SYNOPSIS
सुप्रीम कोर्ट ने सुखबीर सिंह बादल की 2017 के कथित मानहानिकारक बयानों से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी। मामला राजिंदर पाल सिंह की शिकायत पर आधारित है। अदालत ने दोष तय नहीं किया, बल्कि शुरुआती स्तर पर कार्यवाही रोकने से इनकार किया है। अब निचली अदालत में सुनवाई आगे बढ़ेगी।
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नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026 | Apurva Choudhary
सुप्रीम कोर्ट ने सुखबीर सिंह बादल की याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 21 अगस्त 2026 को शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल को 2017 के आपराधिक मानहानि मामले में राहत देने से इनकार कर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने बादल की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट के आदेश और निचली अदालत की कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई थी।
इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि राजिंदर पाल सिंह की शिकायत पर चल रही क्रिमिनल डिफेमेशन प्रोसीडिंग्स को इस स्तर पर समाप्त नहीं किया जाएगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बादल को मानहानि का दोषी नहीं ठहराया है। अंतिम फैसला निचली अदालत में आगे होने वाली न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।
2017 के कथित बयान से शुरू हुआ विवाद
मामला जनवरी 2017 का है, जब पंजाब में विधानसभा चुनाव का माहौल था। शिकायतकर्ता राजिंदर पाल सिंह ने खुद को अखंड कीर्तनी जत्था यानी एकेेजे का प्रवक्ता बताते हुए आरोप लगाया था कि उस समय पंजाब के डिप्टी चीफ मिनिस्टर रहे सुखबीर बादल ने संगठन को प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल यानी बीकेआई से जोड़ने वाले बयान दिए थे।
शिकायत के मुताबिक ये कथित टिप्पणियां राजनीतिक कार्यक्रमों और मीडिया के सामने की गई थीं और बाद में कई अखबारों में प्रकाशित हुईं। राजिंदर पाल सिंह का आरोप था कि इन बयानों से उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और एकेेजे की छवि को नुकसान पहुंचा।
मामले की पृष्ठभूमि में आम आदमी पार्टी के तत्कालीन दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राजिंदर पाल सिंह के घर हुई मुलाकात का भी उल्लेख अदालत के रिकॉर्ड में मिलता है। शिकायतकर्ता के अनुसार, इसी घटनाक्रम के बाद बादल की ओर से कथित टिप्पणियां सामने आई थीं।
शिकायतकर्ता ने किस आधार पर दर्ज कराया केस?
राजिंदर पाल सिंह ने 2017 में चंडीगढ़ की अदालत में क्रिमिनल डिफेमेशन की शिकायत दाखिल की थी। शिकायत में भारतीय दंड संहिता की मानहानि संबंधी धाराओं का सहारा लिया गया था।
मामले में शुरुआती जांच और साक्ष्यों के बाद मजिस्ट्रेट ने मार्च 2020 में सुखबीर सिंह बादल को समन किया था। इसके बाद बादल ने इस प्रक्रिया को चुनौती देते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट का रुख किया।
हाई कोर्ट ने 17 अक्टूबर 2025 को उनकी याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने उस स्तर पर यह माना था कि शिकायतकर्ता को मामले में ‘अग्ग्रिव्ड पर्सन’ के तौर पर शिकायत बनाए रखने से बाहर नहीं किया जा सकता और कथित बयान प्रथमदृष्टया मानहानि के दायरे में जांच के योग्य हैं। साथ ही हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि उसके अवलोकन ट्रायल के अंतिम नतीजे को प्रभावित नहीं करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी गई?
सुप्रीम कोर्ट में सुखबीर बादल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल पेश हुए। उनकी ओर से मुख्य सवालों में यह भी शामिल था कि क्या राजिंदर पाल सिंह वास्तव में एकेेजे के अधिकृत प्रवक्ता थे और क्या कथित बयान सीधे तौर पर शिकायतकर्ता के बारे में मानहानिकारक आरोप बनाते हैं।
बादल की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि शिकायतकर्ता ने स्वयं को संगठन का प्रवक्ता बताया है, लेकिन उनकी ओर से संगठन द्वारा औपचारिक अधिकृत किए जाने का पर्याप्त आधार नहीं दिखाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनवाई के दौरान शिकायत में बताए गए कथित बयानों और उन अखबारी रिपोर्टों के संदर्भ में सवाल किए जिन पर शिकायतकर्ता ने भरोसा किया था। सुनवाई के बाद बेंच ने हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असल मतलब क्या है?
यहां कानूनी स्थिति को सही तरीके से समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्वैशिंग यानी कार्यवाही रद्द करने की मांग ठुकराए जाने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने सुखबीर बादल को मानहानि का दोषी घोषित कर दिया है।
अदालत ने फिलहाल यह तय किया है कि मामले को शुरुआती स्तर पर खत्म करने का आधार पर्याप्त नहीं है। इसलिए शिकायत, समन और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही आगे बढ़ सकती है।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि क्रिमिनल केस में किसी आरोपी को ट्रायल से पहले राहत न मिलना और ट्रायल के बाद दोषी ठहराया जाना दो बिल्कुल अलग कानूनी स्थितियां हैं।
हाई कोर्ट पहले क्या कह चुका है?
पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2025 के अपने फैसले में बादल की क्वैशिंग याचिका को खारिज किया था। अदालत ने माना था कि शिकायतकर्ता ने व्यक्तिगत रूप से अपनी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने का दावा किया है और केवल इस आधार पर कि कथित टिप्पणी में उसका नाम सीधे ‘आतंकवादी’ के रूप में नहीं लिया गया, शिकायत को शुरुआती चरण में खत्म नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि एकेेजे को कथित तौर पर बीकेआई से जोड़ने वाला बयान, यदि ट्रायल में साबित होता है, तो संगठन से जुड़े व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर असर डाल सकता है। हालांकि अदालत ने इन टिप्पणियों को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना और स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट को शिकायत का फैसला अपने स्तर पर करना होगा।
क्या मामले में पहले भी अदालत की सख्ती दिखी है?
हां। इस मामले में निचली अदालत की कार्यवाही भी कई चरणों से गुजर चुकी है। दिसंबर 2025 में चंडीगढ़ की अदालत ने सुखबीर बादल की जमानत रद्द कर गैर-जमानती वारंट जारी किया था, क्योंकि वह सुनवाई में उपस्थित नहीं हुए थे। बाद में जनवरी 2026 में उन्हें जमानत मिल गई थी।
जुलाई 2026 में चंडीगढ़ की अदालत ने एक सुनवाई में उन्हें व्यक्तिगत उपस्थिति से भी छूट दी थी। इससे स्पष्ट है कि मामला केवल पुराने आरोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसकी प्रक्रिया 2026 में भी जारी रही।
मानहानि कानून में ‘अग्ग्रिव्ड पर्सन’ का सवाल
इस मामले का एक अहम कानूनी पहलू यह है कि मानहानि की शिकायत कौन व्यक्ति दर्ज करा सकता है। हाई कोर्ट के फैसले में भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 199 के संदर्भ में इस सवाल पर विस्तार से विचार किया गया था।
हाई कोर्ट ने माना था कि राजिंदर पाल सिंह ने शिकायत व्यक्तिगत क्षमता में दर्ज कराई थी और उनका दावा था कि कथित बयान से उनकी प्रतिष्ठा प्रभावित हुई। अदालत ने यह भी माना कि संगठन से जुड़े कथित आरोपों का असर उसके प्रवक्ता के रूप में उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा पर पड़ने का दावा प्रथमदृष्टया जांच से बाहर नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक बयान और क्रिमिनल डिफेमेशन की सीमा
यह मामला राजनीतिक बयानबाजी और आपराधिक मानहानि कानून के बीच संतुलन का भी सवाल उठाता है। चुनावी राजनीति में नेताओं की ओर से विरोधियों, संगठनों और उनके राजनीतिक संबंधों पर तीखी टिप्पणियां की जाती हैं, लेकिन किसी व्यक्ति या संगठन को गंभीर आपराधिक गतिविधि से जोड़ने वाले कथन अलग कानूनी सवाल खड़े कर सकते हैं।
दूसरी तरफ, अदालत को यह भी देखना होगा कि कथित बयान किस संदर्भ में दिया गया था, उसका वास्तविक आशय क्या था, उसे किस तरह प्रकाशित या प्रसारित किया गया और क्या वह मानहानि कानून के सभी आवश्यक तत्वों को पूरा करता है।
इन सवालों का अंतिम जवाब अभी नहीं दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट का शुक्रवार का आदेश केवल इस बात तक सीमित है कि बादल की ओर से मांगी गई शुरुआती राहत यानी पूरी कार्यवाही को रद्द करने का आधार इस चरण पर स्वीकार नहीं किया गया।
अब क्या होगा?
अब संबंधित ट्रायल कोर्ट में आपराधिक मानहानि की कार्यवाही कानून के मुताबिक आगे बढ़ सकती है। मामले में अंतिम दोष या निर्दोषता का फैसला आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
सुप्रीम कोर्ट का 21 अगस्त 2026 का आदेश सुखबीर सिंह बादल के लिए इस मामले में तत्काल राहत नहीं देता। अदालत ने उनकी उस कोशिश को स्वीकार नहीं किया, जिसके जरिए 2017 की शिकायत, समन और उसके बाद की आपराधिक कार्यवाही को शुरुआती स्तर पर समाप्त कराने की मांग की गई थी।
लेकिन इस फैसले को बादल की मानहानि मामले में दोषसिद्धि के तौर पर पढ़ना गलत होगा। अभी केवल इतना तय हुआ है कि मामला ट्रायल के लिए आगे बढ़ सकता है। कथित बयान मानहानिकारक थे या नहीं, शिकायतकर्ता को कानूनी तौर पर हुई क्षति किस स्तर तक साबित होती है और उपलब्ध साक्ष्य आरोपों को कितना समर्थन देते हैं—इन सवालों पर अंतिम न्यायिक निर्णय अभी बाकी है।
इस लिहाज से सुखबीर सिंह बादल मानहानि केस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस चरण पर न्यायिक प्रक्रिया में दखल देने से इनकार किया है। अब मामले की अगली दिशा निचली अदालत में होने वाली कार्यवाही और वहां पेश होने वाले साक्ष्यों से तय होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।