नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने NEET-UG विवाद से जुड़े छात्र प्रदर्शनों के मामलों में बड़ा आदेश दिया है। अदालत ने 20 से 25 जुलाई 2026 के दौरान हुए प्रदर्शनों से संबंधित FIRs को बंद करने और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को आगे जांच या कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत यह राहत दी। हालांकि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 2,873 लोगों से जुड़े मामले को अलग रखा गया है।
Location: नई दिल्ली, भारत
Date: 1 सितंबर 2026
Byline: Apurva Choudhary
NEET प्रदर्शन से जुड़ी FIR पर सुप्रीम कोर्ट की राहत
NEET-UG विवाद के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्रों ने प्रदर्शन किए थे। इन प्रदर्शनों के सिलसिले में कई स्थानों पर FIR दर्ज की गई थीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने 20 से 25 जुलाई के दौरान हुए इन प्रदर्शनों से संबंधित मामलों को समाप्त करने का निर्देश दिया है।
अदालत का रुख उन छात्रों के प्रति राहत देने वाला रहा, जिन्होंने प्रदर्शन में शांतिपूर्ण तरीके से हिस्सा लिया था। पीठ ने युवाओं के भविष्य और उनके खिलाफ दर्ज मामलों के संभावित असर को ध्यान में रखते हुए व्यापक राहत देने का फैसला किया।
अनुच्छेद 142 के तहत दिया गया आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया। यह प्रावधान अदालत को किसी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश देने की शक्ति देता है।
अदालत ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए FIRs पर आगे की कार्रवाई रोकने का निर्देश दिया। हालांकि इस आदेश को हर तरह के प्रदर्शन या हर आपराधिक मामले के लिए सामान्य छूट के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
2,873 लोगों का मामला अलग
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी रखा गया है। गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 2,873 लोगों से जुड़े मामले में कार्रवाई आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक रिकॉर्ड या FIR होना अपने आप में उसके दोषी साबित होने का प्रमाण नहीं है। इन लोगों से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया आगे जारी रह सकती है और अंतिम स्थिति संबंधित जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
छात्रों के भविष्य को क्यों माना गया अहम?
NEET जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा से जुड़े विवाद में बड़ी संख्या में छात्र और युवा सीधे प्रभावित होते हैं। अदालत के सामने यह पहलू भी महत्वपूर्ण रहा कि प्रदर्शन से जुड़े आपराधिक मामले छात्रों की पढ़ाई, करियर और भविष्य पर लंबे समय तक असर डाल सकते हैं।
इसी वजह से अदालत ने उन मामलों में राहत देने का रास्ता अपनाया जिनमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप या पृष्ठभूमि सामने नहीं आई।
NEET विवाद के बाद मुआवजे का मुद्दा
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से NEET-UG विवाद के बाद जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों के लिए मुआवजे से संबंधित प्रक्रिया पर भी जानकारी दी गई।
केंद्र ने इस संबंध में आवश्यक प्रक्रिया और तौर-तरीके तय करने के लिए तीन महीने का समय मांगा है। मुआवजे की वास्तविक व्यवस्था और पात्रता से जुड़ी अंतिम जानकारी आगे सामने आने की उम्मीद है।
5 सितंबर का प्रस्तावित प्रदर्शन भी वापस
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 5 सितंबर को दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन को वापस लेने की घोषणा भी की गई। इससे NEET-UG विवाद को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन में फिलहाल तनाव कम होने के संकेत मिले हैं।
हालांकि परीक्षा विवाद से जुड़े दूसरे कानूनी और प्रशासनिक सवालों का समाधान अलग-अलग प्रक्रियाओं के जरिए होना बाकी रह सकता है।
फैसले का व्यापक असर
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश छात्रों और उनके परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदर्शन में शामिल होने के कारण दर्ज आपराधिक मामलों का भविष्य पर असर पड़ सकता था।
लेकिन अदालत ने गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को अलग रखकर यह भी स्पष्ट किया कि राहत का उद्देश्य शांतिपूर्ण प्रदर्शन से जुड़े मामलों को समाप्त करना है, न कि गंभीर आपराधिक आरोपों की जांच को पूरी तरह रोक देना।
छात्रों के लिए क्या बदला?
इस आदेश के बाद 20 से 25 जुलाई के दौरान NEET-UG प्रदर्शन से जुड़े सामान्य FIR मामलों में आगे पुलिस कार्रवाई नहीं होगी। इससे संबंधित छात्रों को आपराधिक मुकदमे की लंबी प्रक्रिया से राहत मिलने की संभावना है।
वहीं गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकती है। इसलिए सभी प्रदर्शनकारियों के मामलों को एक समान मानना उचित नहीं होगा।
संपादकीय निष्कर्ष
NEET-UG छात्र प्रदर्शनों से जुड़े FIR मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश छात्रों के लिए बड़ी कानूनी राहत लेकर आया है। अदालत ने 20 से 25 जुलाई 2026 के दौरान हुए प्रदर्शनों से संबंधित FIRs को बंद करने का निर्देश दिया और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को आगे कार्रवाई से रोक दिया।
हालांकि 2,873 गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों से जुड़े मामले को अलग रखा गया है। इसलिए इस फैसले को सभी आरोपों या सभी मामलों की पूर्ण समाप्ति के रूप में देखना सही नहीं होगा।