सुप्रीम कोर्ट की रोक, करूर पीड़ितों को नौकरी मामले में राहत
करूर स्टैम्पीड: सरकारी नौकरी पर SC ने HC का फैसला रोका
करूर पीड़ितों के परिजनों की नौकरी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने करूर स्टैम्पीड पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को रद्द करने वाले मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। अदालत ने नोटिस जारी किया और सवाल उठाया कि त्रासदी में परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य मर जाए तो बेटे या बेटी को रोजगार देने की नीति पर सवाल क्यों उठाया जाए। मामला अभी विचाराधीन है।
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नई दिल्ली | 14 अगस्त 2026 | Mohd Naved
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मामले में नया मोड़
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को करूर स्टैम्पीड में जान गंवाने वालों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को रद्द करने वाले मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। इससे मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार के उस राहत फैसले को फिलहाल अंतरिम कानूनी राहत मिली है, जिसे हाईकोर्ट ने जुलाई में संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ माना था।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन शामिल थे। अदालत ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। इसका अर्थ यह है कि फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश का प्रभाव रोक दिया गया है, लेकिन सरकारी नौकरी देने की नीति पर अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नीति के दायरे को लेकर अहम सवाल किया। रिपोर्ट के मुताबिक पीठ ने पूछा कि यदि किसी परिवार का एकमात्र सदस्य त्रासदी में मारा जाता है, तो क्या सरकार उसके बेटे या बेटी को रोजगार देने की व्यवस्था नहीं कर सकती। अदालत की टिप्पणी से संकेत मिलता है कि वह राहत और सार्वजनिक रोजगार के बीच संबंध को व्यापक दृष्टिकोण से देख रही है।
हालांकि अदालत की मौखिक टिप्पणी को अंतिम कानूनी फैसला नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई है और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। इसलिए सरकारी नौकरी के स्थायी अधिकार पर अभी कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
करूर में 27 सितंबर 2025 को तमिलगा वेत्री कझगम की एक रैली के दौरान भगदड़ हुई थी। हादसे में 41 लोगों की मौत हुई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। घटना के बाद पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे और दूसरी राहत के साथ सरकारी रोजगार का मुद्दा भी सामने आया।
10 जुलाई 2026 को तमिलनाडु सरकार ने पीड़ित परिवारों के सदस्यों को सरकारी नियुक्ति आदेश दिए। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक 41 मृतकों के परिवारों में से 31 सदस्यों को नियुक्ति आदेश दिए गए थे। इनमें जूनियर असिस्टेंट और ऑफिस असिस्टेंट जैसे पद शामिल थे तथा नियुक्तियां अलग-अलग सरकारी विभागों में की गई थीं।
इससे पहले मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने सरकार को नियुक्ति आदेश जारी करने की अनुमति दी थी, लेकिन साफ किया था कि नियुक्तियां अस्थायी रहेंगी और अदालत के अंतिम आदेश के अधीन होंगी। अदालत ने तमिलनाडु लोक सेवा आयोग से compassionate appointment के मौजूदा नियमों और करूर मामले में उनकी लागू होने की स्थिति पर रिपोर्ट भी मांगी थी।
27 जुलाई को मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के सरकारी नौकरी देने के आदेश को रद्द कर दिया था। अदालत ने माना कि सार्वजनिक रोजगार में समानता और समान अवसर के संवैधानिक सिद्धांतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फैसले में संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का संदर्भ दिया गया था।
हाईकोर्ट का तर्क था कि सरकारी नौकरी सामान्य राहत या मुआवजे का विकल्प नहीं हो सकती। अदालत ने इस आशंका को भी महत्व दिया कि यदि किसी खास त्रासदी के बाद सरकारी नौकरी देने की व्यवस्था स्वीकार की जाती है, तो भविष्य में इसी तरह के दूसरे मामलों में भी ऐसी मांगों का सिलसिला शुरू हो सकता है।
अदालत ने यह भी देखा था कि सरकारी विभागों में पहले से compassionate appointment के लिए इंतजार कर रहे लोग मौजूद हैं। इसलिए एक विशेष घटना के आधार पर अलग प्रक्रिया अपनाने से समान अवसर के सिद्धांत पर सवाल पैदा हो सकता है।
तमिलनाडु सरकार का रुख यह रहा कि करूर त्रासदी के पीड़ित परिवारों को विशेष राहत की जरूरत है। सरकारी नौकरी को परिवार की आर्थिक सुरक्षा के एक साधन के तौर पर देखा गया। 10 जुलाई को मुख्यमंत्री विजय ने पीड़ित परिवारों के सदस्यों को नियुक्ति आदेश सौंपे थे।
इस नीति का समर्थन करने वालों का तर्क है कि असाधारण त्रासदी में सामान्य प्रशासनिक नियमों के साथ मानवीय राहत को भी देखा जाना चाहिए। खासकर उन परिवारों के मामले में जहां कमाने वाले सदस्य की मौत हो गई हो, रोजगार परिवार की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिति को स्थिर करने में मदद कर सकता है।
दूसरी ओर, विरोध करने वालों का सवाल है कि सार्वजनिक रोजगार के लिए संवैधानिक समानता और निर्धारित भर्ती प्रक्रिया से अलग रास्ता कितना उचित है। यही कानूनी विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है।
इस मामले की सबसे अहम कानूनी बहस सरकारी नौकरी की प्रकृति को लेकर है। आर्थिक मुआवजा सरकार की ओर से राहत के रूप में दिया जा सकता है, लेकिन सरकारी पद सार्वजनिक सेवा का हिस्सा होता है और उसके लिए नियुक्ति प्रक्रिया, योग्यता तथा समान अवसर के नियम लागू होते हैं।
मद्रास हाईकोर्ट ने इसी अंतर को अपने फैसले में महत्व दिया था। अदालत ने कहा था कि कार्यपालिका की सहानुभूति संवैधानिक सुरक्षा को खत्म नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा कार्रवाई इस सवाल की दोबारा समीक्षा का रास्ता खोलती है। शीर्ष अदालत यह देखेगी कि क्या राज्य किसी विशिष्ट त्रासदी के लिए अलग राहत नीति बनाकर पात्र परिवार के सदस्य को रोजगार दे सकता है और ऐसी नीति संविधान तथा लागू भर्ती नियमों के अनुरूप किस हद तक होनी चाहिए।
करूर स्टैम्पीड से जुड़ी जांच अलग कानूनी प्रक्रिया में चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले इस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंपने का आदेश दिया था। जुलाई में भी अदालत के सामने इस जांच और पीड़ित परिवारों से जुड़े सरकारी कदमों को लेकर अलग-अलग अर्जियां आई थीं।
इस वजह से सरकारी राहत और जांच की निष्पक्षता के बीच संतुलन का सवाल भी चर्चा में रहा है। हालांकि सरकारी नौकरी के मौजूदा विवाद का केंद्रीय मुद्दा नियुक्ति नीति की वैधता है, न कि स्टैम्पीड की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण।
यह फर्क महत्वपूर्ण है। नौकरी देने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा रोक को स्टैम्पीड की जिम्मेदारी तय करने वाला आदेश नहीं समझा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट के फैसले पर रोक से तमिलनाडु सरकार के नौकरी संबंधी आदेश फिलहाल फिर से कानूनी संरक्षण के दायरे में आ गए हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि आगे इन नियुक्तियों की अंतिम स्थिति क्या होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। इसके बाद सरकार और याचिकाकर्ताओं के तर्कों, संवैधानिक प्रावधानों तथा compassionate appointment की नीति पर विस्तृत सुनवाई हो सकती है।
इस स्तर पर सबसे अहम बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम रूप से खारिज नहीं किया है। उसने फिलहाल उसके अमल पर रोक लगाई है। अंतिम कानूनी स्थिति आगे की सुनवाई और आदेशों पर निर्भर करेगी।
करूर मामला भारतीय प्रशासन में एक व्यापक सवाल भी सामने रखता है। क्या किसी असाधारण मानवीय त्रासदी के बाद सरकार सामान्य भर्ती व्यवस्था से अलग राहत नीति बना सकती है?
एक पक्ष संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता तथा सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर को प्राथमिकता देता है। दूसरा पक्ष यह तर्क रखता है कि सरकार को विशेष परिस्थितियों में पीड़ित परिवारों के पुनर्वास के लिए अलग नीति बनाने की गुंजाइश होनी चाहिए।
दोनों पक्षों के बीच संतुलन आसान नहीं है। यदि राहत नीति बहुत व्यापक हो, तो समानता और चयन प्रक्रिया पर सवाल उठ सकते हैं। यदि नीति बहुत कठोर हो, तो असाधारण त्रासदी में प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए सरकार के पास सीमित विकल्प बच सकते हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार और अन्य संबंधित पक्षों के जवाब अहम होंगे। अदालत को यह देखना होगा कि सरकारी नौकरी देने की नीति किस कानूनी आधार पर बनाई गई, क्या पात्रता के स्पष्ट मानदंड थे और क्या नियुक्तियों के लिए कोई समान तथा पारदर्शी ढांचा मौजूद था।
यह भी महत्वपूर्ण होगा कि compassionate appointment के सामान्य नियमों और करूर के लिए बनाई गई विशेष व्यवस्था के बीच कितना सामंजस्य है। अदालत के सामने यह सवाल भी रहेगा कि ऐसी नीति भविष्य के मामलों के लिए किस तरह का संवैधानिक और प्रशासनिक ढांचा तैयार कर सकती है।
करूर स्टैम्पीड पीड़ितों के परिजनों की सरकारी नौकरी का मामला अब मद्रास हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के नौकरी रद्द करने वाले आदेश पर रोक लगाकर सरकार के पक्ष को अंतरिम राहत दी है, लेकिन अंतिम फैसला अभी बाकी है।
मामले का मूल सवाल केवल 31 नियुक्तियों का नहीं है। असली बहस यह है कि असाधारण मानवीय त्रासदी में राज्य की राहत नीति और सार्वजनिक रोजगार के संवैधानिक सिद्धांतों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
फिलहाल इतना स्थापित है कि हाईकोर्ट का फैसला लागू नहीं रहेगा और सुप्रीम कोर्ट मामले की समीक्षा करेगा। आगे की सुनवाई यह तय करने में अहम होगी कि करूर पीड़ितों के परिजनों के लिए सरकारी नौकरी की नीति संवैधानिक कसौटी पर टिकती है या नहीं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।