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फांसी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, लीथल इंजेक्शन की मांग खारिज
Asif Khan
•
2026-08-18 15:24:06
फांसी जारी रहेगी, सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
लीथल इंजेक्शन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
फांसी के विकल्प की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड के लिए फांसी की जगह लीथल इंजेक्शन जैसे विकल्प अपनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखा, लेकिन नए वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या व्यावहारिक साक्ष्य मिलने पर भविष्य की संवैधानिक समीक्षा की संभावना खुली रखी। केंद्र भी विषय की समीक्षा कर रहा है।
📍 नई दिल्ली, भारत
🗓️ 18 अगस्त 2026
✍️ Asif Khan, Shah Times
फांसी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, लीथल इंजेक्शन की मांग खारिज
भारत में मृत्युदंड को लागू करने के तरीके को लेकर चल रही अहम संवैधानिक बहस में सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने फांसी की जगह कम पीड़ादायक और अधिक मानवीय माने जाने वाले विकल्प, खास तौर पर लीथल इंजेक्शन, अपनाने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। अदालत ने साथ ही यह स्पष्ट किया कि भविष्य में ठोस वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या व्यावहारिक साक्ष्य सामने आने पर इस सवाल की दोबारा संवैधानिक समीक्षा की संभावना समाप्त नहीं होती।
क्या हुआ?
याचिका में मृत्युदंड के मौजूदा तरीके को चुनौती दी गई थी। इसमें दलील दी गई कि गर्दन से फांसी देने की प्रक्रिया मानवीय गरिमा और संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़े अधिकारों के संदर्भ में फिर से जांचे जाने की जरूरत है।
याचिकाकर्ता ऋषि मल्होत्रा ने फांसी के विकल्प के तौर पर लीथल इंजेक्शन समेत दूसरे तरीकों पर विचार करने की मांग की थी। मामले में पहले से ही इस सवाल पर लंबी न्यायिक सुनवाई चल रही थी। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना आदेश सुरक्षित रखा था।
अब अदालत ने याचिका खारिज कर दी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि भारत में मृत्युदंड के निष्पादन की मौजूदा वैधानिक व्यवस्था तत्काल नहीं बदली है।
पूरा संदर्भ क्या है?
मौजूदा कानूनी ढांचे में मृत्युदंड दिए जाने पर फांसी का प्रावधान है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 393 की उपधारा 5 में कहा गया है कि मृत्युदंड की सजा पाए व्यक्ति को गर्दन से तब तक फांसी दी जाएगी, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।
यह व्यवस्था पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354 की उपधारा 5 में थी। नई आपराधिक प्रक्रिया व्यवस्था लागू होने के बाद संबंधित प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में स्थानांतरित हुआ है।
इस सवाल की संवैधानिक पृष्ठभूमि इससे भी पुरानी है। 1983 में दीना बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने फांसी की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था। 2017 में मौजूदा याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज है और विज्ञान तथा सामाजिक सोच में बदलाव के साथ पुराने कानूनी सवालों पर नए संदर्भ में विचार संभव हो सकता है।
पृष्ठभूमि और घटनाक्रम
फांसी के विकल्प का सवाल भारत में नया नहीं है। 2003 में विधि आयोग ने मृत्युदंड के निष्पादन के तरीके पर अपनी 187वीं रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट का विषय ही मृत्युदंड के निष्पादन के तरीके और उससे जुड़े मुद्दे थे।
इसके बाद ऋषि मल्होत्रा की याचिका के जरिए यह सवाल सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा कि क्या फांसी के बजाय कोई ऐसा तरीका अपनाया जा सकता है जिसमें पीड़ा कम हो और मानवीय गरिमा की बेहतर रक्षा हो।
2025 और 2026 की सुनवाइयों में केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर विचार किए जाने की जानकारी अदालत को दी। जनवरी 2026 में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि सरकार इस विषय की उच्च स्तर पर समीक्षा कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में सुनवाई पूरी करने के बाद आदेश सुरक्षित रखा था। अब अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए तत्काल कानूनी स्थिति में बदलाव नहीं किया है।
प्रमुख पक्षकारों का रुख
याचिकाकर्ता पक्ष का मूल तर्क यह रहा कि मृत्युदंड के निष्पादन का तरीका भी संवैधानिक कसौटी पर परखा जाना चाहिए। उसके मुताबिक यदि कोई कम पीड़ादायक और अधिक मानवीय विकल्प उपलब्ध हो सकता है तो केवल परंपरा के आधार पर फांसी को जारी रखना उचित नहीं होगा।
दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने वैकल्पिक तरीके को लागू करने की व्यवहारिकता और सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान लीथल इंजेक्शन की विश्वसनीयता तथा दूसरे देशों में सामने आई जटिलताओं का भी संदर्भ आया।
प्रोजेक्ट 39ए की ओर से भी अदालत के सामने यह पक्ष रखा गया कि लीथल इंजेक्शन को स्वतः ही पूर्णतः मानवीय विकल्प मान लेना उचित नहीं होगा, क्योंकि दूसरे देशों में इसके इस्तेमाल से जुड़ी जटिलताओं पर भी बहस मौजूद है।
उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं?
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने फांसी को बदलने का आदेश नहीं दिया है। मौजूदा वैधानिक प्रावधान प्रभावी है और मृत्युदंड के निष्पादन के लिए फांसी ही निर्धारित तरीका है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने भविष्य के वैज्ञानिक या चिकित्सकीय शोध की संभावना को बंद नहीं किया। लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में ठोस वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या व्यावहारिक साक्ष्य सामने आते हैं तो विषय की संवैधानिक समीक्षा की जा सकती है।
इसलिए इस फैसले को फांसी के तरीके पर अंतिम और हमेशा के लिए बंद दरवाजा समझना सही नहीं होगा। यह फिलहाल मौजूदा कानूनी व्यवस्था को जारी रखने वाला फैसला है।
संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं?
तत्काल प्रभाव यह है कि भारत में मृत्युदंड के निष्पादन की प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं आया है। अदालतों द्वारा दी जाने वाली मृत्युदंड की सजा के निष्पादन के लिए मौजूदा कानूनी तरीका प्रभावी रहेगा।
लेकिन व्यापक स्तर पर यह फैसला एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस को जीवित रखता है। सवाल केवल यह नहीं है कि मृत्युदंड होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह भी है कि राज्य द्वारा दी जाने वाली अंतिम सजा को किस तरीके से लागू किया जाना चाहिए।
यह बहस भविष्य में चिकित्सा विज्ञान, फॉरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और जेल प्रशासन से जुड़े विशेषज्ञों की राय के आधार पर फिर सामने आ सकती है।
राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव
यह फैसला किसी राजनीतिक दल या सरकार की नीति पर सीधा निर्णय नहीं है। इसका केंद्र संवैधानिक कानून और मृत्युदंड के निष्पादन की प्रक्रिया है।
फिर भी नीति स्तर पर केंद्र सरकार के लिए यह विषय खुला हुआ है। अदालत ने संकेत दिया है कि सरकार विशेषज्ञों के माध्यम से वैकल्पिक तरीकों का वैज्ञानिक और व्यावहारिक मूल्यांकन कर सकती है।
इससे आगे की बहस का फोकस भावनात्मक तर्कों के बजाय वैज्ञानिक प्रमाण, मानवीय गरिमा, प्रशासनिक व्यवहार्यता और संवैधानिक मानकों पर रह सकता है।
आर्थिक और सामाजिक असर
इस मामले का प्रत्यक्ष आर्थिक प्रभाव सीमित है। इसका मुख्य असर आपराधिक न्याय व्यवस्था और समाज में मृत्युदंड को लेकर होने वाली बहस पर पड़ेगा।
सामाजिक स्तर पर एक बड़ा सवाल यह है कि राज्य द्वारा दी जाने वाली सजा में मानवीय गरिमा की सीमा क्या होनी चाहिए। समर्थक पक्ष मृत्युदंड के निष्पादन को कम पीड़ादायक बनाने की बात करता है, जबकि विरोधी पक्ष यह सवाल उठा सकता है कि किसी भी वैकल्पिक तरीके को पूरी तरह पीड़ारहित साबित करना कितना संभव है।
इसीलिए वैज्ञानिक प्रमाण इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेंगे।
अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रभाव
भारत की मृत्युदंड नीति अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार बहस से भी जुड़ी हुई है। याचिकाकर्ता पक्ष ने संयुक्त राष्ट्र से जुड़े मानकों का हवाला देते हुए कम से कम पीड़ा वाले निष्पादन की दलील दी थी।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं की तुलना सीधे भारत पर लागू नहीं की जा सकती। हर देश का संवैधानिक ढांचा, आपराधिक कानून और प्रशासनिक व्यवस्था अलग है।
इसलिए भारत में किसी वैकल्पिक तरीके को अपनाने का अंतिम सवाल भारतीय संविधान, संसद द्वारा बनाए गए कानून और उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर ही तय होगा।
कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि भविष्य में यदि नए वैज्ञानिक साक्ष्य सामने आते हैं तो क्या सरकार स्वयं कानून में बदलाव का प्रस्ताव करेगी या मामला फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने आएगा।
दूसरा सवाल यह है कि यदि कोई वैकल्पिक तरीका प्रस्तावित होता है तो उसकी सुरक्षा, विश्वसनीयता और चिकित्सा संबंधी प्रक्रिया का स्वतंत्र मूल्यांकन कौन करेगा।
तीसरा सवाल मृत्युदंड की व्यापक संवैधानिक स्थिति से जुड़ा है। फांसी के तरीके पर बहस और मृत्युदंड की संवैधानिक वैधता दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। मौजूदा याचिका मुख्य रूप से निष्पादन के तरीके पर केंद्रित थी।
आगे क्या होगा?
फिलहाल फांसी का मौजूदा तरीका जारी रहेगा। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की संबंधित धारा में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
भविष्य में यदि सरकार विशेषज्ञ समिति, वैज्ञानिक अध्ययन या फॉरेंसिक समीक्षा के जरिए कोई नया निष्कर्ष सामने लाती है, तो यह विषय फिर सार्वजनिक और न्यायिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है।
अदालत द्वारा भविष्य के वैज्ञानिक, चिकित्सकीय और व्यावहारिक साक्ष्यों के लिए रास्ता खुला रखना इस मामले का सबसे अहम दीर्घकालिक पहलू है।
संपादकीय दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट का फैसला तत्काल तौर पर भारत में मृत्युदंड के निष्पादन की व्यवस्था नहीं बदलता। फांसी फिलहाल वैधानिक तरीका बनी रहेगी। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि विज्ञान और चिकित्सा से जुड़े ठोस नए साक्ष्य भविष्य में संवैधानिक समीक्षा का आधार बन सकते हैं। इसलिए यह फैसला बहस का अंत नहीं, बल्कि मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखते हुए भविष्य के लिए न्यायिक दरवाजा खुला रखने वाला निर्णय है।
Asif Khan
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।