सुप्रीम कोर्ट ने अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने 25 साल की वास्तविक कैद की अवधि को रिमिशन से घटाने की दलील नहीं मानी।
नई दिल्ली | 10 सितंबर 2026
By Mohd Haris
सुप्रीम कोर्ट ने 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे गैंगस्टर अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की मांग खारिज कर दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि 25 साल की कैद की जिस सीमा का आधार भारत के पुर्तगाल को दिए गए प्रत्यर्पण आश्वासन में है, उसमें सामान्य जेल रिमिशन जोड़कर रिहाई की तारीख पहले नहीं की जा सकती।
सलेम ने दलील दी थी कि जेल में अच्छे आचरण के आधार पर मिली रिमिशन और अंडरट्रायल के दौरान बिताई अवधि को 25 साल की सीमा में शामिल किया जाना चाहिए। उसके मुताबिक इन अवधियों को जोड़ने पर वह तय अवधि पूरी कर चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
अबू सलेम को पुर्तगाल से भारत लाने की प्रक्रिया के दौरान भारत सरकार ने वहां की सरकार को आश्वासन दिया था कि उसे मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा और उसकी कैद 25 साल से अधिक नहीं होगी। पुर्तगाल की अदालतों ने इसी आश्वासन को ध्यान में रखते हुए उसके प्रत्यर्पण की अनुमति दी थी।
भारत के इस संप्रभु आश्वासन का मामला पहले भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आ चुका है। जुलाई 2022 के फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि 25 साल की अवधि पूरी होने पर केंद्र सरकार को राष्ट्रपति के समक्ष शेष सजा में रियायत के लिए सलाह देनी होगी या कानून के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करना होगा।
सलेम की ओर से दलील दी गई कि जेल में बिताए समय के साथ उसे अच्छे आचरण के लिए मिली रिमिशन भी 25 साल की सीमा की गणना में शामिल होनी चाहिए।
उसके वकील ने यह तर्क भी रखा कि अंडरट्रायल के तौर पर बिताया गया समय और जेल में अर्जित रिमिशन जोड़ने पर 25 साल की अवधि पूरी हो चुकी है। इस आधार पर सलेम ने तत्काल रिहाई की मांग की।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने अप्रैल 2026 में भी सलेम की रिहाई की मांग खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि प्रत्यर्पण से जुड़ी 25 साल की सीमा को सामान्य जेल रिमिशन के जरिए और कम नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस आधार पर उसकी याचिका को समय से पहले और गलत आधार पर दायर माना था।
सुप्रीम कोर्ट ने अब हाईकोर्ट के रुख में कोई कानूनी खामी नहीं पाई और उसकी याचिका खारिज कर दी। शीर्ष अदालत के मुताबिक 25 साल की सीमा वास्तविक कारावास से जुड़ी है और जेल नियमों के तहत मिलने वाली सामान्य रिमिशन को इसमें समायोजित करके अवधि कम नहीं की जा सकती।
अबू सलेम को 11 नवंबर 2005 को पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पित किया गया था। अदालतों के सामने इसी अवधि को आधार बनाकर 25 साल की सीमा की गणना की गई है। इस हिसाब से 25 साल की अवधि नवंबर 2030 में पूरी होगी।
यही वजह है कि अदालत ने मौजूदा समय में उसकी तत्काल रिहाई की मांग को स्वीकार नहीं किया। सलेम का पक्ष 25 साल की गणना में रिमिशन को शामिल करना चाहता था, जबकि अदालत ने वास्तविक कारावास की अवधि को आधार माना।
अबू सलेम 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। विशेष टाडा अदालत ने सितंबर 2017 में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
इसके अलावा उसे मुंबई के बिल्डर प्रदीप जैन की हत्या के मामले में भी उम्रकैद की सजा मिली थी। सलेम की कानूनी स्थिति कई मामलों और भारत-पुर्तगाल प्रत्यर्पण आश्वासन से जुड़े अलग-अलग न्यायिक आदेशों से प्रभावित रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में अबू सलेम के मामले में भारत सरकार द्वारा पुर्तगाल को दिए गए आश्वासन को महत्वपूर्ण माना था। अदालत ने स्पष्ट किया था कि भारत सरकार अपने संप्रभु आश्वासन से पीछे नहीं हट सकती।
अदालत ने यह भी माना था कि 25 साल की अवधि पूरी होने के बाद सरकार को निर्धारित संवैधानिक और वैधानिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई करनी होगी। यह प्रक्रिया अदालत द्वारा सीधे सजा को 25 साल में बदलने से अलग है।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद तत्काल रिहाई का रास्ता बंद हो गया है। अदालत ने सलेम की यह दलील स्वीकार नहीं की कि अर्जित रिमिशन को 25 साल की सीमा से घटाकर उसकी रिहाई अभी की जानी चाहिए।
मामले का अहम बिंदु नवंबर 2030 की अवधि है। उस समय प्रत्यर्पण आश्वासन से जुड़ी 25 साल की सीमा पूरी होगी। इसके बाद भारत सरकार को 2022 के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और लागू संवैधानिक तथा वैधानिक प्रक्रिया के मुताबिक कार्रवाई करनी होगी।
यह फैसला केवल अबू सलेम की रिहाई के सवाल तक सीमित नहीं है। इसमें प्रत्यर्पण के दौरान किसी दूसरे देश को दिए गए संप्रभु आश्वासन, भारतीय कानून के तहत सजा और जेल रिमिशन के बीच संतुलन का सवाल भी सामने आता है।
अदालत के रुख से यह संकेत मिलता है कि प्रत्यर्पण की शर्तों से जुड़ी विशेष सजा सीमा और सामान्य जेल रिमिशन को एक ही आधार पर नहीं देखा जा सकता। गंभीर अपराधों में सजा की अवधि तय करते समय अंतरराष्ट्रीय दायित्व और घरेलू कानून दोनों का महत्व बना रहता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अबू सलेम की 25 साल की कैद पूरी होने के आधार पर तत्काल रिहाई की मांग को खारिज कर दिया है। अदालत ने रिमिशन को 25 साल की प्रत्यर्पण-आधारित सीमा में जोड़कर अवधि घटाने की दलील स्वीकार नहीं की।
फिलहाल नवंबर 2030 वह अहम समयसीमा है जिसके आसपास सलेम की प्रत्यर्पण से जुड़ी 25 साल की अवधि पूरी होगी। उसके बाद रिहाई या शेष सजा में रियायत का सवाल संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत तय होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।