ ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है। इसलिए उसकी नियुक्ति प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिस पर किसी भी तरह का संदेह पैदा न हो।
केंद्र सरकार की दलील
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि संविधान में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं है कि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश हों।
उन्होंने दलील दी कि प्रधानमंत्री एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को उनके निर्णयों पर विश्वास होना चाहिए। केंद्र का कहना था कि संसद को नियुक्ति प्रक्रिया तय करने का अधिकार प्राप्त है और नया कानून उसी अधिकार के तहत बनाया गया है।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चयन समिति में न्यायपालिका की मौजूदगी संस्थागत संतुलन सुनिश्चित करती है। यदि पूरी प्रक्रिया में कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ता है तो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
उनका तर्क है कि चुनाव आयोग सरकार के चुनावों की निगरानी करता है। इसलिए उसकी नियुक्ति प्रक्रिया में अधिकतम पारदर्शिता और संतुलन होना चाहिए।
पृष्ठभूमि
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र संवैधानिक संस्था का दर्जा देता है। लंबे समय तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति केवल केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती रही।
मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर CJI को चयन समिति में शामिल करने का निर्देश दिया था। बाद में संसद ने नया कानून बनाकर इस व्यवस्था को बदल दिया।
राजनीतिक और संवैधानिक महत्व
यह मामला केवल नियुक्ति प्रक्रिया का विवाद नहीं है। इसका सीधा संबंध लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है।
यदि सुप्रीम कोर्ट इस कानून को बरकरार रखता है तो भविष्य में नियुक्तियों का वर्तमान ढांचा जारी रहेगा। यदि अदालत कानून में बदलाव की आवश्यकता महसूस करती है तो संसद को नई व्यवस्था बनानी पड़ सकती है।
क्या केवल न्यायपालिका की मौजूदगी ही समाधान है?
इस बहस का दूसरा पक्ष भी है। कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी संस्था की स्वतंत्रता केवल चयन समिति की संरचना से तय नहीं होती। नियुक्ति के बाद कार्यकाल की सुरक्षा, हटाने की प्रक्रिया और संस्थागत स्वायत्तता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
दूसरी ओर कई विशेषज्ञ मानते हैं कि चयन प्रक्रिया में विविध संस्थाओं की भागीदारी जनता का विश्वास मजबूत करती है और संभावित टकराव की आशंकाओं को कम करती है।
आगे क्या होगा
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख सकता है या आगे की सुनवाई तय कर सकता है। अंतिम निर्णय केवल चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि भविष्य में संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़े मानकों को भी प्रभावित कर सकता है।
सम्पादकीय दृष्टिकोण
सीईसी चयन समिति को लेकर चल रही यह कानूनी लड़ाई केवल एक नियुक्ति प्रक्रिया का मामला नहीं है। यह उस भरोसे की परीक्षा भी है जिस पर भारतीय लोकतंत्र की संस्थाएं खड़ी हैं। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने वाले वर्षों में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और संवैधानिक संतुलन की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है।
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Asif Khan
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।