कपिल सिब्बल ने एसआईआर को मतदाता सूची में हेरफेर की कवायद बताया और सुप्रीम कोर्ट से कथित बल्क डिलीशन रोकने की अपील की। उन्होंने भाजपा को चुनावी फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया।
नई दिल्ली | 2 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
चुनावी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सियासी टकराव और तेज हो गया है। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बुधवार को चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए।
सिब्बल ने आरोप लगाया कि अलग-अलग राज्यों में चल रही एसआईआर कवायद का इस्तेमाल मतदाता सूची में हेरफेर के लिए हो रहा है और इसका मकसद भाजपा को चुनावी फायदा पहुंचाना है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से कथित सामूहिक नाम कटौती पर हस्तक्षेप करने की अपील की। सिब्बल का यह बयान झारखंड के गोड्डा जिले में मतदाताओं के नाम हटाने को लेकर सामने आई एक मीडिया रिपोर्ट के बाद आया।
सिब्बल ने जिस रिपोर्ट का हवाला दिया, उसमें आरोप था कि गोड्डा जिले में भाजपा से जुड़े एजेंट कथित तौर पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए आवेदन कर रहे थे। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इनमें बड़ी संख्या अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मतदाताओं की थी।
रिपोर्ट के मुताबिक बूथ लेवल ऑफिसर्स यानी बीएलओ ने भी इस तरह के अनुरोधों पर आपत्ति जताई। ये अधिकारी झारखंड की जेएमएम-कांग्रेस सरकार के अधीन राज्य कर्मचारी हैं।
यहां एक अहम अंतर समझना जरूरी है। गोड्डा में भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा इस तरह के आवेदन दिए जाने का आरोप मीडिया रिपोर्ट और सिब्बल के बयान में सामने आया है। इसे अभी अदालत द्वारा स्थापित तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।
सिब्बल ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एसआईआर को “एक्सक्लूजन की राजनीति” से जोड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा एजेंट मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाकर बड़ी संख्या में नाम हटाने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग करते हुए कहा कि एसआईआर मतदाता सूची में हेरफेर और भाजपा को चुनाव जिताने में मदद करने की कवायद है।
बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिब्बल ने दावा किया कि झारखंड में फॉर्म 7 के जरिए बड़ी संख्या में नाम हटाने के आवेदन दिए जा रहे हैं।
उनके मुताबिक एक साथ दर्जनों या सैकड़ों फॉर्म जमा किए जा सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि ऐसी प्रक्रिया में गलत जानकारी दिए जाने की स्थिति में भी तत्काल प्रभावी रोक नहीं लगती। यह सिब्बल का प्रक्रिया संबंधी दावा है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि अलग से जरूरी है।
सिब्बल ने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश का आरोप है, उनमें से कई लोग वर्षों से संबंधित इलाकों में रह रहे हैं।
उन्होंने अदालतों से इस मुद्दे को गंभीरता से देखने की अपील की। उनका तर्क है कि अगर वैध मतदाताओं के नाम बड़ी संख्या में हटते हैं तो चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर अदालत एसआईआर को केवल चुनाव आयोग की निष्पक्ष प्रशासनिक कवायद मानकर आगे बढ़ती है तो लोकतंत्र के लिए गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिब्बल ने दिल्ली और उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची से हटाए गए नामों के आंकड़ों का भी जिक्र किया।
उन्होंने दावा किया कि दिल्ली में करीब 45 से 47 लाख नाम हटाए गए हैं और उत्तर प्रदेश में लगभग 2.05 करोड़ नाम काटे गए हैं। उन्होंने पूरे देश में एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने के बाद करीब 5 से 6 करोड़ नाम हटने का दावा भी किया।
इन आंकड़ों को खबर में सिब्बल के दावे के रूप में देखना जरूरी है। इन्हें चुनाव आयोग के अंतिम और आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ों के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
एसआईआर को लेकर विपक्ष की बहस में महाराष्ट्र भी प्रमुख मुद्दा बना हुआ है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दावा किया है कि महाराष्ट्र की ड्राफ्ट मतदाता सूची से एसआईआर के बाद 2.06 करोड़ से अधिक मतदाता बाहर हो गए। उन्होंने चुनाव आयोग और भाजपा पर “वोट चोरी” का आरोप लगाया है।
मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने एक दिन पहले चुनाव आयोग के खिलाफ भी तीखे राजनीतिक बयान दिए थे। दोनों नेताओं ने चुनाव आयोग को लेकर “भाजपा कुर्सी बचाओ आयोग” और “वोट चोरी आयोग” जैसे राजनीतिक जुमले इस्तेमाल किए।
इस विवाद का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया का घोषित उद्देश्य मतदाता सूचियों को अधिक सटीक बनाना और पात्र मतदाताओं को सूची में बनाए रखना है।
सुप्रीम कोर्ट के बिहार एसआईआर फैसले में भी आयोग के बताए उद्देश्यों में पात्र मतदाताओं को शामिल करना और अपात्र लोगों को हटाना शामिल था।
सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को बिहार में की गई एसआईआर की वैधता बरकरार रखी थी। अदालत ने माना कि चुनाव आयोग के पास कानून और संविधान के तहत ऐसी पुनरीक्षण प्रक्रिया करने की शक्ति है।
लेकिन अदालत ने प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत ने बहिष्कृत मतदाताओं के नाम और बहिष्कार के कारण सार्वजनिक करने तथा संबंधित लोगों को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर देने जैसे निर्देश दिए थे।
सिब्बल की मौजूदा मांग को सुप्रीम कोर्ट में किसी नए अंतिम फैसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने सार्वजनिक बयान और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए अदालत से कथित बल्क डिलीशन पर हस्तक्षेप की अपील की है। उपलब्ध रिपोर्टों में इस दिन
उनके द्वारा दाखिल किसी नए औपचारिक याचिका या सुप्रीम कोर्ट के तत्काल आदेश की पुष्टि नहीं है।
इसलिए खबर में यह कहना अधिक सटीक है कि सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की अपील की, न कि अदालत ने उनकी मांग स्वीकार कर ली है।
पूरे विवाद का केंद्र एक बुनियादी सवाल है।
मतदाता सूची को साफ और सटीक बनाना जरूरी है। मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अपात्र नामों को हटाना चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए अहम है।
लेकिन दूसरी तरफ किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना भी गंभीर समस्या है। मतदाता सूची में नाम नहीं होने पर नागरिक अपने मतदान के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता।
यही वजह है कि एसआईआर जैसी प्रक्रिया में पारदर्शिता, नोटिस, आपत्ति दर्ज करने का अवसर और अपील की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।
सिब्बल के आरोपों ने एसआईआर को एक बार फिर प्रशासनिक प्रक्रिया से निकालकर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
विपक्ष का आरोप है कि बड़े पैमाने पर नाम हटाने से चुनावी गणित प्रभावित हो सकता है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग की घोषित दलील मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने की है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि एसआईआर का राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा। असली सवाल यह है कि प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, कितने नाम किस कारण से हटाए गए हैं और कितने पात्र मतदाताओं को अपना नाम बहाल कराने का अवसर मिला।
झारखंड के गोड्डा में उठे सवाल अब बड़े राजनीतिक विवाद में बदल चुके हैं। सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की है, जबकि विपक्ष पहले से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है।
अब चुनाव आयोग के आंकड़ों और संबंधित राज्यों की अंतिम मतदाता सूचियों पर नजर महत्वपूर्ण होगी।
अगर नाम हटाने की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गलतियां सामने आती हैं तो विपक्ष के आरोपों को बल मिलेगा। दूसरी तरफ अगर आयोग यह दिखाता है
कि हटाए गए नाम तय नियमों और सत्यापन प्रक्रिया के तहत हटाए गए और पात्र मतदाताओं के लिए पर्याप्त सुधार व्यवस्था मौजूद है, तो एसआईआर
के पक्ष में उसका तर्क मजबूत होगा।
फिलहाल कपिल सिब्बल का आरोप राजनीतिक रूप से तीखा है, लेकिन उसका अंतिम मूल्यांकन तथ्यों, आधिकारिक आंकड़ों और न्यायिक समीक्षा से ही होगा।
भारत जैसे लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है। यह चुनावी प्रतिनिधित्व की बुनियादी सूची है। इसलिए उसमें एक नाम गलत तरीके से जुड़ना जितना गंभीर है, उतना ही गंभीर किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हट जाना भी है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।