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अब हर साल होगा पायलटों का डोप टेस्ट? DGCA कर रहा 100% टेस्टिंग पर मंथन

Asif Khan 2026-08-25 14:46:25
अब हर साल होगा पायलटों का डोप टेस्ट? DGCA कर रहा 100% टेस्टिंग पर मंथन
  • पायलटों की ड्रग टेस्टिंग पर अब बड़ा बदलाव?
  • 10% से 100% टेस्टिंग की तैयारी, DGCA का बड़ा प्लान
  • हर पायलट की साल में एक बार होगी जांच?

  • एयर इंडिया की फुकेत-दिल्ली उड़ान घटना के बाद पायलटों की डोप टेस्टिंग पर सख्ती बढ़ सकती है। मौजूदा व्यवस्था में सालाना कम से कम 10% कर्मियों की रैंडम जांच होती है। सरकार अब हर पायलट की साल में एक बार जांच पर विचार कर रही है। फैसला सुरक्षा और परिचालन असर के संतुलन पर निर्भर करेगा।

    स्थान: नई दिल्ली

    तारीख: 25 अगस्त 2026
    By Mohd Naved

    अब हर साल होगा पायलटों का डोप टेस्ट? DGCA कर रहा 100% टेस्टिंग पर मंथन

    भारत में एयरलाइन पायलटों की डोप टेस्टिंग व्यवस्था में बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय और Directorate General of Civil Aviation यानी DGCA इस बात पर विचार कर रहे हैं कि मौजूदा सालाना रैंडम टेस्टिंग व्यवस्था को बढ़ाकर ऐसा किया जाए, जिसमें देश के हर पायलट की साल में कम से कम एक बार जांच हो।

    लेकिन यहां एक अहम बात साफ रहनी चाहिए। यह अभी लागू नियम नहीं है। नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने 25 अगस्त को कहा कि DGCA इस प्रस्ताव पर हितधारकों से बातचीत कर रहा है और सुरक्षा के साथ इसके परिचालन असर का भी आकलन किया जा रहा है।

    क्या हुआ?

    पूरे मामले की पृष्ठभूमि 4 अगस्त 2026 की Air India उड़ान AI2379 से जुड़ी है। यह एयरबस ए320 विमान फुकेत से दिल्ली आ रहा था। उड़ान के दौरान विमान ने करीब 300 फीट की अचानक ऊंचाई खोई और बाद में स्थिर होकर दिल्ली में सुरक्षित उतर गया।

    नागरिक उड्डयन मंत्रालय के आधिकारिक बयान के मुताबिक विमान में 137 यात्री और आठ क्रू सदस्य थे। घटना में 20 यात्रियों और चार केबिन क्रू सदस्यों के घायल होने की पुष्टि की गई। घटना की जांच Aircraft Accident Investigation Bureau यानी AAIB ने शुरू की।

    घटना के बाद दोनों पायलटों की निर्धारित psychoactive substance screening हुई। मंत्रालय के शुरुआती बयान में Pilot-in-Command की जांच में ऐसा परिणाम आने की बात कही गई, जिसके लिए confirmatory testing जरूरी थी।

    बाद की मीडिया रिपोर्टों में confirmatory test में पायलट के marijuana के लिए positive आने की जानकारी सामने आई। यह तथ्य विमान की altitude-loss घटना का कारण साबित नहीं करता। विमान की तकनीकी और परिचालन वजहों की जांच अलग से जारी है।

    पूरा संदर्भ क्या है?

    भारत में पायलटों और दूसरे aviation personnel के लिए psychoactive substance testing की व्यवस्था पहले से मौजूद है। मौजूदा DGCA framework के तहत flight crew और air traffic controllers के कम से कम 10% कर्मचारियों को हर साल रैंडम आधार पर टेस्ट किया जाना है।

    इसका अर्थ यह नहीं है कि बाकी 90% कर्मचारियों की कभी जांच नहीं होती। सुरक्षा संबंधी घटना, भर्ती और कुछ दूसरे निर्धारित मौकों पर भी परीक्षण किया जा सकता है। Air India की Phuket-Delhi घटना के बाद हुई जांच इसी व्यापक व्यवस्था का हिस्सा थी।

    अब सरकार जिस विकल्प पर विचार कर रही है, वह मौजूदा 10% कवरेज से काफी आगे जाता है। प्रस्ताव का एक मॉडल यह है कि हर पायलट को वर्ष में कम से कम एक बार, लेकिन किसी भी रैंडम समय पर टेस्ट किया जाए।

    पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

    Air India ने 13 अगस्त से अपने पूरे ग्रुप के पायलटों की psychoactive substance screening शुरू करने का फैसला किया था। इसमें Air India और Air India Express के पायलट शामिल हैं। यह कदम मौजूदा DGCA न्यूनतम आवश्यकता से आगे जाकर उठाया गया।

    इसके बाद पायलटों के संगठन Federation of Indian Pilots ने भी DGCA के सामने परीक्षण व्यवस्था में बदलाव का सुझाव रखा। संगठन ने सालाना रैंडम टेस्टिंग का दायरा कम से कम 25% करने और urine test के साथ oral-fluid testing को complementary method के रूप में शामिल करने की सिफारिश की।

    इसलिए मौजूदा बहस केवल 10% बनाम 100% टेस्टिंग तक सीमित नहीं है। इसमें टेस्टिंग की गति, laboratory capacity, crew downtime, privacy, confirmatory testing और false positive के जोखिम जैसे सवाल भी जुड़े हैं।

    प्रमुख पक्षकारों का रुख

    नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू के मुताबिक DGCA 100% annual testing के operational impact का आकलन कर रहा है। सरकार का मकसद safety requirements को मजबूत करना है, लेकिन एयरलाइन संचालन पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखा जाएगा।

    Federation of Indian Pilots का रुख थोड़ा अलग है। संगठन व्यापक जांच का समर्थन करता है, लेकिन इसके लिए risk-based और hybrid testing model की वकालत कर रहा है। उसके मुताबिक oral-fluid testing तेज screening में मदद कर सकती है, जबकि urine-based testing कुछ परिस्थितियों में जारी रहनी चाहिए।

    यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी screening में substance का पता चलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पायलट उड़ान के समय impaired था। भारतीय न्यायिक रिकॉर्ड में भी screening और confirmatory testing तथा medical review की प्रक्रिया का उल्लेख है।

    उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं?

    DGCA की मौजूदा व्यवस्था में screening और confirmatory testing अलग चरण हैं। प्रारंभिक test में non-negative परिणाम आने पर नमूने की confirmatory जांच की जाती है। उसके बाद medical review की प्रक्रिया भी लागू हो सकती है।

    DGCA framework में छह प्रमुख psychoactive substance categories की जांच का प्रावधान है। इनमें amphetamine और amphetamine-type stimulants, opiates और metabolites, cannabis as THC, cocaine, barbiturates और benzodiazepines शामिल हैं।

    इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल किसी substance की मौजूदगी पकड़ना नहीं है। मकसद aviation safety से जुड़े personnel को ऐसे psychoactive substances के प्रभाव से दूर रखना है, जो safety-sensitive duties को प्रभावित कर सकते हैं।

    संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं?

    अगर 100% annual testing लागू होती है, तो pilot drug screening का coverage मौजूदा न्यूनतम 10% से कई गुना बढ़ जाएगा। इससे regulatory oversight मजबूत हो सकता है और एयरलाइन कंपनियों के लिए compliance की निगरानी अधिक व्यापक होगी।

    दूसरी तरफ operational challenge भी बड़ा होगा। हजारों पायलटों की रैंडम सालाना जांच के लिए laboratories, trained medical personnel, testing infrastructure और confirmatory testing capacity का विस्तार करना पड़ेगा।

    एयरलाइन संचालन में crew availability भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी screening के बाद confirmatory testing की जरूरत पड़े, तो duty roster और flight operations पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से सरकार safety और operational impact के बीच संतुलन की बात कर रही है।

    राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव

    इस प्रस्ताव से aviation regulation में एक महत्वपूर्ण नीति बदलाव की दिशा बन सकती है। अभी regulatory model minimum annual random coverage पर आधारित है। नया मॉडल हर pilot को कम से कम एक बार annual testing के दायरे में ला सकता है।

    हालांकि इसे लागू करने से पहले DGCA को testing protocol, laboratory standards, randomisation mechanism, data privacy और confirmatory testing की प्रक्रिया स्पष्ट करनी होगी।

    सिर्फ संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। जांच की विश्वसनीयता और परिणामों की निष्पक्ष समीक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।

    आर्थिक और सामाजिक असर

    एविएशन में passenger confidence सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा संकेतकों में से एक है। व्यापक testing व्यवस्था यात्रियों को यह भरोसा देने में मदद कर सकती है कि flight crew की fitness पर regulatory scrutiny मौजूद है।

    लेकिन इसका खर्च भी होगा। Testing, laboratories, medical review और अतिरिक्त administrative व्यवस्था का खर्च एयरलाइनों पर आएगा। लंबी अवधि में इसका असर operational cost पर पड़ सकता है।

    यहां एक और पहलू है। भारत का aviation sector तेजी से विस्तार कर रहा है। ऐसे में drug-testing infrastructure को भी उसी अनुपात में बढ़ाना पड़ेगा। FIP ने इसी संदर्भ में oral-fluid testing को complementary option के रूप में रखने की मांग की है।

    अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रभाव

    भारत की मौजूदा व्यवस्था ICAO के व्यापक aviation safety framework के अनुरूप psychoactive substance testing पर आधारित है। ICAO के दस्तावेज में भारत की व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कम से कम 10% कर्मचारियों की annual coverage और random selection का जिक्र किया गया है।

    इसलिए भारत का संभावित 100% annual coverage model मौजूदा minimum requirement की तुलना में ज्यादा व्यापक व्यवस्था होगी। हालांकि इसे अंतरराष्ट्रीय best practice घोषित करने से पहले इसके operational और medical परिणामों का स्वतंत्र मूल्यांकन जरूरी होगा।

    कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?

    सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 100% annual testing वास्तव में लागू होगी या DGCA पहले 25% या किसी अन्य coverage model को अपनाएगा।

    दूसरा सवाल testing methodology का है। क्या urine testing ही मुख्य तरीका रहेगा या oral-fluid testing को भी regulatory framework में जगह मिलेगी?

    तीसरा सवाल confirmatory testing का है। यदि screening में non-negative परिणाम आता है, तो final regulatory action से पहले medical review और confirmatory testing की प्रक्रिया कितनी तेज और पारदर्शी होगी?

    चौथा सवाल privacy और professional safeguards का है। पायलटों के medical और drug-testing records को किस तरह सुरक्षित रखा जाएगा, यह भी स्पष्ट होना जरूरी होगा।

    आगे क्या होगा?

    फिलहाल DGCA stakeholder consultation और operational assessment के चरण में है। सरकार ने अभी 100% annual pilot testing को अंतिम नियम के तौर पर अधिसूचित नहीं किया है।

    इस बीच Air India और Air India Express अपने पायलटों की व्यापक screening कर रहे हैं। दूसरी तरफ पायलटों का संगठन testing coverage बढ़ाने के साथ testing methodology में सुधार की मांग कर रहा है।

    इस पूरे मामले में AI2379 की technical investigation भी महत्वपूर्ण रहेगी। विमान की altitude loss घटना और pilot drug-test result को अलग-अलग जांचना जरूरी है। उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड अभी यह स्थापित नहीं करता कि psychoactive substance ने विमान की घटना को जन्म दिया था। AAIB की जांच इसी तरह के कारणात्मक सवालों का जवाब देने के लिए चल रही है।

    संपादकीय निष्कर्ष

    पायलटों की annual drug testing का प्रस्ताव aviation safety के लिहाज से गंभीर regulatory कदम है। लेकिन 10% से 100% की छलांग को केवल संख्या के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए।

    प्रभावी व्यवस्था वही होगी जिसमें random testing व्यापक हो, laboratory प्रक्रिया विश्वसनीय हो, non-negative परिणाम की confirmatory जांच अनिवार्य हो और medical review निष्पक्ष रहे। साथ ही testing को flight operations के लिए व्यावहारिक बनाना होगा।

    AI2379 घटना ने एक महत्वपूर्ण regulatory सवाल सामने रखा है। पायलट की fitness और aviation safety में कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिए, लेकिन हर test result को वैज्ञानिक और नियामकीय प्रक्रिया के तहत ही समझा जाना चाहिए। फिलहाल 100% annual testing एक प्रस्ताव है, अंतिम नियम नहीं।

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    Asif Khan

    Shah Times Reporter

    शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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