असदुद्दीन ओवैसी ने यूसीसी को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ पर असर का सवाल उठाया। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के हिजाब फैसले की आलोचना की। अदालत ने छात्रा की याचिका खारिज करते हुए हिजाब को आवश्यक धार्मिक प्रथा साबित करने के पर्याप्त साक्ष्य नहीं माने। विवाद अब धार्मिक स्वतंत्रता और समान कानून की बहस तक पहुंच गया है।
स्थान: हैदराबाद
तारीख: 26 अगस्त 2026
बाय: Mohd Naved
असदुद्दीन ओवैसी ने समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर सरकारों की नीयत और कानूनी बुनियाद पर गंभीर सवाल उठाए हैं। हैदराबाद में एक जलसे को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अगर समान नागरिक संहिता के प्रावधान मौजूदा हिंदू पर्सनल लॉ की तर्ज पर तैयार किए गए हैं, तो उसे सभी समुदायों के लिए समान कानून कहने की दलील पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
ओवैसी का यह बयान ऐसे वक्त आया है जब उत्तराखंड में यूसीसी लागू है और राज्य की आधिकारिक व्यवस्था विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और अन्य निजी नागरिक मामलों के लिए एक साझा कानूनी ढांचा उपलब्ध कराती है। उत्तराखंड के आधिकारिक यूसीसी पोर्टल के मुताबिक यह व्यवस्था धर्म और समुदाय से इतर नागरिकों पर लागू होती है।
ओवैसी ने यूसीसी को लेकर बुनियादी सवाल यह रखा कि अगर कानून तैयार करने में पहले से मौजूद किसी एक धार्मिक समुदाय के पर्सनल लॉ की अवधारणाओं का असर है, तो उसकी समानता की कसौटी क्या होगी।
उनका तर्क राजनीतिक और वैचारिक है। वे मानते हैं कि मुस्लिम समुदाय पर ऐसे निजी कानून लागू नहीं किए जाने चाहिए जिन्हें वे इस्लामी पारिवारिक कानून की बुनियादी मान्यताओं से टकराता हुआ देखते हैं। यह ओवैसी का राजनीतिक रुख है, इसे यूसीसी की कानूनी स्थिति का स्वतंत्र न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
उत्तराखंड की आधिकारिक यूसीसी व्यवस्था हालांकि खुद को सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी ढांचा बताती है। इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, वसीयत और लिव-इन संबंधों से जुड़े प्रावधान शामिल हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रयागराज के एक स्कूल की नाबालिग छात्रा की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगी गई थी।
अदालत के सामने याचिकाकर्ता की ओर से हिजाब को इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा साबित करने के लिए पर्याप्त धार्मिक या कानूनी सामग्री पेश नहीं की गई। अदालत ने स्कूल में अन्य छात्राओं की तस्वीरों का भी उल्लेख किया, जिनमें मुस्लिम समुदाय से जुड़ी छात्राएं बिना सिर ढके दिखाई दी थीं।
ओवैसी ने इस फैसले से असहमति जताई। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 और 19 का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक आस्था से जुड़े सवालों पर अदालत को यह तय करने की सीमा पर विचार करना चाहिए कि इस्लाम में कौन-सी प्रथा आवश्यक है। उन्होंने फैसले को ‘इस्लाम पर हमला’ बताया।
यूसीसी की बहस भारत में लंबे समय से चली आ रही है। इसका केंद्रीय सवाल यह है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और परिवार से जुड़े नागरिक मामलों में धर्म आधारित अलग-अलग नियम होने चाहिए या सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था होनी चाहिए।
उत्तराखंड इस बहस में महत्वपूर्ण उदाहरण बन चुका है। राज्य के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक यूसीसी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और दूसरे निजी नागरिक मामलों के लिए समान ढांचा तैयार करता है।
ओवैसी इसी व्यवस्था की बुनियादी अवधारणा पर सवाल उठाते हैं। उनका तर्क है कि समानता का मतलब केवल सभी पर एक कानून लागू करना नहीं होना चाहिए, बल्कि कानून की बुनियाद और उसके सामाजिक प्रभाव को भी परखा जाना चाहिए।
उत्तराखंड में यूसीसी का ढांचा 2024 के अधिनियम और उसके बाद बनाए गए नियमों के जरिए विकसित हुआ। राज्य का आधिकारिक पोर्टल मौजूदा व्यवस्था को सभी नागरिकों के लिए एक साझा कानूनी प्रणाली के रूप में पेश करता है।
2025 में इसके नियम लागू हुए और बाद में उनमें संशोधन भी किए गए। 2026 में राज्य सरकार ने यूसीसी से जुड़े संशोधन अधिनियम और अन्य सरकारी आदेश जारी किए हैं।
इसी बीच हिजाब विवाद ने धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत ड्रेस कोड के बीच संतुलन की बहस को फिर सामने ला दिया है।
ओवैसी का रुख स्पष्ट रूप से यूसीसी और हिजाब मामले में धार्मिक स्वतंत्रता के पक्ष में है। वे मानते हैं कि मुस्लिम समुदाय के धार्मिक और निजी कानूनों को एक समान नागरिक संहिता के नाम पर समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।
दूसरी तरफ यूसीसी का सरकारी पक्ष इसे धर्म आधारित अलग-अलग निजी कानूनों के बजाय समान नागरिक अधिकार और एकरूप कानूनी प्रक्रिया की दिशा में सुधार के रूप में प्रस्तुत करता है। उत्तराखंड का आधिकारिक पोर्टल भी इसे समान अधिकार और एकीकृत कानूनी ढांचे के तौर पर परिभाषित करता है।
हिजाब मामले में अदालत का रुख अलग कानूनी सवाल पर केंद्रित था। अदालत ने याचिकाकर्ता के सामने यह चुनौती रखी कि वह हिजाब को आवश्यक धार्मिक प्रथा साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री पेश करे।
उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेज यह स्पष्ट करते हैं कि उत्तराखंड यूसीसी को सभी नागरिकों पर लागू होने वाली समान नागरिक व्यवस्था के तौर पर संचालित कर रहा है। आधिकारिक पोर्टल पर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और वसीयत जैसी सेवाएं एक ही व्यवस्था के तहत उपलब्ध हैं।
लेकिन ओवैसी के इस दावे कि यूसीसी मूल रूप से हिंदू पर्सनल लॉ की प्रतिकृति है, को साबित करने के लिए विस्तृत तुलनात्मक कानूनी विश्लेषण जरूरी है। उपलब्ध सामग्री अकेले इस दावे को अंतिम तथ्य के रूप में स्थापित नहीं करती।
इसी तरह हिजाब को लेकर अदालत का फैसला यह नहीं कहता कि मुस्लिम महिलाओं को सामान्य तौर पर हिजाब पहनने से प्रतिबंधित किया गया है। मामला एक विशेष स्कूल, उसकी यूनिफॉर्म व्यवस्था और याचिकाकर्ता द्वारा हिजाब को आवश्यक धार्मिक प्रथा साबित करने के दावे से जुड़ा था।
यूसीसी पर ओवैसी की आपत्ति राजनीतिक बहस को और तेज कर सकती है। खासकर मुस्लिम पर्सनल लॉ, धार्मिक स्वतंत्रता और समान नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन का सवाल आने वाले दिनों में ज्यादा प्रमुख रह सकता है।
हिजाब मामले में भी बहस अदालत के फैसले से आगे बढ़कर इस सवाल तक पहुंच रही है कि शैक्षणिक संस्थानों में यूनिफॉर्म नीति और धार्मिक पहचान के बीच संवैधानिक संतुलन कैसे बनाया जाए।
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और संस्थागत नियमों के बीच टकराव होने पर न्यायपालिका किस कसौटी को लागू करती है।
ओवैसी का बयान केवल यूसीसी की आलोचना तक सीमित नहीं है। उन्होंने इसे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों के व्यापक सवाल से जोड़ा है। इससे यूसीसी की बहस में कानूनी तर्क के साथ राजनीतिक विमर्श भी तेज होता है।
सरकारों के लिए चुनौती यह रहेगी कि समान नागरिक कानूनों की जरूरत और विभिन्न धार्मिक समुदायों की संवेदनशीलताओं के बीच भरोसा कैसे कायम किया जाए।
किसी भी यूसीसी व्यवस्था की सार्वजनिक स्वीकार्यता केवल उसके कानूनी प्रावधानों पर निर्भर नहीं करेगी। उसकी पारदर्शिता, न्यायिक समीक्षा, प्रशासनिक अमल और नागरिकों के अनुभव भी अहम होंगे।
इस विवाद का सीधा आर्थिक असर सीमित है। इसका प्रमुख प्रभाव सामाजिक और कानूनी क्षेत्र में है।
विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में नियम बदलने से परिवारों और नागरिकों की कानूनी प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसलिए ऐसे कानूनों में स्पष्टता, जागरूकता और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था अहम हो जाती है।
उत्तराखंड का आधिकारिक पोर्टल पहले से विवाह पंजीकरण, तलाक या विवाह निरस्तीकरण, उत्तराधिकार और वसीयत जैसी सेवाओं के लिए ऑनलाइन व्यवस्था उपलब्ध करा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत में भविष्य की किसी व्यापक समान नागरिक संहिता का संवैधानिक और विधायी स्वरूप क्या होगा।
दूसरा सवाल धार्मिक स्वतंत्रता और समान नागरिक अधिकारों के बीच व्यावहारिक संतुलन का है।
हिजाब मामले में आगे न्यायिक चुनौती आती है या नहीं, यह भी महत्वपूर्ण होगा। ओवैसी ने फैसले पर असहमति जताई है और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती की बात का समर्थन किया है।
यूसीसी को लेकर राजनीतिक बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है। उत्तराखंड का अनुभव इस बहस के लिए महत्वपूर्ण कानूनी और प्रशासनिक संदर्भ देता रहेगा।
हिजाब विवाद में भी आगे की न्यायिक कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी। खासकर धार्मिक स्वतंत्रता, आवश्यक धार्मिक प्रथा और शैक्षणिक संस्थानों की यूनिफॉर्म नीति के बीच संवैधानिक संतुलन पर अदालतों की व्याख्या बहस का केंद्र बनी रह सकती है।
ओवैसी की आलोचना यूसीसी और हिजाब के दो अलग कानूनी मुद्दों को धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों के व्यापक राजनीतिक विमर्श से जोड़ती है। लेकिन दोनों मामलों में दावों और न्यायिक निष्कर्षों के बीच फर्क रखना जरूरी है।
उत्तराखंड की आधिकारिक व्यवस्था यूसीसी को धर्म से इतर सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी ढांचा बताती है। दूसरी ओर, ओवैसी इसकी बुनियाद और मुस्लिम पर्सनल लॉ पर संभावित असर पर सवाल उठा रहे हैं।
हिजाब मामले में अदालत ने एक विशिष्ट याचिका पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला दिया। इसलिए इस फैसले को पूरे मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों पर सामान्य प्रतिबंध के रूप में पेश करना भी कानूनी स्थिति को जरूरत से ज्यादा व्यापक बना देगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।