जंतर-मंतर प्रदर्शन में कथित पैलेट गन इस्तेमाल को लेकर राहुल गांधी ने दिल्ली पुलिस से जांच का ब्योरा मांगा। मामला अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में गठित पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी तक पहुंच चुका है। पुलिस बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों की हिंसा दोनों पहलुओं की जांच होगी। अंतिम जवाब जांच के निष्कर्षों से मिलेगा।
तारीख: 21 अगस्त 2026
बाय: Mohd Naved
जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित पैलेट गन इस्तेमाल का विवाद अब राजनीतिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर तेज हो गया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी 21 अगस्त को दिल्ली पुलिस के DCP कार्यालय पहुंचे और मामले में चल रही जांच तथा कार्रवाई का ब्योरा लेने की कोशिश की।
यह विवाद इसलिए अहम है क्योंकि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन इस्तेमाल किए जाने के आरोपों को खारिज किया था, जबकि बाद में सामने आई पुलिस डायरी से एंटी-रायट गन के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठे। सुप्रीम कोर्ट ने भी 20 अगस्त को पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी गठित कर पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच का रास्ता खोल दिया है।
20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर प्रस्तावित मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव हुआ। पुलिस के मुताबिक हालात बिगड़ने के बाद कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए बल प्रयोग किया गया। पुलिस ने यह भी कहा कि प्रदर्शन में सुरक्षा कर्मियों पर हमले और बैरिकेड तोड़ने जैसी घटनाएं हुईं।
इसके बाद कुछ प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि सुरक्षा बलों ने पैलेट गन या एंटी-रायट गन से फायर किया। दिल्ली पुलिस ने शुरुआती तौर पर पैलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया और दावे को भ्रामक बताया।
विवाद तब और गहरा हुआ जब मीडिया रिपोर्टों में संसद मार्ग थाने की जनरल डायरी की एक प्रविष्टि का हवाला देते हुए बताया गया कि रैपिड एक्शन फोर्स ने एंटी-रायट गन का इस्तेमाल किया था। रिपोर्ट के मुताबिक दो राउंड फायर किए गए और कार्रवाई DCP स्तर के अधिकारी के निर्देश पर हुई थी।
पैलेट गन विवाद को समझने के लिए 20 जुलाई की पूरी घटनाक्रम श्रृंखला देखना जरूरी है। प्रदर्शन का मुद्दा परीक्षा व्यवस्था और कथित पेपर लीक से जुड़ा था। संसद मार्च के दौरान जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ।
दिल्ली पुलिस की दलील है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो रही थी और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी घायल हुए। दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों और विपक्षी नेताओं ने पुलिस पर जरूरत से ज्यादा बल इस्तेमाल करने का इल्जाम लगाया।
राहुल गांधी ने इस विवाद को राजनीतिक जवाबदेही के मुद्दे के तौर पर उठाया। उन्होंने घायल प्रदर्शनकारियों का मामला सार्वजनिक रूप से सामने रखा और पैलेट गन इस्तेमाल की स्वतंत्र जांच की मांग की।
20 जुलाई के बाद पैलेट गन के कथित इस्तेमाल की तस्वीरें और घायल प्रदर्शनकारियों के बयान सामने आए। एक 19 वर्षीय प्रदर्शनकारी के आंख में गंभीर चोट की रिपोर्ट भी सामने आई। इस मामले ने पुलिस कार्रवाई की प्रकृति पर गंभीर सवाल खड़े किए।
दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन इस्तेमाल से इनकार किया, जबकि सीआरपीएफ ने भी आरोपों को गंभीरता से लेते हुए अपने स्तर पर जांच शुरू की। इससे मामला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा। अदालत के सामने पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों पर कथित अत्यधिक बल, महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार और पुलिसकर्मियों के घायल होने जैसे कई पहलू रखे गए।
18 अगस्त की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जांच की दिशा तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। 20 अगस्त को पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड इंक्वायरी कमेटी गठित कर दी गई।
राहुल गांधी और विपक्ष का मुख्य सवाल पुलिस बल प्रयोग की वैधता, पैलेट गन के कथित इस्तेमाल और घायल प्रदर्शनकारियों की जवाबदेही से जुड़ा है। कांग्रेस इस मामले में स्वतंत्र और प्रभावी जांच की मांग कर रही है।
दिल्ली पुलिस का पक्ष अलग है। पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बिगड़ने, बैरिकेड तोड़े जाने और सुरक्षा कर्मियों के घायल होने का हवाला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पुलिस ने यह भी कहा कि प्रदर्शन में कुछ ऐसे लोग शामिल हो गए थे जिनका पहले से आपराधिक रिकॉर्ड था।
पुलिस ने सादे कपड़ों में तैनात कर्मियों को लेकर भी सफाई दी है। सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने कहा कि सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की तैनाती भीड़ नियंत्रण की रणनीति का हिस्सा थी।
उपलब्ध सामग्री में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर शुरुआती पुलिस इनकार और बाद में सामने आई पुलिस डायरी की जानकारी के बीच सवाल पैदा हुए हैं।
एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक संसद मार्ग थाने की जनरल डायरी में रैपिड एक्शन फोर्स द्वारा एंटी-रायट गन के दो बार इस्तेमाल का उल्लेख है। रिपोर्ट में इसे DCP स्तर के अधिकारी के निर्देश से जोड़ा गया है।
हालांकि, एंटी-रायट गन का उल्लेख अपने आप में यह अंतिम रूप से साबित नहीं करता कि प्रदर्शनकारियों पर किस प्रकार के प्रोजेक्टाइल इस्तेमाल हुए और किस परिस्थिति में हुए। यही वजह है कि इस मामले में आधिकारिक जांच और मेडिकल साक्ष्य महत्वपूर्ण होंगे।
सुप्रीम कोर्ट की कमेटी को पुलिस बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों की ओर से हुई कथित हिंसा, दोनों पहलुओं की जांच करनी है। इससे जांच का दायरा एकतरफा आरोप से आगे जाता है।
राहुल गांधी का DCP कार्यालय पहुंचना इस मामले को दोबारा राजनीतिक सुर्खियों में ला सकता है। विपक्ष इसे पुलिस जवाबदेही और छात्रों के अधिकारों का मुद्दा बना रहा है।
दूसरी तरफ पुलिस और केंद्र सरकार के लिए सबसे अहम सवाल यह रहेगा कि जांच में बल प्रयोग की आवश्यकता, अनुपातिकता और आदेश की वैधता को किस तरह परखा जाता है।
अगर जांच में नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो जिम्मेदारी तय करने का दबाव बढ़ेगा। अगर आरोपों की पुष्टि नहीं होती है तो पुलिस के खिलाफ लगाए गए कुछ राजनीतिक आरोप कमजोर पड़ सकते हैं। दोनों स्थितियों में स्वतंत्र जांच की विश्वसनीयता महत्वपूर्ण रहेगी।
जंतर-मंतर विवाद ने विपक्ष और सरकार के बीच टकराव को और तेज किया है। राहुल गांधी पहले भी इस मामले को संसद, मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर उठा चुके हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट की कमेटी बनने के बाद राजनीतिक बहस का एक बड़ा हिस्सा जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा। इससे सरकार और पुलिस दोनों पर दस्तावेजी जवाबदेही का दबाव बढ़ सकता है।
इस प्रकरण का व्यापक नीतिगत असर भी हो सकता है। भीड़ नियंत्रण के दौरान किस तरह के हथियार इस्तेमाल किए जाएं, किस स्तर पर अनुमति जरूरी हो और बल प्रयोग की समीक्षा कैसे हो, इन सवालों पर स्पष्ट प्रोटोकॉल की जरूरत सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने भी पैलेट गन के इस्तेमाल के लिए प्रोटोकॉल तय करने की दिशा में संकेत दिया है।
इस विवाद का सीधा आर्थिक असर सीमित है, लेकिन सामाजिक असर महत्वपूर्ण है। परीक्षा व्यवस्था और पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर पहले से असंतोष झेल रहे छात्रों के बीच पुलिस कार्रवाई की तस्वीरें और घायल प्रदर्शनकारियों के मामले भरोसे के संकट को बढ़ा सकते हैं।
दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बढ़ने और कई इलाकों में आवाजाही प्रभावित होने से आम नागरिकों पर भी असर पड़ा था। ऐसे मामलों में प्रशासन के लिए कानून-व्यवस्था और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के बीच संतुलन कायम रखना अहम हो जाता है।
यह मामला मुख्य रूप से घरेलू राजनीतिक और कानूनी विवाद है। इसका तत्काल अंतरराष्ट्रीय असर सीमित है। लेकिन लोकतांत्रिक देशों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन, पुलिस जवाबदेही और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मामले अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श का हिस्सा बनते हैं।
भारत के लिए भी यह महत्वपूर्ण है कि किसी भी जांच में संस्थागत पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया का पालन स्पष्ट रूप से दिखाई दे। इससे देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सार्वजनिक भरोसे को मजबूती मिल सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि 20 जुलाई को वास्तव में किस प्रकार के प्रोजेक्टाइल इस्तेमाल हुए थे और उनका लक्ष्य क्या था।
दूसरा सवाल आदेश की प्रकृति से जुड़ा है। यदि एंटी-रायट गन इस्तेमाल करने का आदेश दिया गया था, तो उसे किस अधिकारी ने किस परिस्थिति में मंजूरी दी और क्या निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन हुआ?
तीसरा सवाल घायल प्रदर्शनकारियों की मेडिकल रिपोर्ट से जुड़ा है। चोटों की प्रकृति और इस्तेमाल किए गए प्रोजेक्टाइल के बीच वैज्ञानिक संबंध जांच का अहम हिस्सा होगा।
चौथा सवाल पुलिसकर्मियों के घायल होने और प्रदर्शनकारियों द्वारा कथित हिंसा का है। सुप्रीम कोर्ट की कमेटी को दोनों पक्षों के आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों को साथ रखकर देखना होगा।
अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाई-पावर्ड कमेटी की होगी। कमेटी की अध्यक्षता पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं। इसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश शालिनी कौर, पूर्व सीबीआई निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और सेवानिवृत्त मेघालय डीजीपी एल.आर. बिश्नोई शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी को केवल एक बार की जांच तक सीमित नहीं रखा है। अदालत ने आवधिक आकलन और अंतरिम निष्कर्षों की दिशा भी तय की है। महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित हिंसा और दुर्व्यवहार को प्राथमिकता वाले मुद्दों में रखा गया है।
राहुल गांधी का DCP कार्यालय जाना इसी व्यापक जवाबदेही की राजनीतिक कड़ी है। अब असली कसौटी यह होगी कि जांच कितनी पारदर्शी होती है और उपलब्ध दस्तावेज, मेडिकल साक्ष्य, वीडियो तथा अधिकारियों के आदेशों से क्या निष्कर्ष निकलता है।
जंतर-मंतर पैलेट गन विवाद को केवल सत्ता और विपक्ष के टकराव के रूप में देखना अधूरा होगा। यहां दो समानांतर सवाल हैं। पहला, क्या सुरक्षा बलों ने परिस्थिति के अनुरूप और निर्धारित नियमों के तहत बल प्रयोग किया। दूसरा, क्या प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ हिंसा हुई और उसकी जिम्मेदारी किसकी थी।
राहुल गांधी का DCP कार्यालय पहुंचना राजनीतिक दबाव बढ़ाने वाला कदम है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष राजनीतिक बयानों से नहीं, बल्कि जांच और साक्ष्यों से निकलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की हाई-पावर्ड कमेटी अब इस पूरे विवाद की विश्वसनीयता तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।