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नॉटी बॉय की अग्निपरीक्षा: क्या ईओएस-05 लॉन्च से इसरो की साख लौटेगी?

Harish Qureshi 2026-09-03 13:00:35
नॉटी बॉय की अग्निपरीक्षा: क्या ईओएस-05 लॉन्च से इसरो की साख लौटेगी?

इसरो 4 सितंबर को सुबह 2:55 बजे जीएसएलवी-एफ17 से ईओएस-05 लॉन्च करेगा। मिशन भारत की पहली जियोसिंक्रोनस इमेजिंग क्षमता और जीएसएलवी की विश्वसनीयता की अहम परीक्षा है।


श्रीहरिकोटा | 3 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris


रात के अंधेरे में इसरो की बड़ी परीक्षा


जब देश का बड़ा हिस्सा सो रहा होगा, तब श्रीहरिकोटा में इसरो की एक अहम परीक्षा शुरू होगी।


भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन 4 सितंबर की सुबह 2 बजकर 55 मिनट पर जीएसएलवी-एफ17 को लॉन्च करने वाला है। रॉकेट अपने साथ ईओएस-05 पृथ्वी अवलोकन उपग्रह लेकर जाएगा। लॉन्च सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के सेकंड लॉन्च पैड से प्रस्तावित है।


इस मिशन को सिर्फ एक और सैटेलाइट लॉन्च मानना आसान होगा। लेकिन इसके पीछे जीएसएलवी की पुरानी कहानी, हालिया पीएसएलवी झटके और भारत की लगातार पृथ्वी निगरानी क्षमता बढ़ाने की कोशिश जुड़ी हुई है।


आखिर नॉटी बॉय क्यों?


जीएसएलवी को “नॉटी बॉय” कहे जाने की वजह इसकी शुरुआती उड़ानों में सामने आई असंगत प्रदर्शन क्षमता रही है।


इसरो के आधिकारिक लॉन्च रिकॉर्ड में जीएसएलवी की 19वीं उड़ान के तौर पर जीएसएलवी-एफ17 दर्ज है। इससे पहले जीएसएलवी-एफ16 के जरिए निसार मिशन जुलाई 2025 में लॉन्च हुआ था। जीएसएलवी-एफ15 ने जनवरी 2025 में एनवीएस-02 को लॉन्च किया था, जबकि जीएसएलवी-एफ14 ने फरवरी 2024 में इंसैट-3डीएस को कक्षा में पहुंचाया था।


लेकिन इस रॉकेट का इतिहास पूरी तरह बेदाग नहीं है। जीएसएलवी-एफ10 मिशन अगस्त 2021 में ईओएस-03 के साथ असफल हुआ था। उसके 

बाद जीएसएलवी परिवार ने कई सफल मिशनों के जरिए अपनी विश्वसनीयता मजबूत की।


इस बार दांव पर क्या है?


इस बार रॉकेट के साथ ईओएस-05 है।


इसरो के मुताबिक यह भारत का पहला इमेजिंग सैटेलाइट है जिसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से पृथ्वी की तस्वीरें लेने के लिए डिजाइन किया गया है। जीएसएलवी-एफ17 पहले इसे सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंचाएगा। इसके बाद सैटेलाइट अपनी निर्धारित कक्षा की ओर बढ़ेगा।

यही इस मिशन को खास बनाता है।


पृथ्वी की निचली कक्षा में घूमने वाले कई अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट किसी क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हुए तस्वीरें लेते हैं और फिर आगे निकल जाते हैं। 

जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से काम करने वाला सैटेलाइट एक बड़े इलाके को लगातार देखने की क्षमता देता है।


ईओएस-05 का मकसद इसी तरह की निरंतर निगरानी क्षमता को मजबूत करना है।


करीब 36 हजार किलोमीटर ऊपर से नजर


ईओएस-05 को लगभग 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई वाली जियोसिंक्रोनस व्यवस्था से काम करने के लिए तैयार किया गया है।

इसका फायदा मौसम की निगरानी, प्राकृतिक आपदाओं, बादलों की गतिविधि, पर्यावरणीय बदलाव और राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण क्षेत्रों की निगरानी 

जैसे कार्यों में हो सकता है।


मीडिया रिपोर्टों में इसे “हॉकआई” या “आई इन द स्काई” जैसी उपमाएं दी गई हैं। लेकिन इसे किसी सर्वशक्तिमान निगरानी प्रणाली के तौर पर पेश 

करना सही नहीं होगा। सैटेलाइट की वास्तविक क्षमता उसके सेंसर, रिजॉल्यूशन, कवरेज और संचालन संबंधी सीमाओं पर निर्भर करेगी।


2021 की असफलता की याद


ईओएस-05 की कहानी को 2021 के ईओएस-03 मिशन से अलग करके नहीं देखा जा सकता।


अगस्त 2021 में जीएसएलवी-एफ10 के जरिए ईओएस-03 लॉन्च किया गया था। मिशन निर्धारित तरीके से आगे नहीं बढ़ सका और इसरो के 

आधिकारिक रिकॉर्ड में इसे “Mission unsuccessful” दर्ज किया गया है।


अब लगभग पांच साल बाद ईओएस-05 एक तरह का तकनीकी दूसरा मौका भी है।


हालांकि दोनों मिशनों को बिल्कुल समान मानना उचित नहीं होगा। ईओएस-05 वर्तमान मिशन के लिए विकसित नया अंतरिक्ष यान है और इसे 

जियोसिंक्रोनस इमेजिंग क्षमता के लिए तैयार किया गया है।


इसरो के लिए हालिया चुनौती


इसरो की चुनौती केवल जीएसएलवी तक सीमित नहीं रही है।


जनवरी 2026 में पीएसएलवी-सी62 मिशन को पीएस3 चरण के अंत में एक असामान्य स्थिति का सामना करना पड़ा था। इसरो ने इसकी विस्तृत जांच के लिए विशेषज्ञ समिति बनाए जाने की जानकारी दी है। इसरो के 2025-26 के उपलब्धियों संबंधी दस्तावेज में पीएसएलवी-सी61 और सी62 की विफलताओं को संबोधित किए जाने की बात कही गई है।


इस पृष्ठभूमि में जीएसएलवी-एफ17 का प्रदर्शन अतिरिक्त ध्यान खींच रहा है।


लेकिन यहां एक अहम फर्क है। पीएसएलवी और जीएसएलवी अलग लॉन्च वाहन परिवार हैं। इसलिए पीएसएलवी की समस्या को सीधे जीएसएलवी की तकनीकी विश्वसनीयता का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।


क्या एक सफल लॉन्च से “खोई छवि” लौट जाएगी?


यहीं इस खबर का सबसे दिलचस्प सवाल है।


अगर जीएसएलवी-एफ17 सफलतापूर्वक उड़ान भरता है और ईओएस-05 अपनी निर्धारित कक्षा तक पहुंचता है, तो यह निश्चित रूप से इसरो के लिए सकारात्मक उपलब्धि होगी।


यह जीएसएलवी की विश्वसनीयता पर भरोसा बढ़ाएगा। ईओएस-05 की जियोसिंक्रोनस इमेजिंग क्षमता भारत के पृथ्वी अवलोकन कार्यक्रम में नई 

क्षमता जोड़ सकती है। इससे भविष्य के मिशनों के लिए भी भरोसा मजबूत होगा।


लेकिन किसी संस्थान की “छवि” सिर्फ एक लॉन्च से नहीं बनती और न ही एक मिशन से खत्म होती है।


इसरो की दीर्घकालिक साख उसके सफल और असफल दोनों मिशनों से बनी है। चंद्रयान-3, आदित्य-एल1, निसार और कई अन्य सफल अभियानों ने 

इसकी तकनीकी क्षमता को मजबूत किया है। दूसरी तरफ विफल मिशन यह याद दिलाते हैं कि अंतरिक्ष कार्यक्रम में जोखिम हमेशा मौजूद रहता है।


इसलिए ईओएस-05 की सफलता को “कमबैक” कहना एक संपादकीय व्याख्या हो सकती है, लेकिन इसे इसरो की आधिकारिक स्थिति के रूप में 

नहीं लिखा जाना चाहिए।


क्रायोजेनिक तकनीक की असली परीक्षा


जीएसएलवी की पहचान उसकी क्रायोजेनिक तकनीक से भी जुड़ी है।


क्रायोजेनिक इंजन में बेहद कम तापमान पर रखे जाने वाले तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन जैसे प्रणोदकों का इस्तेमाल होता है। ऐसी तकनीक 

को विकसित करना दुनिया के कई अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है।


भारत ने स्वदेशी क्रायोजेनिक क्षमता विकसित करने में वर्षों लगाए। यही तकनीकी क्षमता भारी पेलोड को ऊंची कक्षाओं तक पहुंचाने की भारत की 

क्षमता के लिए अहम है।


इसलिए जीएसएलवी-एफ17 का सफल प्रदर्शन केवल एक सैटेलाइट को कक्षा में पहुंचाने से ज्यादा मायने रखता है। यह उस तकनीकी श्रृंखला की 

विश्वसनीयता का भी संकेत होगा जिस पर भविष्य के जियोसिंक्रोनस मिशन निर्भर कर सकते हैं।


लॉन्च से पहले क्या स्थिति है?


इसरो के मुताबिक जीएसएलवी-एफ17 को 4 सितंबर 2026 को सुबह 2:55 बजे लॉन्च करने की योजना है। 28 अगस्त को वाहन को व्हीकल 

असेंबली बिल्डिंग से अंबिलिकल टावर की ओर ले जाया गया था और इसरो ने 1 सितंबर को लॉन्च की तैयारी से जुड़ी जानकारी साझा की थी।


इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन ने भी कहा है कि लॉन्च से जुड़ी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं।


हालांकि अंतिम परिणाम लॉन्च के बाद ही सामने आएगा। निर्धारित समय का होना सफलता की गारंटी नहीं है।


भारत के लिए इसका व्यापक मतलब


ईओएस-05 सफल होता है तो भारत को पृथ्वी अवलोकन क्षेत्र में एक ऐसी क्षमता मिलेगी जो लगातार निगरानी के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।


मौसम पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन से लेकर पर्यावरणीय निगरानी तक, लगातार उपलब्ध इमेजिंग डेटा का उपयोग कई क्षेत्रों में किया जा सकता है।


रणनीतिक दृष्टि से भी ऐसी क्षमता महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन सैटेलाइट की वास्तविक राष्ट्रीय सुरक्षा उपयोगिता पर विस्तृत निष्कर्ष उसके वास्तविक 

सेंसर प्रदर्शन और आधिकारिक डेटा उपलब्ध होने के बाद ही निकाला जाना चाहिए।


असली फैसला सुबह होगा


“नॉटी बॉय” की अगली उड़ान इसलिए सुर्खियों में है क्योंकि इसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों जुड़े हैं।


अतीत में जीएसएलवी ने मुश्किल दौर देखा है। वर्तमान में इसरो अपने एक महत्वपूर्ण पृथ्वी अवलोकन मिशन की तैयारी कर रहा है। और भविष्य में 

भारत को अधिक सक्षम, अधिक विश्वसनीय और अधिक विविध अंतरिक्ष लॉन्च सिस्टम की जरूरत है।


अगर जीएसएलवी-एफ17 और ईओएस-05 मिशन के सभी प्रमुख चरण सफल रहते हैं, तो यह इसरो के लिए एक महत्वपूर्ण भरोसा बहाली वाला क्षण 

जरूर होगा।


इसरो की असली साख किसी एक रात के लॉन्च से नहीं, बल्कि लगातार सफल मिशनों, पारदर्शी जांच, तकनीकी सुधार और लंबे समय तक भरोसेमंद प्रदर्शन से तय होगी।

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Harish Qureshi

Harish Qureshi

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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