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चेन्नई के परंदूर एयरपोर्ट प्रोजेक्ट पर बड़ा फैसला, तमिलनाडु सरकार ने योजना रद्द की

Apurva Choudhary 2026-08-24 20:05:04
चेन्नई के परंदूर एयरपोर्ट प्रोजेक्ट पर बड़ा फैसला, तमिलनाडु सरकार ने योजना रद्द की
तमिलनाडु सरकार ने चेन्नई के पास प्रस्तावित परंदूर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया है। सरकार अब ऐसी वैकल्पिक साइट तलाशेगी, जहां कृषि भूमि और स्थानीय आबादी पर कम असर पड़े। मौजूदा चेन्नई एयरपोर्ट का भी विस्तार प्रस्तावित है। फैसले ने विकास, पर्यावरण और राजनीतिक जवाबदेही पर बहस तेज कर दी है।

📍 लोकेशन: चेन्नई, तमिलनाडु
📰 डेट: 24 अगस्त 2026
✍️ बाइलाइन: Apurva Choudhary 

परंदूर एयरपोर्ट प्रोजेक्ट पर सरकार का बड़ा फैसला
तमिलनाडु सरकार ने चेन्नई के दूसरे एयरपोर्ट के लिए प्रस्तावित परंदूर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को रद्द करने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने सोमवार को विधानसभा में घोषणा की कि सरकार अब चेन्नई के लिए एक वैकल्पिक स्थान पर नया एयरपोर्ट विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ेगी।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब चेन्नई की passenger और cargo क्षमता बढ़ाने की जरूरत लगातार सामने आ रही है। Reuters के मुताबिक तमिलनाडु देश के प्रमुख manufacturing hubs में है और चेन्नई में Hyundai, Renault, Foxconn तथा Tata Electronics जैसी बड़ी औद्योगिक कंपनियों की मौजूदगी है।

परंदूर योजना क्यों हुई रद्द
सरकार का मुख्य तर्क कृषि भूमि, स्थानीय आबादी और किसानों की आजीविका पर पड़ने वाले संभावित असर से जुड़ा है। परंदूर में प्रस्तावित परियोजना को लेकर लंबे समय से स्थानीय निवासियों और किसानों का विरोध सामने आता रहा था।
मुख्यमंत्री विजय ने विधानसभा में कहा कि चेन्नई को नए एयरपोर्ट की जरूरत से सरकार पीछे नहीं हट रही है। लेकिन नई साइट ऐसी होनी चाहिए, जहां कृषि भूमि और residential areas पर असर न्यूनतम हो तथा लोगों की livelihood बाधित न हो।
यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण policy angle है। सरकार ने एयरपोर्ट की जरूरत को खत्म नहीं किया है, बल्कि उसके लिए चुनी गई location को बदलने का फैसला किया है।

₹27,400 करोड़ की परियोजना थी परंदूर योजना
परंदूर एयरपोर्ट परियोजना की अनुमानित लागत करीब ₹274 अरब यानी ₹27,400 करोड़ थी। Reuters के अनुसार इसकी डॉलर value करीब $2.86 billion थी। परियोजना को चेन्नई की बढ़ती aviation और industrial requirements के लिए महत्वपूर्ण infrastructure project माना जा रहा था।
परियोजना की तैयारी काफी आगे बढ़ चुकी थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार केंद्र से आवश्यक aviation approvals भी मिल चुके थे और land acquisition की प्रक्रिया चल रही थी। यही कारण है कि cancellation के बाद infrastructure planning और sunk costs को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

चेन्नई को फिर भी दूसरे एयरपोर्ट की जरूरत
परंदूर योजना रद्द होने का अर्थ यह नहीं है कि चेन्नई का दूसरा एयरपोर्ट अब जरूरी नहीं रहा। सरकार स्वयं मान रही है कि बढ़ती passenger traffic, industrial expansion और cargo movement के कारण अतिरिक्त aviation capacity की जरूरत बनी हुई है।
चेन्नई का मौजूदा Meenambakkam airport फिलहाल करीब 30 million passengers annually की क्षमता संभालता है। Terminal 3 के operational होने के बाद capacity बढ़ने की उम्मीद है, जबकि सरकार ने आगे पांचवें terminal के जरिए capacity expansion की योजना भी बताई है।

पांचवें टर्मिनल से बढ़ेगी क्षमता
सरकार मौजूदा चेन्नई एयरपोर्ट के विस्तार पर भी काम करना चाहती है। रिपोर्टों के अनुसार प्रस्तावित fifth terminal से लगभग 20 million additional passengers annually संभालने की क्षमता जुड़ सकती है।
यह short और medium term में aviation pressure कम करने की कोशिश हो सकती है। लेकिन केवल existing airport expansion से चेन्नई की long-term aviation requirement पूरी होगी या नहीं, यह passenger growth, cargo demand और available airport land जैसे factors पर निर्भर करेगा।
यही वजह है कि alternative greenfield airport की तलाश अभी भी सरकार के infrastructure agenda का अहम हिस्सा बनी हुई है।

नई साइट चुनना आसान नहीं होगा
अब सबसे बड़ी चुनौती नई location की पहचान है। सरकार को केवल ऐसी जगह नहीं तलाशनी होगी जहां विरोध कम हो, बल्कि runway orientation, aviation safety, airspace, connectivity, land availability, environmental impact और future expansion की संभावनाओं का भी अध्ययन करना होगा।
सरकार ने कहा है कि alternative sites की technical feasibility और अन्य आवश्यक पहलुओं की जांच की जाएगी।
यानी राजनीतिक फैसला हो चुका है, लेकिन practical implementation की प्रक्रिया अभी शुरू होनी है। किसी नई साइट को चुनने के बाद land acquisition, environmental और regulatory approvals तथा construction tendering जैसी प्रक्रियाएं फिर से करनी पड़ सकती हैं।

राजनीतिक विवाद भी तेज
परंदूर परियोजना रद्द होने के साथ ही राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने फैसले की आलोचना करते हुए इसे तमिलनाडु के development trajectory के लिए बड़ा झटका बताया। उनका तर्क है कि परंदूर के चयन से पहले कई विकल्पों का अध्ययन हो चुका था और परियोजना की तैयारी काफी आगे बढ़ गई थी।
दूसरी ओर, K. अन्नामलाई ने भी फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि नई जगह चुनने, केंद्र सरकार और statutory bodies से approvals लेने, land acquisition तथा construction की पूरी प्रक्रिया में काफी समय लग सकता है। उन्होंने संभावित देरी को लेकर गंभीर चिंता जताई है।
इन राजनीतिक दावों को फिलहाल forecasts के रूप में देखना चाहिए। नई साइट का नाम, उसकी feasibility और approval timeline सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि वास्तविक देरी कितनी होगी।

किसानों और विकास के बीच असली सवाल

परंदूर विवाद एक बड़े policy dilemma को सामने लाता है। एक तरफ Chennai जैसे rapidly growing industrial region को high-capacity airport infrastructure चाहिए, वहीं दूसरी तरफ बड़े infrastructure projects के लिए कृषि भूमि और residential areas का अधिग्रहण सामाजिक और पर्यावरणीय असर पैदा कर सकता है।
किसानों के विरोध को केवल development विरोधी नजरिए से देखना भी अधूरा होगा। जमीन, livelihood और स्थानीय communities पर पड़ने वाला असर किसी भी बड़े public infrastructure project की feasibility का हिस्सा होना चाहिए।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अगर किसी औद्योगिक राज्य की logistics और aviation capacity समय पर नहीं बढ़ती, तो इसका असर investment decisions, cargo movement और regional competitiveness पर पड़ सकता है। Reuters ने भी industry bodies के हवाले से Chennai के aviation infrastructure को industrial, logistics और services sectors की जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण बताया है।

चेन्नई की औद्योगिक अर्थव्यवस्था पर असर
चेन्नई को भारत के प्रमुख automobile और manufacturing hubs में गिना जाता है। शहर और इसके आसपास automotive, electronics और technology manufacturing का बड़ा ecosystem मौजूद है।
ऐसे industrial cluster के लिए international airport सिर्फ passenger travel का माध्यम नहीं होता। यह executives, engineers, foreign investors, high-value cargo और global supply chains के लिए भी महत्वपूर्ण infrastructure है।
इसीलिए दूसरे एयरपोर्ट की योजना को अनिश्चित काल तक टालना economic planning के लिहाज से जोखिम पैदा कर सकता है। सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि नई location चुनने की प्रक्रिया को social consultation के साथ-साथ पर्याप्त speed भी दी जाए।

क्या परंदूर रद्द करना सही फैसला है
इस सवाल का सीधा जवाब देना फिलहाल जल्दबाजी होगी। अगर परंदूर में land acquisition और livelihood disruption का असर वास्तव में व्यापक था और कोई technically viable alternative कम सामाजिक लागत पर उपलब्ध है, तो location बदलने का फैसला policy दृष्टि से उचित ठहराया जा सकता है।
लेकिन अगर नई site खोजने में कई साल लगते हैं और approvals तथा construction प्रक्रिया फिर से शून्य से शुरू होती है, तो Chennai की aviation capacity पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए फैसले की सफलता इस बात से तय होगी कि सरकार alternative site कितनी जल्दी और कितनी पारदर्शी प्रक्रिया से चुनती है।

आगे की राह में क्या महत्वपूर्ण होगा
अब सबसे अहम कदम alternative locations की technical screening है। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि किन parameters के आधार पर नई साइट चुनी जाएगी और agricultural land, residential displacement तथा environmental impact को assessment में कितना weight दिया जाएगा।
इसके साथ existing Chennai airport expansion को भी समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाना होगा। अगर दोनों projects समानांतर गति से चलते हैं, तो greenfield airport बनने तक बढ़ती passenger demand को संभालने में मदद मिल सकती है।

नई परियोजना के लिए public consultation भी महत्वपूर्ण होगी। परंदूर के अनुभव के बाद सरकार के लिए यह साबित करना जरूरी होगा कि infrastructure planning में स्थानीय समुदायों की concerns को शुरुआत से ही decision-making का हिस्सा बनाया जा रहा है।
परंदूर एयरपोर्ट प्रोजेक्ट का अंत चेन्नई की दूसरे एयरपोर्ट की जरूरत का अंत नहीं है। सरकार ने location बदलने का फैसला किया है, जबकि aviation capacity बढ़ाने का लक्ष्य बरकरार है।
अब असली परीक्षा नई जगह की पहचान और उसके बाद की execution होगी। अगर सरकार ऐसी site खोज पाती है जो aviation requirements पूरी करने के साथ किसानों, कृषि भूमि और स्थानीय आबादी पर कम असर डाले, तो परंदूर का विवाद एक बेहतर planning model में बदल सकता है।
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Apurva Choudhary

Apurva Choudhary

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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