बलूचिस्तान में पाकिस्तान को खुली चुनौती, सेना को अल्टीमेटम
1971 का हवाला देकर बलूच नेता ने पाक सेना को दी चेतावनी
नुश्की हमले के बाद बलूचिस्तान में पाकिस्तान पर बढ़ा दबाव
बलूचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ सियासी और सशस्त्र चुनौती एक साथ सामने आई है। मीर यार बलोच ने पाकिस्तानी सेना से प्रांत छोड़ने और हथियार सौंपने की मांग की। इसी बीच BRAS ने नुश्की में सैन्य काफिले पर हमले का दावा किया। हमले में सात सैनिकों की मौत का दावा स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं है।
बलूचिस्तान, पाकिस्तान |20 अगस्त 2026 |शाह टाइम्स
By Mohd Haris
पाकिस्तान के अशांत बलूचिस्तान प्रांत में इस वक्त दो अलग-अलग घटनाक्रम एक ही बड़ी तस्वीर की ओर इशारा कर रहे हैं। एक तरफ बलूच अलगाववादी नेता मीर यार बलोच ने पाकिस्तानी सेना से बलूचिस्तान छोड़ने और अपने हथियार व सैन्य उपकरण सौंपने की मांग की है। दूसरी तरफ बलोच राजी आजोई संगर यानी BRAS ने नुश्की इलाके में पाकिस्तानी सैन्य काफिले पर घात लगाकर हमले का दावा किया है।
इन दोनों घटनाओं को एक साथ देखने पर बलूचिस्तान के संकट का सियासी और सुरक्षा पक्ष सामने आता है। हालांकि सैन्य हमले में हताहतों से जुड़े आंकड़े फिलहाल BRAS के दावे पर आधारित हैं और उनकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए सात सैनिकों की मौत या आठ से अधिक जवानों के घायल होने को स्थापित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
मीर यार बलोच ने पाकिस्तानी सेना को बलूचिस्तान से बाहर निकलने की मांग की है। राष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने पाकिस्तान की सेना को बाहरी और हमलावर ताकत बताया तथा आरोप लगाया कि बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों और खनिजों पर सेना का नियंत्रण है।
उनके बयान का सबसे संवेदनशील हिस्सा 1971 के बांग्लादेश युद्ध का हवाला है। उन्होंने पाकिस्तान को याद दिलाया कि 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य पराजय के बाद पाकिस्तानी सेना को वहां से हटना पड़ा था। इसी ऐतिहासिक संदर्भ को बलूच नेता ने मौजूदा बलूचिस्तान संघर्ष से जोड़ने की कोशिश की है।
मीर यार बलोच ने केवल सेना की वापसी की बात नहीं की। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने पाकिस्तानी सैन्य बलों से हथियार, लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक, भारी तोपखाने, नौसैनिक जहाज और दूसरे सैन्य उपकरण बलूच सेनाओं को सौंपने की मांग भी रखी। यह मांग पाकिस्तान की संप्रभुता और मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ एक स्पष्ट अलगाववादी रुख को दर्शाती है।
1971 का संदर्भ बलूच अलगाववादी नैरेटिव में राजनीतिक संदेश के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। मीर यार बलोच का तर्क है कि पाकिस्तान की सेना को उसी तरह बलूचिस्तान छोड़ना चाहिए जैसे 1971 के बाद उसे बांग्लादेश से हटना पड़ा था।
लेकिन दोनों परिस्थितियों को एक जैसा मानना ऐतिहासिक और राजनीतिक तौर पर सावधानी मांगता है। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध, पूर्वी पाकिस्तान में व्यापक राजनीतिक संकट और बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा समेत कई विशिष्ट परिस्थितियां थीं। मौजूदा बलूचिस्तान संघर्ष अलग ऐतिहासिक, भौगोलिक और राजनीतिक संदर्भ में चल रहा है।
इसलिए 1971 का हवाला मुख्य रूप से एक राजनीतिक संदेश और दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए। इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि बलूचिस्तान में भी वही घटनाक्रम दोहराया जाएगा।
इसी बीच राष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक BRAS ने 17 अगस्त को नुश्की के कचकई इलाके में पाकिस्तानी सैन्य काफिले पर हमले का दावा किया। संगठन के अनुसार काफिला लेवीज स्टेशन के पास से गुजर रहा था, तभी घात लगाकर हमला किया गया।
BRAS ने दावा किया कि हमले में सात पाकिस्तानी सैन्यकर्मी मारे गए और आठ से अधिक घायल हुए। संगठन ने एक क्वॉडकॉप्टर गिराने का दावा भी किया है। इन सभी आंकड़ों को फिलहाल संगठन के दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, क्योंकि स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
BRAS ने यह भी कहा कि बलूचिस्तान से पाकिस्तानी सेना की पूरी वापसी तक उसका सशस्त्र अभियान जारी रहेगा। इस बयान से साफ है कि संगठन सैन्य कार्रवाई को अपने राजनीतिक लक्ष्य से जोड़कर देख रहा है।
BRAS यानी बलोच राजी आजोई संगर कई बलूच सशस्त्र संगठनों के गठजोड़ के रूप में जाना जाता है। सीटीसी सेंटर वेस्ट पॉइंट के विश्लेषण के मुताबिक बलूच विद्रोह में BLA, BLF और BLA की अलग-अलग धाराओं सहित कई संगठन सक्रिय रहे हैं और इनके बीच सहयोग तथा प्रतिस्पर्धा दोनों दिखाई देते हैं। सीटीसी के अध्ययन के अनुसार 2025 के बाद बलूच विद्रोह में हमलों की क्षमता और जटिलता बढ़ी है। संगठन सैन्य ठिकानों के साथ-साथ सरकारी प्रतिष्ठानों, संचार ढांचे, परिवहन नेटवर्क और चीन से जुड़े आर्थिक प्रोजेक्ट्स को भी निशाना बनाते रहे हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बलूच सशस्त्र आंदोलन एक एकीकृत संगठन नहीं है। अलग-अलग गुटों के अपने नेतृत्व, रणनीति और प्राथमिकताएं हैं। इसलिए किसी एक संगठन के बयान को पूरे बलूच समाज की सामूहिक राजनीतिक राय मानना सही नहीं होगा।
बलूचिस्तान में असंतोष नया नहीं है। सीटीसी के अध्ययन के अनुसार इसकी जड़ें पाकिस्तान बनने के बाद के शुरुआती वर्षों तक जाती हैं। 1948 में कलात राज्य के पाकिस्तान में विलय के बाद सशस्त्र प्रतिरोध का पहला दौर शुरू हुआ और बाद के दशकों में कई चरणों में विद्रोह सामने आया।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार, आर्थिक हिस्सेदारी, सुरक्षा अभियान और कथित मानवाधिकार उल्लंघन जैसे मुद्दे लंबे समय से बलूच राष्ट्रवादी राजनीति के केंद्र में रहे हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान की सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान अलगाववादी हिंसा को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानते हैं।
यही विरोधाभास इस संकट को जटिल बनाता है। एक पक्ष इसे संसाधनों, राजनीतिक अधिकारों और आत्मनिर्णय से जुड़ा संघर्ष बताता है, जबकि दूसरा इसे राज्य की संप्रभुता के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के तौर पर देखता है।
बलूचिस्तान का संकट केवल पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपीईसी से भी जुड़ता है। ग्वादर बंदरगाह और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स बलूचिस्तान को चीन की बेल्ट एंड रोड रणनीति में अहम बनाते हैं।
सीटीसी के मुताबिक बलूच सशस्त्र संगठनों ने अतीत में चीनी नागरिकों और सीपीईसी से जुड़े प्रोजेक्ट्स को निशाना बनाया है। इसका असर पाकिस्तान और चीन के सुरक्षा सहयोग पर भी पड़ता है।
इस वजह से बलूचिस्तान में किसी भी बड़े सुरक्षा संकट का असर इस्लामाबाद से आगे बीजिंग तक पहुंचता है। चीन के लिए सुरक्षा जोखिम बढ़ने का अर्थ सीपीईसी निवेश, श्रमिक सुरक्षा और ग्वादर की रणनीतिक उपयोगिता पर अतिरिक्त दबाव है।
पाकिस्तान के सामने समस्या केवल हमलों को रोकने की नहीं है। उसे सुरक्षा कार्रवाई और राजनीतिक समाधान के बीच संतुलन तलाशना होगा। सीटीसी के विश्लेषण में भी यह निष्कर्ष सामने आता है कि लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक असंतोष को केवल पारंपरिक काउंटर-इंसर्जेंसी उपायों से खत्म करना मुश्किल है। दूसरी ओर, सशस्त्र संगठनों की रणनीति भी गंभीर सवाल खड़े करती है। सैन्य और नागरिक ठिकानों पर हिंसक हमले स्थानीय अस्थिरता बढ़ाते हैं और राजनीतिक समाधान की गुंजाइश को सीमित कर सकते हैं। इसलिए दोनों पक्षों के दावों के बीच एक अहम अंतर समझना जरूरी है। बलूचिस्तान में असंतोष के सामाजिक और राजनीतिक कारणों की मौजूदगी एक बात है, जबकि सशस्त्र संगठनों की हर कार्रवाई को राजनीतिक वैधता मिलना दूसरी बात।
बलूचिस्तान की भौगोलिक स्थिति इस संकट को और पेचीदा बनाती है। बलूच आबादी पाकिस्तान के अलावा ईरान और अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में भी रहती है। सीटीसी के अनुसार पाकिस्तान और ईरान दोनों एक-दूसरे पर बलूच सशस्त्र समूहों को पनाह देने के आरोप लगाते रहे हैं।
जनवरी 2024 में ईरान और पाकिस्तान के बीच बलूचिस्तान को लेकर सैन्य कार्रवाई तक हुई थी। दोनों देशों ने एक-दूसरे की सीमा के भीतर मौजूद सशस्त्र समूहों को निशाना बनाने के आरोप लगाए। बाद में दोनों ने सीमा सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की कोशिश की।
अफगानिस्तान का आयाम भी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान और अफगान तालिबान सरकार के बीच संबंधों में तनाव के बीच सीमा सुरक्षा और सशस्त्र समूहों की आवाजाही का सवाल पहले से संवेदनशील है। बलूच संघर्ष का विस्तार इस पूरे क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को प्रभावित कर सकता है।
मौजूदा हालात को देखते हुए 1971 की पुनरावृत्ति का दावा करना तथ्यों से आगे निकलना होगा। बलूचिस्तान का संघर्ष गंभीर है, लेकिन उसके राजनीतिक और सैन्य समीकरण पूर्वी पाकिस्तान से अलग हैं। फिर भी 1971 का संदर्भ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पाकिस्तान की राजनीतिक स्मृति में सैन्य पराजय और क्षेत्रीय विघटन का सबसे बड़ा उदाहरण है। बलूच अलगाववादी नेतृत्व इस ऐतिहासिक स्मृति को इस्तेमाल करके पाकिस्तान की सेना और राजनीतिक प्रतिष्ठान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। असल सवाल यह है कि क्या मौजूदा असंतोष को राजनीतिक संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए कम किया जा सकता है। यदि ऐसा नहीं होता और सशस्त्र गतिविधियां बढ़ती हैं, तो सुरक्षा संकट के और गहरा होने की आशंका बनी रहेगी।
फिलहाल दो रुझान खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं। पहला, बलूच अलगाववादी संगठनों की ओर से पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देने वाले हमलों और बयानों का जारी रहना। दूसरा, इस्लामाबाद की ओर से सुरक्षा बलों और काउंटर-इंसर्जेंसी तंत्र पर बढ़ती निर्भरता।
नुश्की हमले में सात सैनिकों की मौत का दावा अगर आगे स्वतंत्र स्रोतों से पुष्ट होता है, तो यह बलूच सशस्त्र समूहों की ऑपरेशनल क्षमता पर गंभीर सवाल उठाएगा। लेकिन पुष्टि के बिना इसे स्थापित सैन्य आंकड़ा मानना पत्रकारिता की दृष्टि से सही नहीं होगा।
इसी तरह मीर यार बलोच का बयान बलूच अलगाववादी राजनीति के रुख को दिखाता है, लेकिन इसे पूरे बलूचिस्तान की जनता की राय नहीं माना जा सकता। प्रांत के भीतर राष्ट्रवादी, संघीय, राजनीतिक और अलगाववादी विचारधाराओं के बीच पर्याप्त अंतर मौजूद हैं।
बलूचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ मौजूदा घटनाक्रम को केवल एक सैन्य हमले की खबर के तौर पर देखना अधूरा होगा। मीर यार बलोच का 1971 का हवाला और BRAS का नुश्की हमले का दावा मिलकर यह दिखाते हैं कि संघर्ष का सियासी और सुरक्षा दोनों मोर्चा सक्रिय है।
लेकिन अभी सबसे जरूरी सावधानी तथ्यों और दावों के बीच फर्क करने की है। सेना की वापसी और हथियार सौंपने की मांग एक अलगाववादी राजनीतिक मांग है, जबकि नुश्की हमले में हताहतों के आंकड़े संगठन के दावे हैं। इन दोनों को स्वतंत्र सत्यापन के बिना स्थापित तथ्य मानना उचित नहीं होगा। बलूचिस्तान का असली संकट लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक असंतोष, संसाधनों के बंटवारे, सुरक्षा नीति और अलगाववादी हिंसा के बीच फंसा हुआ है। अगर इस संकट का समाधान केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित रहा, तो अस्थिरता के बने रहने का जोखिम रहेगा। क्षेत्रीय स्तर पर इसका असर पाकिस्तान की आंतरिक सियासत, चीन के निवेश और ईरान-अफगानिस्तान के साथ सुरक्षा रिश्तों तक पहुंच सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।