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सीजेपी प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ा मोड़, 5 राज्यों ने एफआईआर वापस लेने की मांग रखी

Mohammad Naved • 2026-09-01 13:09:12
सीजेपी प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ा मोड़, 5 राज्यों ने एफआईआर वापस लेने की मांग रखी

📍 नई दिल्ली

🗓️ 1 सितंबर 2026

✍️ Mohd Naved

केंद्र के बाद 4 राज्यों ने भी सीजेपी प्रदर्शन से जुड़ी एफआईआर खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। अदालत अनुच्छेद 142 के तहत मामले पर सुनवाई करेगी।


सीजेपी प्रदर्शन मामले में नया मोड़

सीजेपी के जुलाई में हुए प्रदर्शनों से जुड़े आपराधिक मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को अहम सुनवाई होनी है। केंद्र सरकार की ओर से दिल्ली पुलिस ने 13 एफआईआर खत्म करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शीर्ष अदालत से राहत मांगी है। इसके बाद महाराष्ट्र, असम, पश्चिम बंगाल और बिहार ने भी अपने-अपने राज्यों से जुड़े मामलों में एफआईआर वापस लेने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

यह घटनाक्रम सीजेपी के 5 सितंबर को प्रस्तावित दिल्ली मार्च से पहले सामने आया है। संगठन का आरोप है कि सरकार ने जुलाई में आंदोलन खत्म कराने के दौरान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने को लेकर जो भरोसा दिया था, उसे पूरी तरह लागू नहीं किया गया।


केंद्र ने अनुच्छेद 142 का सहारा क्यों लिया

सोमवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने मामले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सरकार एफआईआर खत्म करने के लिए अंतरिम आवेदन दाखिल करना चाहती है और इस मामले में अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया जा रहा है। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।

अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को लंबित मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश जारी करने की असाधारण संवैधानिक शक्ति देता है। इस प्रावधान का इस्तेमाल परिस्थितियों के आधार पर व्यापक न्यायिक राहत देने के लिए किया जाता है।

दिल्ली पुलिस ने अदालत में कहा है कि वह जुलाई के प्रदर्शनों से जुड़ी 13 एफआईआर को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। इन मामलों में दंगा, हत्या के प्रयास और संपत्ति को नुकसान जैसे आरोप शामिल हैं। पुलिस ने अदालत से इन एफआईआर को खत्म करने की अनुमति मांगी है।


2,873 लोगों को लेकर अलग रुख

सरकार की मांग पूरी तरह सभी प्रदर्शनकारियों को आपराधिक कार्रवाई से बाहर करने वाली नहीं है। दिल्ली पुलिस ने 2,873 ऐसे लोगों को अलग रखने का प्रस्ताव दिया है, जिनके बारे में पुलिस के अनुसार गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि सामने आई है। इन लोगों की कथित भूमिका की अलग से जांच की बात कही गई है।

पुलिस ने प्रस्ताव रखा है कि मौजूदा मामलों के स्थान पर इन लोगों से संबंधित आरोपों की जांच के लिए एक अलग और केंद्रित एफआईआर दर्ज की जाए। पुलिस के मुताबिक इसका मकसद गंभीर आपराधिक आरोपों से जुड़े मामलों की जांच को अलग रखना है।

इसका अर्थ यह है कि सरकार प्रदर्शन में शामिल सभी लोगों के खिलाफ एक समान कार्रवाई समाप्त करने की दिशा में नहीं बढ़ रही है। गंभीर आपराधिक मामलों से जुड़े लोगों को अलग कानूनी प्रक्रिया में रखने का प्रस्ताव सामने आया है।


4 राज्यों ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया

मंगलवार को महाराष्ट्र, असम, पश्चिम बंगाल और बिहार की ओर से भी अलग-अलग आवेदन दाखिल किए गए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को इसकी जानकारी दी और अनुरोध किया कि इन सभी आवेदनों को एक साथ सुना जाए। मुख्य न्यायाधीश ने इन्हें साथ लेने पर सहमति जताई, हालांकि राज्यों को अपने आवेदन में किसी तकनीकी कमी को दूर करने का निर्देश दिया गया।

इससे मामले का दायरा दिल्ली से बाहर भी फैल गया है। जुलाई में परीक्षा से जुड़े आंदोलन और पुलिस कार्रवाई को लेकर कई राज्यों में अलग-अलग शिकायतें और मुकदमे सामने आए थे। सुप्रीम कोर्ट पहले भी इस व्यापक विवाद में केंद्र और कई राज्य सरकारों से जवाब मांग चुका है।


जुलाई के प्रदर्शन की पृष्ठभूमि

सीजेपी ने परीक्षा में कथित अनियमितताओं और एनईईटी से जुड़े मुद्दों को लेकर आंदोलन किया था। दिल्ली में 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी थी। इसके बाद कई थानों में एफआईआर दर्ज की गईं।

प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। दूसरी ओर, पुलिस और सरकार की ओर से प्रदर्शन के दौरान हिंसा तथा गंभीर आपराधिक घटनाओं में कुछ लोगों की कथित भूमिका की जांच की जरूरत बताई गई। यही वजह है कि अब सरकार गंभीर मामलों को सामान्य प्रदर्शन संबंधी मामलों से अलग करने की दलील दे रही है।

सुप्रीम कोर्ट में पुलिस कार्रवाई को लेकर अलग याचिकाएं भी लंबित हैं। अदालत ने पहले प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस ज्यादती और चोटों से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र जांच की जरूरत पर विचार किया था।


5 सितंबर के मार्च का मामला भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

इसी बीच सीजेपी ने 5 सितंबर को दिल्ली में मार्च का ऐलान किया है। संगठन का कहना है कि यह मार्च सरकार की ओर से किए गए कथित आश्वासन को लागू कराने के लिए होगा।

मार्च को रोकने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल हस्तक्षेप से इनकार किया है। अदालत ने कहा कि फिलहाल ऐसी कोई बाध्यकारी परिस्थिति सामने नहीं है जिससे यह मान लिया जाए कि प्रस्तावित प्रदर्शन कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा करेगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण और कानून के दायरे में होना चाहिए। कानून-व्यवस्था से जुड़े व्यावहारिक फैसले संबंधित प्रशासन और पुलिस को लेने होंगे।


सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच अहम कानूनी सवाल

इस पूरे विवाद में दो अलग पहलू सामने हैं। पहला, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार से जुड़ा संवैधानिक सवाल है। दूसरा, प्रदर्शन के दौरान गंभीर आपराधिक घटनाओं में शामिल लोगों की जवाबदेही का सवाल है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी शांतिपूर्ण और वैध प्रदर्शन को संवैधानिक अधिकार के दायरे में माना है। साथ ही गंभीर आरोपों की जांच और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी से भी इनकार नहीं किया है।

यही संतुलन मौजूदा सुनवाई में महत्वपूर्ण रहेगा। यदि अदालत एफआईआर खत्म करने की अनुमति देती है, तो यह देखना अहम होगा कि किन मामलों और किन आरोपियों को राहत मिलती है। दूसरी ओर, गंभीर आपराधिक आरोपों वाले मामलों की जांच किस प्रक्रिया से आगे बढ़ेगी, इस पर भी अदालत की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।


अब आगे क्या होगा

सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को केंद्र और चार राज्यों की ओर से दाखिल आवेदनों पर सुनवाई करेगा। अदालत यह तय करेगी कि अनुच्छेद 142 के तहत मांगी गई राहत किस सीमा तक दी जा सकती है। साथ ही 13 एफआईआर और 2,873 लोगों से जुड़े प्रस्ताव का कानूनी परीक्षण भी महत्वपूर्ण रहेगा।

5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च को लेकर भी प्रशासन की तैयारी पर नजर रहेगी। अदालत ने तत्काल रोक लगाने से इनकार किया है, लेकिन प्रदर्शनकारियों और प्रशासन दोनों से कानून के मुताबिक और शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ने की अपेक्षा जताई है।


निष्कर्ष

सीजेपी प्रदर्शन से जुड़े मामलों में केंद्र और राज्यों का सुप्रीम कोर्ट पहुंचना मामले को एक नए कानूनी चरण में ले गया है। एक तरफ सरकार प्रदर्शन से जुड़े कई मामलों को खत्म करने की दिशा में बढ़ रही है, वहीं गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की जांच जारी रखने की बात कर रही है।

अब असली फैसला सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद सामने आएगा। अदालत के आदेश से यह स्पष्ट होगा कि प्रदर्शन से जुड़ी एफआईआर पर किस स्तर तक राहत मिलती है और गंभीर आरोपों की जांच के लिए कौन-सा कानूनी रास्ता अपनाया जाता है।

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Mohammad Naved

Mohammad Naved

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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