CJP का 5 सितंबर मार्च नहीं रुकेगा, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल रोक से किया इनकार
Mohammad Naved
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2026-09-01 15:06:36
📍 नई दिल्ली 🗓️ 1 सितंबर 2026 ✍️Mohd Naved
सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर के CJP मार्च पर तत्काल रोक नहीं लगाई। CJI सूर्यकांत ने कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी प्रशासन
पर छोड़ी और शांतिपूर्ण प्रदर्शन की उम्मीद जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने CJP के 5 सितंबर मार्च पर रोक लगाने से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP की ओर से 5 सितंबर को प्रस्तावित विरोध मार्च पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई आधार सामने नहीं है, जिससे यह माना जाए कि प्रदर्शन से कोई अप्रिय स्थिति पैदा होगी।
अदालत ने साफ किया कि मार्च के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार और पुलिस की जिम्मेदारी है। अदालत ने संबंधित पक्षों को प्रशासन के साथ पहले बातचीत करने को कहा है।
क्या है 5 सितंबर के मार्च का मामला
CJP ने 24 अगस्त को 5 सितंबर को नई दिल्ली में विरोध मार्च का ऐलान किया था। संगठन के मुताबिक मार्च इंडिया गेट से शुरू होकर नई दिल्ली पुलिस मुख्यालय की ओर जाएगा। CJP ने इसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन बताया है।
संगठन के प्रवक्ता सौरव दास ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार ने 25 जुलाई को युवाओं और प्रदर्शनकारियों से किए गए कुछ आश्वासनों को पूरी तरह लागू नहीं किया है। इसी के बाद CJP ने दोबारा सड़कों पर उतरने का फैसला किया।
CJP के मुताबिक प्रस्तावित मार्च में उन छात्रों के परिवारों की भागीदारी होगी, जिनकी मौत के मामलों को संगठन ने NEET विवाद से जोड़ा है। जुलाई में पुलिस कार्रवाई के कथित पीड़ितों को भी मार्च में शामिल करने की बात कही गई है। इन दावों को संगठन के बयान के तौर पर देखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ
31 अगस्त को मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने हुई। याचिका में 5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च को लेकर अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई थी।
पीठ ने तत्काल कोई रोक लगाने वाला आदेश जारी नहीं किया। अदालत का रुख यह रहा कि फिलहाल प्रदर्शन से किसी अप्रिय घटना की आशंका मानने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि फिलहाल अदालत यह उम्मीद करेगी कि सभी पक्ष जिम्मेदारी के साथ और शांतिपूर्ण तरीके से काम करेंगे। अदालत ने केंद्र और दिल्ली सरकार की जिम्मेदारी पर भरोसा जताते हुए कानून के दायरे में कार्रवाई की उम्मीद व्यक्त की।
कानून-व्यवस्था का फैसला प्रशासन पर
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कानून-व्यवस्था और नीतिगत पहलुओं को अलग-अलग देखने की जरूरत बताई। अदालत ने संकेत दिया कि किसी प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर सुरक्षा और व्यवस्था संबंधी फैसला संबंधित अधिकारियों को लेना चाहिए।
इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने मार्च को किसी विशेष तरीके से आयोजित करने की अनुमति दे दी है। अदालत ने तत्काल न्यायिक रोक लगाने से इनकार किया है और कानून-व्यवस्था संबंधी जिम्मेदारी प्रशासन पर छोड़ी है।
पीठ ने यह भी कहा कि अगर परिस्थितियां गंभीर या चिंताजनक होती हैं, तो याचिकाकर्ता दोबारा अदालत का रुख कर सकता है। मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर को निर्धारित है।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई
CJP ने जून और जुलाई में NEET परीक्षा से जुड़े कथित अनियमितताओं तथा पेपर लीक के मुद्दे पर दिल्ली के जंतर-मंतर से आंदोलन शुरू किया था। यह आंदोलन बाद में दूसरे हिस्सों तक भी पहुंचा।
25 जुलाई को बातचीत के बाद आंदोलन वापस लिया गया था। उस समय CJP की ओर से कहा गया था कि सरकार के साथ हुए समझौते और आश्वासनों के आधार पर आंदोलन को वापस लिया जा रहा है। बाद में संगठन ने आरोप लगाया कि कुछ अहम मुद्दों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
इनमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी से जुड़े मामले और लिखित आश्वासन जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
FIR को लेकर बढ़ा विवाद
प्रस्तावित मार्च के पीछे प्राथमिकी वापस लेने का मुद्दा भी अहम है। CJP का आरोप रहा है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर सरकार ने 25 जुलाई की समझ के अनुरूप पर्याप्त कदम नहीं उठाए।
इसी बीच दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि जुलाई के विरोध प्रदर्शनों से जुड़े 13 मामलों को आगे नहीं बढ़ाने की इच्छा है। पुलिस ने यह भी कहा कि 20 से 25 जुलाई के बीच हुए प्रदर्शनों के संबंध में नई प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाएगी, जबकि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के मामले अलग तरीके से देखे जाएंगे।
यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है क्योंकि CJP की प्रमुख मांगों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR से जुड़ा विवाद भी शामिल रहा है।
CJP का पक्ष
CJP प्रवक्ता सौरव दास ने 5 सितंबर के मार्च को शांतिपूर्ण बताया है। संगठन का कहना है कि सरकार द्वारा किए गए आश्वासनों को लागू किए जाने की मांग को लेकर यह प्रदर्शन किया जा रहा है।
CJP ने सरकार पर युवाओं के साथ विश्वासघात का आरोप लगाया है। हालांकि, यह संगठन का राजनीतिक आरोप है। इसे स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, सरकार और प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्राथमिक जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी पहलू को प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में रखा है।
अब आगे क्या होगा
5 सितंबर का प्रस्तावित मार्च अब प्रशासनिक तैयारी और कानून-व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई पूर्व-प्रतिबंध नहीं लगाया है।
इसका मतलब यह है कि प्रदर्शन के दौरान शांति बनाए रखना आयोजकों, प्रतिभागियों और प्रशासन, सभी की जिम्मेदारी होगी। किसी भी स्थिति में कानून का पालन करना आवश्यक रहेगा।
10 सितंबर की अगली सुनवाई में अदालत के सामने घटनाक्रम की आगे की स्थिति आ सकती है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का संदेश स्पष्ट है कि बिना ठोस आधार के किसी प्रदर्शन पर पहले से रोक लगाने की जरूरत नहीं है, जबकि कानून-व्यवस्था का तत्काल प्रबंधन प्रशासनिक तंत्र को करना होगा।
व्यापक संदर्भ
इस पूरे मामले में दो संवैधानिक पहलू साथ-साथ दिखाई देते हैं। एक तरफ शांतिपूर्ण विरोध और अपनी मांग रखने का अधिकार है। दूसरी तरफ सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा रुख इन दोनों के बीच संतुलन पर आधारित दिखाई देता है। अदालत ने प्रदर्शन पर तत्काल रोक नहीं लगाई, लेकिन आयोजकों और प्रशासन से कानूनी दायरे में शांतिपूर्ण आचरण की अपेक्षा भी रखी है।
5 सितंबर का मार्च इसलिए भी अहम है क्योंकि यह जुलाई के आंदोलन के बाद CJP की दोबारा सक्रियता को दर्शाता है। अब निगाहें प्रशासन की तैयारियों, प्रदर्शन के स्वरूप और 10 सितंबर की न्यायिक सुनवाई पर रहेंगी।
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Mohammad Naved
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।