भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति कॉलेजियम सिस्टम के माध्यम से होती है। यह व्यवस्था संविधान में सीधे दर्ज नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से विकसित हुई है। इसकी पारदर्शिता, जवाबदेही और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर लगातार बहस होती रही है।
📍 Location: नई दिल्ली, भारत
📰 Date: 03 अगस्त 2026
✍️ By K P Saini
भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादलों की प्रक्रिया कॉलेजियम सिस्टम के माध्यम से संचालित होती है। यह व्यवस्था संविधान में स्पष्ट रूप से लिखी नहीं गई है, बल्कि समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों के आधार पर विकसित हुई है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है, हालांकि इसकी पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर लंबे समय से बहस जारी है।
कॉलेजियम सिस्टम भारतीय न्यायपालिका की वह व्यवस्था है जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति और तबादलों की सिफारिश की जाती है।
सुप्रीम कोर्ट में कॉलेजियम का नेतृत्व भारत के मुख्य न्यायाधीश Chief Justice of India करते हैं। उनके साथ सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश इस समिति का हिस्सा होते हैं।
हाईकोर्ट स्तर पर संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीश कॉलेजियम का गठन करते हैं।
कॉलेजियम सिस्टम की शुरुआत संविधान में नहीं की गई थी।
S.P. Gupta बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में "परामर्श" का अर्थ "सहमति" नहीं है। उस समय नियुक्ति पर अंतिम निर्णय केंद्र सरकार का माना गया।
Advocates-on-Record Association बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने पहले फैसले को पलट दिया। अदालत ने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय को प्राथमिकता मिलेगी और यह राय वरिष्ठतम न्यायाधीशों के साथ विचार-विमर्श के आधार पर होगी।
यहीं से कॉलेजियम व्यवस्था का औपचारिक विकास माना जाता है।
संविधान के अनुच्छेद 124 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति का उल्लेख है।
अनुच्छेद 217 हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है।
हालांकि इन अनुच्छेदों में "कॉलेजियम" शब्द का उल्लेख नहीं है। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक व्याख्याओं के माध्यम से विकसित हुई।
कई अवसरों पर केंद्र सरकार और कॉलेजियम के बीच नियुक्तियों को लेकर मतभेद सामने आए हैं, जिसके कारण न्यायाधीशों की नियुक्तियों में देरी भी हुई है।
वर्ष 2014 में संसद ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) से संबंधित कानून पारित किया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित कर दिया और कॉलेजियम व्यवस्था को बरकरार रखा।
इस विषय में उपलब्ध समाचार सामग्री में किसी सरकारी संस्था, सुप्रीम कोर्ट या अन्य संबंधित पक्ष का नया आधिकारिक बयान उपलब्ध नहीं है।
कॉलेजियम सिस्टम सीधे देश की न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है।
इसके माध्यम से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रहे। दूसरी ओर, इसकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को लेकर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं।
कॉलेजियम सिस्टम भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। हालांकि इसकी गोपनीय कार्यप्रणाली, चयन प्रक्रिया में सीमित पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को लेकर लगातार आलोचना होती रही है। दूसरी ओर, समर्थकों का मानना है कि यह व्यवस्था न्यायपालिका को कार्यपालिका के अनावश्यक प्रभाव से सुरक्षित रखती है। इसलिए न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बहस जारी है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।