एयर इंडिया ग्रुप ने सभी पायलटों के लिए अनिवार्य ड्रग स्क्रीनिंग शुरू कर दी है। यह कदम फुकेत-दिल्ली उड़ान में अचानक करीब 300 फीट ऊंचाई घटने और कमांडर के ड्रग टेस्ट में प्रतिबंधित पदार्थ मिलने की रिपोर्ट के बाद उठाया गया है। जांच के बीच एविएशन सेफ्टी निगरानी और कड़ी होगी।
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नई दिल्ली | 13 अगस्त 2026 | अपूर्वा चौधरी
एयर इंडिया ने सभी पायलटों की ड्रग स्क्रीनिंग शुरू की
एयर इंडिया ग्रुप ने एविएशन सेफ्टी को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए अपने सभी पायलटों की अनिवार्य ड्रग स्क्रीनिंग शुरू कर दी है। यह व्यवस्था एयर इंडिया के साथ-साथ एयर इंडिया एक्सप्रेस के पायलटों पर भी लागू होगी। नया सिस्टम सामान्य रैंडम टेस्टिंग व्यवस्था से ज्यादा व्यापक है और इसका मकसद उड़ान ड्यूटी के दौरान प्रतिबंधित या प्रदर्शन को प्रभावित करने वाले पदार्थों के इस्तेमाल की आशंका को कम करना है।
यह फैसला 4 अगस्त को हुई फुकेत-दिल्ली उड़ान की घटना के बाद सामने आया है। उस फ्लाइट ने क्रूज़ के दौरान अचानक लगभग 300 फीट की ऊंचाई खो दी थी। घटना की जांच अभी जारी है और पायलट के ड्रग टेस्ट से जुड़ी रिपोर्ट को भी जांच के व्यापक दायरे में देखा जा रहा है।
फुकेत-दिल्ली फ्लाइट में क्या हुआ था?
4 अगस्त को एयर इंडिया की AI2379 उड़ान फुकेत से दिल्ली के लिए रवाना हुई थी। विमान एयरबस A320neo था और उड़ान के दौरान अचानक उसकी ऊंचाई करीब 300 फीट कम हो गई।
विमान ने बाद में स्थिति संभाली और दिल्ली में सुरक्षित लैंडिंग की। घटना के दौरान यात्रियों और क्रू के कुछ सदस्यों को चोटें आने की जानकारी सामने आई। हालांकि, घायलों की संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टें सामने आई हैं। शुरुआती आधिकारिक जानकारी में 17 लोगों के घायल होने की बात कही गई थी, जबकि बाद की रिपोर्टों में संख्या अधिक बताई गई। इसलिए अंतिम आधिकारिक आंकड़े को ही निर्णायक माना जाना चाहिए।
घटना के बाद विमान के फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर समेत संबंधित डेटा की जांच शुरू की गई। तकनीकी विशेषज्ञ भी जांच प्रक्रिया में सहयोग कर रहे हैं।
पायलट के ड्रग टेस्ट में क्या सामने आया?
घटना के बाद दोनों पायलटों की स्क्रीनिंग की गई थी। बाद में कमांडर के सैंपल में मारिजुआना से संबंधित पॉजिटिव परिणाम सामने आने की रिपोर्टें प्रकाशित हुईं।
इसके बाद कन्फर्मेटरी लैब टेस्ट में भी पॉजिटिव परिणाम मिलने की जानकारी सामने आई। हालांकि, किसी टेस्ट में प्रतिबंधित पदार्थ मिलना अपने आप यह साबित नहीं करता कि उसी पदार्थ के कारण विमान ने ऊंचाई खोई थी।
यही वजह है कि जांच एजेंसियों के लिए मेडिकल रिपोर्ट, फ्लाइट डेटा, कॉकपिट रिकॉर्डिंग, विमान की तकनीकी स्थिति और ऑपरेशनल परिस्थितियों को एक साथ देखना महत्वपूर्ण है।
अब हर पायलट की होगी स्क्रीनिंग
एयर इंडिया की नई व्यवस्था के तहत अब स्क्रीनिंग सिर्फ रैंडम आधार तक सीमित नहीं रहेगी। पायलटों की टेस्टिंग ट्रेनिंग के दौरान, उड़ान के बाद और निर्धारित बेस या अन्य अधिकृत स्थानों पर की जा सकती है।
नई व्यवस्था में एयरलाइन की गुरुग्राम स्थित अकादमी, ब्रीफिंग सेंटर, कार्यालय और पायलटों के होम बेस जैसे स्थानों को भी शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य टेस्टिंग को ज्यादा नियमित और व्यापक बनाना है।
इसका दायरा एयर इंडिया एक्सप्रेस तक बढ़ाया गया है। यानी ग्रुप के दोनों प्रमुख एयर ऑपरेटरों के पायलट इस निगरानी व्यवस्था में शामिल होंगे।
मौजूदा एविएशन नियम क्या कहते हैं?
भारत में फ्लाइट क्रू के लिए पहले से ही साइकोएक्टिव सब्सटेंस को लेकर सख्त सुरक्षा प्रावधान मौजूद हैं। मौजूदा नियामकीय व्यवस्था में क्रू को ऐसी स्थिति में ड्यूटी करने से रोकने का प्रावधान है, जिसमें किसी पदार्थ के प्रभाव के कारण सुरक्षित तरीके से जिम्मेदारी निभाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
शराब की जांच के लिए प्री-फ्लाइट और कुछ परिस्थितियों में पोस्ट-फ्लाइट ब्रीथ-एनालाइज़र टेस्ट की व्यवस्था भी लागू है। विदेश से भारत आने वाली निर्धारित उड़ानों के क्रू के लिए भारत में पहली लैंडिंग के बाद पोस्ट-फ्लाइट ब्रीथ-एनालाइज़र जांच का प्रावधान मौजूद है।
Directorate General of Civil Aviation
ड्रग स्क्रीनिंग के मामले में मौजूदा सिस्टम रैंडम टेस्टिंग पर आधारित रहा है। नई एयर इंडिया नीति इस निगरानी को कंपनी स्तर पर काफी व्यापक बना रही है।
क्या ड्रग टेस्ट से घटना की वजह साबित हो गई?
नहीं। यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।
एक पायलट के टेस्ट में किसी पदार्थ की मौजूदगी और विमान के अचानक ऊंचाई खोने के बीच सीधा कारणात्मक संबंध स्थापित करने के लिए विस्तृत जांच जरूरी होती है।
जांच में यह देखा जाना होगा कि संबंधित पदार्थ कब और कितनी मात्रा में शरीर में मौजूद था, उसका वास्तविक प्रभाव क्या था और क्या उस समय पायलट की निर्णय लेने या विमान संचालित करने की क्षमता प्रभावित हुई थी।
इसके साथ विमान के सिस्टम, ऑटो-पायलट, फ्लाइट कंट्रोल, मौसम, टर्बुलेंस और क्रू की ऑपरेशनल प्रतिक्रिया जैसे पहलुओं की भी जांच जरूरी है।
कुछ रिपोर्टों में विमान के विभिन्न सिस्टम से जुड़े अलर्ट का भी उल्लेख किया गया है, लेकिन इन्हें अभी घटना की अंतिम वजह के तौर पर पेश करना जल्दबाजी होगी।
एविएशन सेफ्टी के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
कमर्शियल एविएशन में पायलट की मेडिकल और मानसिक फिटनेस सीधे उड़ान सुरक्षा से जुड़ी होती है। हजारों फीट की ऊंचाई पर किसी भी स्थिति में तेज और सही निर्णय लेने की जरूरत होती है।
ऐसे में एयरलाइन द्वारा सभी पायलटों की व्यापक स्क्रीनिंग शुरू करना सिर्फ एक प्रशासनिक कदम नहीं बल्कि सेफ्टी कल्चर को मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
हालांकि, किसी भी टेस्टिंग सिस्टम की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि सैंपल कलेक्शन, लैब टेस्टिंग, कन्फर्मेशन, मेडिकल इंटरप्रिटेशन और अपील जैसी प्रक्रियाएं कितनी पारदर्शी और वैज्ञानिक हैं।
जांच पूरी होने तक क्या निष्कर्ष निकलेगा?
फुकेत-दिल्ली घटना की जांच अभी अंतिम चरण में नहीं पहुंची है। इसलिए पायलट के टेस्ट परिणाम को घटना का अंतिम कारण मानना उचित नहीं होगा।
जांच एजेंसियां फ्लाइट रिकॉर्डर डेटा, कॉकपिट गतिविधियों, विमान के तकनीकी सिस्टम और क्रू से जुड़े मेडिकल पहलुओं का विश्लेषण कर रही हैं।
आगे की जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि 300 फीट की ऊंचाई में अचानक कमी के पीछे तकनीकी, मानवीय, पर्यावरणीय या कई कारकों का संयोजन था।
फिलहाल एयर इंडिया का नया ड्रग स्क्रीनिंग सिस्टम एविएशन सेफ्टी पर बढ़ी निगरानी का स्पष्ट संकेत है। आने वाले समय में इसकी प्रभावशीलता इस बात से तय होगी कि स्क्रीनिंग कितनी नियमित, निष्पक्ष और वैज्ञानिक तरीके से लागू होती है।